Tuesday, June 20, 2023

मुंतशिर के डायलॉग, ये राम की भाषा नहीं है

 90 के दशक में राममानंद सागर द्वारा निर्मित रामायण के राम अरुण गोविल की तुलना फिल्म आदिपुरुष के राम बने  दक्षिण भारतीय अभिनेता प्रभास से की जा रही है। फिल्म आदिपुरुष के गंदे डायलॉग का विरोध हर तरफ हो रहा है। फिल्म को बैन किए जाने की मांग देश के कई कोनों से की जा रही है। इसी बीच बहुत जल्द ही फिल्म के आपत्ति जनक डायलॉग बदल दिए जाएंगे, ऐसी बात फिल्म की पटकथा तथा डायलॉग लिखने वाले मनोज मुंतशिर ने कह दी है।      

रामानंद जी की रामायण बनाने का मुख्य उद्देश्य समाज वा देश को धर्म, संस्कार, रीति, नीति, मर्यादा को बढ़ावा देने का रहा था। यह रामायण धारावाहिक टी वी पर प्रसारित होता था।आदिपुरूष फिल्म सिनेमाघरों के लिए बनाई गई है जबकि फिल्म का उद्देश्य अधिक से अधिक लोग सिनेमा घरों में टिकट खरीदकर फिल्म आदि पुरुष देखने जाएंगे, तभी फिल्म का बिजनेस बढ़ेगा।  फिल्म की ओपनिंग और कलेक्शन को देखते ही किसी भी फिल्म को ब्लॉक बास्टर, हिट या सुपर हिट का तमगा मिलता है।

फिल्म ज्यादा से ज्यादा लोगो को अपनी ओर खींचे, अपील करे, इसलिए फिल्मों में डायलॉग पटकथा पर खास  जोर दिया जाता है।आदिपुरुष के लिए यह काम फिल्म इंडस्ट्री के सफल युवा गीतकार, कवि मनोज मुंतशिर को मिला। जिन्होंने इंडस्ट्री को कई हिट गाने दिए और कई एवार्ड भी जीते। लगता है कि दर्शकों को लुभाने के लिए कवि मुंतशिर  ने अपनी लेखन शैली में कुछ अधिक ही नयापन प्रयोग करना चाहा जो कि दर्शकों को बिलकुल नहीं भाया। 

क्योंकि ये आम दर्शक नहीं थे, ये राम भक्त है। ये राम की मर्यादा को पसंद करते है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही इनके आदर्श है। इन्हे राम की संयमित भाषा शैली ही पसंद है। फिर कोई हनुमान जैसा राम भक्त के मुख से असंयमित अमर्यादित अशोभनीय कैसे पसंद आ सकती है।

राम कथा अपने में बहती है, उसकी अपनी मौज है मस्ती है। जो मर्यादा सिखाती है ना कि किसी का अपमान करती है। रामायण धारावाहिक की कथा में अनावश्यक कोई डायलॉग नही था, गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरित मानस में लिखी चौपाइयों के अर्थ से ही रामायण के प्रसंग आगे बढ़ते हैं, बाल्मिकी रामायण आदि से भी संस्मरण आधारित कथा थी।

रामानंद की रामायण धारावाहिक ने प्रभु श्री राम की भक्ति की धारा  को प्रवाह करने का काम किया, आदिपुरुष की भाषा शैली ने  विरोध और विद्रोह का काम किया। अगर ये डायलॉग प्रभु श्री राम की भक्ति की भाषा में लिखे जाते तो इनकी अवश्य मिठास फैलती, इन्हें अगर डॉ कुमार विश्वास जैसा राम भक्त लिखता, तो अवश्य ही दूसरी रामायण बन जाती।

Thursday, December 2, 2010

समाज के माथे पर चिंता की लकीर है- बढ़ती आत्महत्या


शौक जीनें का है मगर इतना भी नहीं, कि जिंदगी तुझसे हर बात पर समझौता करुॅ। किसी शायर की यह लाइनें आजकल के तमाम युवाओं की जिंदगियों पर बखूबी दुरस्त नजर आती हैं। क्योंकि आये दिन किसी ना किसी की खुदखुशी की खबर समाचार पत्रों का अहम हिस्सा बनती जा रही हैं। बुजदिली कही जाने वाली आत्महत्या को आज ज्यादातर लोग गले लगाने को मजबूर हैं।
कभी खुदखुशी की अधिकतर खबरें प्रेम में असफल व्यक्ति ही करते थे, या फिर परीक्षा आदि में फेल होने वाले छात्र या छात्रा ही अपना जीवन समाप्त करना बेहतर समझते थे। आज के बदले हुए परिवेश में छोटी-छोटी बात पर ही लोग अपनी जान देनें में आमादा हैं, वह आगे की तनिक नहीं सोचते। पढ़े-लिखे बुद्धिमान माने जाने वाले लोग भी अपनी जान देने में आगे हैं। इनको अपने परिवार की भी कोई ंिचंता नहीं होती है, कि आखिर इनके बाद इनके परिवार पर क्या बीतेगी। इन सबको इससे कोई सरोकार नहीं होता, बस अपने आपको छुटकारा देना चाहते हैं। छोटे-बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक आत्महत्या जैसी खबरों का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ रहा है। समाज के माथे पर यह चिंता की बहुत बड़ी लकीर है, जिसके समाधान हेतु चिंतन बहुत आवश्यक है।
जिंदगी के झंझावातों से उबकर, संधर्ष की लड़ाई में अपनी हार समझ बैठे लोग आत्महत्या को ही बहुत आसान विकल्प में स्वीकार कर लेते हैं। जिंदगी के सभी मायने व जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर देते हैं। सबसे बेपरवाह होकर अपने जीवन की ईहलीला को एक झटके में ही समाप्त करना उचित समझते हैं। कुछ समय पहले के समाज में आत्महत्या के मुख्यतयाः आरोपी असफल व निराश प्रेमी या प्रेमिका अथवा हताश छात्र या छात्रा ही होते थे। जिनको नासमझ कहा जाता था। जिनको जीवन की दुर्लभ क्षमताओं व प्राप्तियों की कदर नहीं कर पाते हैं और नासमझी में अपना जीवन ही खत्म कर देते हें। आज का माहौल बहुत बदल रहा है, आत्महत्या करने वालों में पढ़े-लिखे, बी टेक, एम टेक डिग्री होल्डर भी शामिल हैं। कोई फांसी लगा रहा है, कोई जहर खा रहा है, कोई छत से कूद जाता है। अनेको किससे हैं, परिणाम होता है-खुदखुशी। देखा जाता है कि आत्महत्या करने वाले के दिमाग में अचानक तमाम झंझट दिखाई देने लगते हैं। कोई माली हालत ठीक न होने के कारण अपने आप को खत्म कराना ही मुनासिब समझता है। नौकरी-रोजगार ठीक से ना चल पाने के कारण कई लोग अपनी जिंदगी से उब कर ऐसा कदम उठा लेते हैं। किसी नें व्यापार में बड़ा धाटा उठा लिया, वह सदमे में आ गया। दिमाग में ऐसा असर हुआ कि उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति रखने वालों में अब किसी बड़ी वजह का होना जरुरी नहीं, अब यह पाया जा रहा है कि छोटी-छोटी बात, कहासुनी या किसी डाट-डपट का परिणाम भी आत्महत्या जैसा सरीखा हो रहा है। यहां तक कि इस काम में किशांेर वर्ग भी अपनी तुनकमिजाजी के कारण यह कृत्य कर डालते हैं।
किसी की मौत का कारण तो आत्महत्या हो सकता है, लेकिन आत्महत्या करने का आधारभूत कारण क्या हो सकता है, यह सबसे चिंतनीय बिषय है। मृत्यु तो हुई सांस न ले सकने के कारण, फेफड़ों व आंतो में जहर पहुंचन के कारण या अत्यधिक रक्तस्राव होने के कारण। सवाल यह है कि इन आत्महत्या करने वालों की उस दौरान मानसिक स्थिति ऐसी क्यों हो रही है इसके पीछे आखिर क्या कारण हैं। यह आत्महत्या करने वालों के मनोविज्ञान को समझने का भी बिषय है। किसी का जीवन खत्म होने के बाद में तो हम आत्महत्या के पीछे के कारण को जान लेते हैं कि पीड़ित को गहरा मेंटल प्रेशर था, वह इनदिनों अत्यधिक तनाव में था व उसे काफी दिनों से अवसाद से ग्रसित था, इत्यादि। बात यह हो जाती है कि जीवन के रहते इनकी मानसिकता को समझनंे में सफल नहीं हो पाते हैं। इस बात को हमेशा नजरअंदाज करते हैं व केवल अपनी बात ही मनवाना चाहते हैं। एक तरह से कहा जाय कि हम अपने फैसले इनपर थोपते ही है। इनकी चाहत की किसी को चिंता नहीं होती है। ज्यादातर किशोर वर्ग के बीच यही बात देखी जाती है कि हम उन पर दबाव तो हमेशा बनाते हैं लेकिन क्या उनकी इच्छा, सार्मथ्य को समझकर उनका हौसला भी बढ़ाते हैं। आत्महत्या के किसी दूसरे मामले में भी यही होता हैं कि एक अकेला व्यक्ति कभी-कभी सबकी फरमाइश पूरी कर पाने मेें अक्षम हो जाता है व अपने आप को अनावश्यक दबाव में ग्रसित महसूूस करता हैं व धीरे-धीरे अवसाद में चला जाता है।
इतनी बड़ी तादात में हो रहीं आत्महत्या आज समाज के सामने यक्ष प्रश्न की तरह हैं। आज सबकी महात्वकांक्षाएं भी इस कदर बड़ी हैं जिनके आगे धैर्य, संयम, सहनशीलता सब कुछ धुटने टेक असहाय हो जाते हैं। और समाज का युवा वर्ग इस कदर आत्महत्या करने में आमादा हो जाता है कि उसे किसी की कोई परवाह नहीं होती है। आज आत्महत्याओं के आंकड़े इतने बड़े होते जा रहे हैं जिनसे आहत परिवार व पूरे समाज का तानाबाना बिगड़ना स्वाभाविक है।

लाइफ में लाइन ऑफ कन्ट्रोल का होना जरुरी


हर चीज की एक हद होती है। जब भी किसी चीज की हद या सीमा पार हो जाती है, तब स्थिति और भी तनावपूर्ण हो सकती है और नियंत्रण से बाहर भी। यही है जिंदगी की लाइन ऑफ कंटोल। जो हमारी जिंदगी की हर छोटी-बड़ी चीजों से सीधे जुड़ी होती है। धर-बाहर हर जगह हमें रोज इनसे दो-चार होना पड़ता है। हमारा और आपका रोज इनसे आमना-सामना होता है। बात चाहे कहीं की भी हो, कोई भी व्यक्ति इनसे बचने का अपवाद नहीं हो सकता है। हर एक व्यक्ति इनसे जूझता हुआ दिखाई देता है। कोई भी चीज इस एल ओ सी को पार कर दे और जीवन की तमाम परिस्थितयां उलट जाएं। या आउट ऑफ कन्ट्रोल हो जाएं, इससे पहले ही क्यों न एक जरुरी कदम उठाया जाय। किसी भी स्थिति से निपटने के लिए उस पर टेक कन्ट्रोल पहले ही कर लिया जाय, यानि की नियंत्रण के अंदर।
हर एक चीज की सीमा है। सीमा रेखा जैसे ही पार होती है, दिक्कतें वहीं से शुरु हो जाती हैं। यह बात किसी एक जगह की या फिर किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है। यह वाकया किसी भी जगह व किसी के साथ भी हो सकता है। इसमें सभी लोग शामिल हैं, कोई भी इनसे अछूता नहीं है। बात चाहे किसी के धर की हो, जहां पर परिवार के कई सदस्य एकसाथ रहते हैं। परिवारिक रिश्तों के बीच भी अक्सर ऐसी अनचाही स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिनसे तनाव होने की पूरी संभावना बन जाती है। इससे पहले कि पूरा माहौल अप्रिय हो जाय, हमें तुरंत सबकुछ नियंत्रण में करना होता है। यह कदम परिवार के हर एक रिश्ते व सदस्य के हित में एक विवेकपूर्ण प्रयास होता है। हम धर के बाहर भी ऐसी ही स्थिति का सामना अक्सर करते हैं- आफिस में अपने सहकर्मियों के साथ में, बॉस या उच्च अधिकारियों के बीच में व अन्य वार्तालाप या लोकव्यवहार को निभाने वक्त भी किसी को अपनी सीमा या हद को लांधना उचित नहीं कहा जा सकता है। किसी भी सामान्य या असामान्य धटना की एल ओ सी किसी भी तरह का नुकसान न कर दे, इस बात का भी ध्यान रखना अति आवश्यक हो जाता है। मामला धरेलू जिम्मेदारियों के निभानें का हो या फिर नौकरी-रोजगार में। नियंत्रण में सबकुछ हमको ही रखना पड़ता है, नही ंतो इसका खामियाजा भी हमको ही उठाना पड़ता है। अपनी रोजी-रोटी कमाने के बीच में ही कभी धरेलू समस्याएं भी आड़े आ जाती हैं, जो स्थिति को तनावपूर्ण कर सकती है। हमारी जिंदगी पर इनका कोई प्रतिकूल असर दिखे, इससे पहले ही यह जरुरी है कि हम इन पर काबू पा लें व स्थिति को नियंत्रण में कर लें। बच्चों की आदत में सुधार लाने के लिए भी उन पर नियंत्रण रखना होता है ताकि बच्चा कहीं बिगड़ ना जाय। धर बाहर हर जगह हमें ही इन सब चुनौतियों के बीच में ही अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना होता है।
अक्सर हमें यह एहसास होता है कि अब हमारे वश में कुछ भी नहीं रहा। सबकुछ हमसे पार हो गया। स्थिति तब और भी भयावह होने लगती है जब हम असहाय हो जाते हैं। इसी समय जरुरत होती है असल रुप में नियंत्रण रखने की। यह ऐसे होता है जैसे हम कोई गाड़ी चला रहे हों, और अचानक हमारी गाड़ी बहक जाती है। धबराहट में दुर्धटना भी हो सकती है। जबकि गाड़ी की रफतार को कम करके उसपर नियंत्रण रखा जा सकता है। ब्रेक लेकर गाड़ी को रोका जा सकता है, ताकि उसपर हमारा कन्ट्रोल बना रहे व किसी भी दुर्धटना से बचा जा सके। इसीलिए तादात, सीमा या हद को नियंत्रण रेखा कहा गया है। जैसे ही कोई यह नियंत्रण रेखा पार कर जाता है, वह तुरंत ही जोखिम वाले क्षेत्र में पहुंच जाता है और खतरे वहीं से शुरु हो जाते हैं। आदमी के लिए जीवन में स्वास्थय सबसे अमूल्य बताया गया है। इसलिए स्वास्थय के प्रति भी सचेत होकर नियंत्रण रखने की आवश्यकता होती है। बुरा खान-पान तो हमारंे शरीर के लिए नुकसानप्रद है ही, साथ ही तादात से ज्यादा अच्छा खाना-पीना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता है। क्योंकि सीमा के बाहर कुछ भी अच्छा नहीं होता है, वह अपना बुरा असर दिखाता ही है। मेडिकल साइंस भी यही कहती है कि शरीर, दिमाग व पेट सबकी अपनी क्षमता होती है, इनपर अत्यधिक बोझा डालने से यह अनुकूल परिणाम नहीं दे सकते हैं। जिसका उदाहरण ही हैं कि आजकल छोटी उम्र के लोग भी मोटापा, ब्लड प्रेशर व डायबिटीज जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं।
अब आवश्यक है कि हम हर चीज की तादात को अच्छी तरह से समझें तथा उसकी सीमा को पहचानें। अमूल्य जिंदगी के किसी भी हिस्से को डेन्जर जोन में पहुंचने से पहले ही उसपर अपना नियंत्रण बना लें। क्योंकि शुरुआती तौर पर एक चिंगारी को केवल एक कप पानी डालकर बुझाया जा सकता है, नही ंतो इससे भड़की आग पर काबू पाना या नियंत्रण करना मुश्किल भरा हो सकता है।

Friday, November 19, 2010

जनहित में कैसे होगा राखी का इंसाफ


इन दिनों राखी सावंत फिर खूब चर्चा में हैं। मीडिया और खबरों में कैसे रहा जा सकता है, यह बात राखी जी अच्छी तरह से जानती हैं। अखबारों की सुर्खियां हों या फिर टी वी शो। इन सब में बहुत माहिर हैं राखी सावंत। आइटम गर्ल के नाम से विख्यात राखी हमेशा अनेक विवादों के बाद भी चर्चा में बनी रहती हैं। वह लोगों के बीच में बने रहनें का तरीका ढूंढ ही निकालती हैं। बात चाहे कैसे भी विवाद की हो, राखी को मीडिया में कवरेज भी खूब मिल जाती है।
राखी सावंत के काम करने के तरीके भी अजीब व निराले होते हैं। सीधे व सादे तरीके से वह कोई भी काम नहीं करती हैं। अभी कुछ समय पहले राखी सावंत नें अपने जीवन साथी की खोज के लिए एक टी वी चैनल पर ‘राखी का स्वयंवर‘ कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। जिसकी चारो तरफ खूब चर्चा रही। अब मैडम राखी नें एक नई पेशकश करी, जिसका नाम है ‘राखी का इंसाफ‘। एक चैनल पर प्रसारित इस कार्यक्रम में राखी सावंत जज की भूमिका में हैं, जो लोगों के आपसी झगड़े निपटाती हैं।
कितना अजीब संयोग होता है कि तमाम लफड़ों व झगड़ों में रहने वाली राखी सावंत अब खुद दूसरों के विवादों को सुलझानें व समझौते का काम राखी का इंसाफ कार्यक्रम के माध्यम से करती दिख रही हैं। बिंदास जीवन जीने वाली राखी नें कार्यक्रम में इंसाफ मांगने वालों के जीवन के गंभीर व नाजुक पहलुओं को समझनें का जोखिम भरा जिम्मा तो ले लिया है। अब देखना यह है कि वह इस काम में किस तरह खरी उतरती हैं। आइटम गर्ल के नाम से मशहूर अभिनेत्री राखी सावंत जितना किसी कार्यक्रम में नहीं दिखाई देतीं हैं उतना विवादों में धिरी रहती हैं। एक समय पहले राखी सावंत जी नें अपनी शादी रचानें के लिए ‘राखी का स्वयंवर कार्यक्रम चलाया था। उस समय ऐसा लग रहा था कि अब राखी अपने जीवन साथी को चुन ही लेंगीं। जिसके लिए उन्होंने शो में आये प्रतिभागियों के साथ खूब बातें करीं, धूमी-फिरी, नाच-गाना किया और उनके धर तक गईं। और अंततः भारतीय मूल के कनाडा में बसे बिजनेस मैन इलियास को सेलेक्ट किया। उनके साथ इंगेज्मेंट भी हो गई। फिर बाद में शादी का क्या हुआ। इलियास के साथ शादी की तारीख कौन सी निकली, कब करंेगी शादी। इन सबका कुछ पता नहीं। अपनी शादी को सच बताने वाली राखी सावंत का यह हाई प्रोफाइल प्रोग्राम केवल पापुलारिटी शो था, या वाकई स्वयंवर। यह तो आखिर राखी ही जानती हैं। राखी जी की शादी हो न हो, पर शो हिट हो गया। अब बारी आई नये शो की, और उन्होंने शुरु किया ‘राखी का इंसाफ‘। उन्होंने अपनी अलग अदालत बना दी। उनकी अदालत में गवाह भी होते हैं, और सबूत भी दिये जाते हैं। अदालत में पहरेदार की तरह उनके यहां निजी सुरक्षाकर्मी के रुप में ‘बाउंसर‘ भी मौजूद रहते हैं। इस कार्यक्रम में ज्यादातर लोग फिल्मी या फिर छोटे पर्दे से जुड़े कलाकार होते हैं। जो मुंबई यानि कि फिल्मी नगरी में स्ट्रगलर कहे जाते हैं। ऐसे में इनको कोई नहीं जानता है। किसी भी तरह से ये लोग जल्द से जल्द अपनी पहचान व कॅरियर बनाना चाहते हैं। कोई छोटी बात या विवाद के सहारे भी नाम कमाया जा सकता है। आपसी झगड़े या विवाद करना उतना महात्व नहीं रखता है, जितना फायदेमंद होता है उन बातों के माध्यम से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना तथा किसी भी सूरत में चर्चा बटोरना। अपनी पहचान बनाने के लिए यही संधर्षरत कलाकार इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने जा पहुंचते हैं। लेकिन, दुर्भाग्यवश इनकी चपेट में झांसी जिले का नवयुवक लक्ष्मण आ गया। जिसके लिए जज बनीं राखी सावंत नें अमानवीय, अभद्र व अशिष्ट भाषा का प्रयोग किया। जिससे उसको ऐसा बड़ा आधात पहुंचा कि उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
राखी का कोर्ट-रुम ऐसा है जहां न तो कोई मर्यादा है और न ही कोई लोक-लिहाज का डर। सभी बिंदास हैं। कोई किसी पर जूते या चप्पल फेंकता है, तो कोई किसी को मारने दौड़ता है। मार-पीट के साथ गाली-गलौज तो आम बात है। इंसाफ की देवी बनीं राखी सावंत का अंदाज खुद में बेतुका व अभद्र दिखता है। राखी के इस कार्यक्रम को शुरुआती दौर में लोकप्रियता तो नहीं परंतु चर्चा खूब मिली। इंसाफ के नाम पर अभद्र, अश्लील व फूहड़ टिप्पणियों के चलते इनके कार्यक्रम में संकट के बादल मंडराने शुरु हो गये हैं। देश के कई जिलों से इस कार्यक्रम व आयोजकों के खिलाफ याचिकाएं व मुकदमे लिखने भी शुरु हो चुके हैं। देखने वाली बात यह भी है कि महज अपने चैनल की टी आर पी बढ़ाने के चक्कर में टी वी चैनल भी क्या कार्यक्रम का कन्टेंट नहीं देखते हैं। गंभीर मसला यह भी है कि रियलिटी शो के नाम पर फूहड़ता व अश्लीलता से जुड़े कार्यक्रम आम दर्शकों के बीच परोशना जनहित में कितना हितकर हैं व कैसा मनोरंजन देना चाहते है यह भी अहम सवाल है?

Sunday, October 31, 2010

मोटिवेट करने की क्षमता बेजुबान चीजों में भी


जब हमारा शरीर थकने लागता है, मन अचानक धबरा जाता है कि फलां काम में सफलता मिलेगी या नहीं। तभी, मन को मोटिवेशन की तुरंत आवश्यकता पड़ती है। यही मोटिवेटिंग प्वाइंट ही हमें पीछे से हमारे लक्ष्य की ओर तेजी से ठकेलता है।
सफलता के पथ पर मंजिल को पाने की तीव्र इच्छा कई व्यवसायिक गुरु जगाते हैं तथा जोश भरने का काम करते हैं, जिनकी प्रेरक व उर्जा भरी बातों से लक्ष्य तक पहुंचने की लालसा बढ़ती जाती है। लेकिन, इसी बीच कुछ प्रेरणास्रोत व्यक्तियों के अलावा कई बेजुबान चाजें भी हमें मंजिल की ओर मोटिवेट कर देती हैं। इनमें एक अजीब से आकर्षण के साथ एक जबरदस्त तेजी भी देखी जाती है। और इस तरह से अपनी मन चाही चीज हासिल करने में इनका योगदान भी कुछ कम नहीं होता है।
जैसे हमारा शरीर मजबूत, हष्टपुष्ट व ताकतवर बनता है उचित खानपान से, उसी तरह हमारे इरादों को भी जरुरत होती है उर्जा व लगन की। जिसको विटामिन व प्रोटीन मिलता है समय पर मोटिवेशन मिल जाने से। हम सभी अक्सर दूसरों से प्रेरणा लेते हैं तथा इसके साथ ही खुद को मोटिवेट करने के नये तरीके खोज लेते हैं। सफलता का सफर बोझिल व नीरस न बनने पाये, इसके लिए अपने चारों तरफ से ही किसी एक को अपना मोटिवेटिंग प्वाइंट बनाना सफल होने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। क्योंकि अपने लक्ष्य के प्रति लगे रहने की प्रवृत्ति व आदत बहुत आवश्यक है। कोई अपना कॅरियर बनाने के लिए दिन रात पढ़ाई करता है कि एक दिन वह कुछ बन कर दिखायेगा, अच्छी नौकरी मिलेगी, पैसा होगा। यह सब बच्चे के माता पिता व गुरु भी उसे सिखाते हैं। लेकिन सही मायनों में उसकी इच्छा तब परवान चढ़ती है, जब वह अपने आस पास के किसी व्यक्ति को इस तरह से किसी मुकाम तक पहुंचते हुए देखता है। यहां से उसको सही मोटिवेशन मिलता है। इसके इरादों में अब और मजबूती व तेजी देखी जाती है। कोई सरकारी नौकरी या प्रशासनिक सेवा के लिए किसी को अपना मोटिवेशन बना लेता है, तो कोई व्यापार में मोटिवेशन के लिए टॉप बिजनेस मैन को अपना प्रेरक स्वरुप बनाता है। कोई स्पोटर््स में अपना कॅरियर बनाना चाहता है तो शिखर को छूने वाले खिलाड़ियों को देखकर मोटिवेट हो जाता है।
शरीर का विकास विटामिन व प्रोटीन से होता है, कॅरियर में आगे बढ़ने तथा अपनी इच्छाओं को जाग्रत रखने तथा इन्हें और बल देनें के लिए अपने मोटिवेशन की तलाश नितांत आवश्यक है। जिसके सहारे हम अपनी मंजिल तक हंसते मुस्कराते पहुंच सकते हैं। किसी विद्यार्थी का अलग मोटिवेटिंग प्वाइंट हो सकता है, तो किसी व्यापारी अलग तरीके से अपनी उर्जा ढूंढ लेता है। एक सफल व्यक्ति जाने अनजाने आसानी से किसी का मोेटिवेटर हो जाता है। इनके अन्दर असीम प्रेरक क्षमता व अनुभव का आकर्षण पाया जाता है। जिसके तहत एक सफल व उपलब्धिवान व्यक्ति को लोग अपना रोल-मॉडल बना लेते हैं, व उनके नक्शे कदम पर चलने से अपने आप को सुरक्षित भी महसूस करते हैं तथा अपनी मंजिल तक जा पहुंचते हैं। लेकिन इसी बीच कुछ बेजुबान चीजें भी बहुतों को अपने अनोखे तरीके से लुभाती हैं तथा आगे बढ़ने के लिए अनवरत प्ररित करती रहती हैं। मसलन, सड़कों पर फर्राटा मारती हुई चमचमाती हुई गाड़ियां भी किसी का मोटिवेशन हो सकती है। ये बेजुबान होते हुए भी लोगों को मोटिवेट करती हैं, और लोग भी इसको अपना टारगेट बना लेते हैं। लोग अटूट मेहनत करते हैं, अपना बजट बनाते हैं कि एक साल में या फिर दो साल के अंदर वह इसी तरह की कार खरीद ही लेंगे। किसी व्यक्ति का सपना अगर खुद का मकान बनाना है, तो वह दूसरों के मकान व बंगलों को देखकर मोटिवेट होता रहता है। दूसरों के मकान उसे हार्ड वर्किंग बनाते हैं। वह रोज वही मकान देखते हुए अपनी दुकान या काम पर जाता है, और सोचता है कि एक दिन उसका भी मकान ऐसा ही होगा। बड़ी दुकान या भव्य शो-रुम देखकर एक छोटा दुकानदार आर्कषित हो सकता है और भविष्य में किसी बड़े शापिंग काम्पलेक्स बनाने के लिए द्रढ़ संकल्पित भी हो सकता है। किसी भी प्रकार का मोटिवेशन किसी भी बड़े टारगेट की दुख और तकलीफों को कम कर देता है और मंजिल के प्रति चमत्कारिक आकर्षण पैदा कर देता है।
समाज में प्रेरणा, उर्जा व मोटिवेशन जहां लोगों से मिलता है, वहीं बिन बोलती चीजों से भी। यह भी हमारे मिशन को प्रेरणा देनें का काम करती हैं। जरुरत है तो बस इन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करनें में उचित इस्तेमाल करने की। निरंतर आगे बढ़ने व मनवांछित सफलता अर्जित करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति को और प्रबल बनाने की हरदम दरकार है। खेल का मैदान हो या राजनीति का, मनोरंजन का क्षेत्र हो या व्यवसायिक, कामयाब होने के लिए अपने-अपने तरीकों से स्वयं को मोटिवेट करने का रास्ता निकालने से हर मंजिल आसान हो जाती है।

Thursday, October 21, 2010

हंसी का बदलता स्वरुप


पहले की अपने संगी साथियों के साथ हंसी-ठिठोली की धंटो बातें अब सिर्फ यादों के अलावा और कुछ नहीं। आज हर कोई व्यस्त है, सभी की दिनचर्या बुरी तरह से बंधी हुई है। काम के चक्कर में आदमी दिनभर लगा रहता है। दिन के खत्म होने के साथ शरीर में थकावट के साथ मानसिक तनाव भी हो जाना कोई बड़ी बात नहीं होती। कहीं-कहीं पर काम धंधे के बीच या किसी गंभीर बातों के बीच हंसी मजाक को अच्छा नहीं माना जाता। नतीजन, धीरे-धीरे प्राकृतिक हंसी का माहौल खत्म होता जाता है और ढेरों बीमारियां इसके बदले में मिलती जा रही हैं।
अधिकतर लोग समझते हैं कि गंभीर बने रहने व दिखने में ही व्यक्तित्व में आर्कषण होता है। मेडिकल साइंस कहती है कि व्यक्ति का खुश रहना व हंसना तो स्वस्थ जीवन का आधार है। जिसके लिए हमें हंसी के नये बहाने व मौके अवश्य तलाशने होंगे। क्योंकि यह जिंदादिली की भी निशानी है।
कहतंे हैं कि जीवन हंसी के बिना अधूरा व बेजान सा होता है। हंसने से ही जीवन हंसता व मुस्कराता रहता है। लेकिन, सबसे विचित्र बात यह है कि हंसने का न तो किसी के पास पर्याप्त समय ही है, और न ही माहौल।
सब कुछ बस भागता जा रहा है। समय भी, और आदमी भी। एक पड़ाव के बाद दूसरा, फिर अगला। सुबह से शाम तक बस यही सब होता है। रात में थककर आदमी औंधे मुंह बिस्तर पर गिरकर सो जाता है। आखिर आदमी हंसे तो कब कहां और कैसे ! एक नजर इस पर डालें कि क्या हंसने की वजह भी परिवार से कहीं दूर तो नहीं होती जा रही हैं। किसी को पढ़ाई की चिंता सताती है तो कोई अपने कॅरियर के बारे में परेशान रहता है। किसी का काम-धंधा ठीक से नहीं चल पाता तो वह उलझन में फंस जाता है। किसी को व्यापार में भारी नुकसान हो गया तो उसके चेहरे की हंसी गायब हो गई। उधर किसी को फायदा नहीं हुआ तो वह मायूस हो गया। किसी के धर में उसके बच्चे बेरोजगार बैठे हैं, तो कहीं पर किसी की बेटियां बिन ब्याही बैठी हैं। इन सबके साथ लोगों के साथ परेशानियां भी कुछ कम नहीं हैं। कहीं-कहीं पर हंसने की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती है। हंसने की प्राकृतिक स्थितियां अगर नहीं दिखाई पड़ती है तो यह वाकई गंभीर मामला बन जाता है। क्योंकि जहां तक हंसी का मनोरंजन के साथ सीधा नाता है तो वहीं पर स्वास्थ्य के साथ भी इसका वही रिश्ता है। कोई आफिस में बड़ा अधिकारी है, इसलिए अपने कनिष्ठ कर्मचारियों के साथ हंसी ठिठोली करने से उसकी छवि और गरिमा व पद पर बुरा असर पड़ सकता है। किसी दूसरे मामले में सहकर्मियों द्वारा उसकी बात को महात्व न दिये जाने या अन्यथा में लेने का डर सताता है। इसलिए वह बड़ा अधिकारी अपने स्टाफ के साथ नहीं हंस सकता है। धर में बीवी और बच्चों के साथ भी यही बात होती है, उसके व्यक्तित्व को खतरा लगने लगता है। कल को उसके अपने बच्चे उससे नहीं डरेंगे, अगर उनके साथ हंस कर बात कर दी तो। फिर उसकी बीवी भी उसके काबू में नहीं रहेगी। उसके धर में बनाये गये अनुशासन का क्या होगा। इन सब बातों को देखने से ऐसा नहीं लगता कि हमने कहीं खुद ही अपने हाथों से ही हंसी की खुदखुशी कर दी हो। हंसी के संसाधनों में आई कमी को हमें अपने हित के लिए संजोना बहुत आवश्यक है। क्योंकि हंसी के प्राकृतिक वातावरण को जरुरी खाद पानी नहीं दिया जा रहा है। शायद इसीलिए यह चेहरों से गायब मालूम पड़ती है, और चेहरे गमगीन व बुझे हुए दिखाई देते हैं।
जैसे-जैसे प्राकृतिक हंसी के मौाकों व माहौल में कमी आने लगी, तभी समाज में हंसी का स्वरुप भी बदलना शुरु हो गया। जीवन में हंसी की जरुरत को समझने वालों नें इसके नये दरवाजे व रास्ते बना दिये। आफिस या धर पर हंसी किसी कारण न मिल सकी तो कोई बात नही। अब यह हंसी हास्य क्लब में दिखाई देती है। दिखने में तो हंसने का मात्र नाटक लगता है, हंसी बनावटी लगती है। परंतु, असरकारक होती है। यहां पर लोग हंसने का योगाभ्यास करते हैं। सुबह पार्कों में टहलते हुए लोग जब आपस में हंसी और जोरदार ठहाकांे साथ पेट पकड़ कर हंसते हैं, तब यह लोग अटपटे नहीं लगते। बल्कि इस बात का अहसास कराते हैं कि जीवन में हंसी की अत्यंत आवश्यकता है। ये सभी अपने जीवन में हंसी को बरकरार रखना चाहते हैं। बढ़ती हुई उम्र में भी तरोताजा बने रहने के लिए हंसने की कोई न कोई तरकीब खोज ही लेते हैं। पार्कों का हास्य योग हो या हंसी क्लब के ठहाके। या फिर धरों के ड्राइंग रुम या बेड रुम में कॉमेडी टी वी सीरियल या फिल्मों के माध्यम से मिलने वाली हंसी। वह बनावटी ही सही, परंतु तनाव के बोझ को हल्का जरुर कर देतीे है।

Friday, October 15, 2010

धर्म की आड़ में राजनीति क्यों


याद आ जाता है अयोध्या की विवादित भूमि के फैसले का दिन। पहले 24 सितम्बर, इसके बाद 30 सितम्बर को सड़कों पर कफर्यू जैसा माहौल। हर कोई अपने रोजमर्रा के खास जरुरी कामों को निपटाते वक्त अयोध्या के राम जन्म भूमि व बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के फैसले का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था। हर तरफ एक अजीब सी बेचैनी का आलम था तथा हर पल असमंजस भरा होता जा रहा था। संवेदनशील शहरों व इलाकों में धारा 144 लगी होने के कारण लोग एक जगह इकट्ठे नहीं हो पा रहे थे। परंतु अपने-अपने फोन या मोबाइल पर इस धटना से जुड़ी खबरों या कयासों का आदान-प्रदान जारी था। जरुरी नहीं कि फोन पर बतियाने वाले केवल एक ही वर्ग या संप्रदाय के ही हों। हिन्दू और मुस्लिमों के बीच भी फैसले को लेकर दोस्ताना बातचीत हो रही थी। कहीं-कहीं इसी क्र्रम में सन् 1992 में बाबरी मस्जिद बिध्वंश के बाद उठी दंगे व फसाद की लपटों का भी ख्याल आ जाता, जिसने कई प्रदेशों में तक संप्रदायिक बवाल व उत्पात मचा दिया था।
ईश्वर की कृपा से व अल्लाह की रहमत से इतने भयावह माहौल में इस बार ऐसा कुछ भी कहीं नहीं हुआ। पूरे देश में कहीं से भी कोई अमन और चैन के लिए बुरी व इकलौती खबर नहीं आई। जिसके लिए वाकई अल्लाह को मानने वाले व ईश्वर को पूजने वालों नें इंसानियत का परिचय दिया तथा न्यायालय के फैसले का सम्मान किया।
इस धर्मिक मुकदमे के 60 सालों के दौरान देखा जाय तो दोनों ही कौमों के लोगों नें इससे कुछ पाने के नाम पर खोया ही ज्यादा है। सन् 1992 की धटना के बाद इन 18 सालों में चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान दोनों ही लोग यह बात बहुत अच्छी तरह जान चुके हैं कि अब यह मुद्दा केवल धर्म तक सीमित नहीं रह गया है, इसके सहारे प्रदेश से लेकर केंद्रीय सत्ता तक के चुनाव लड़े जाते हैं। इस मुद्दे नें बीते इन सालों में कितनी ही सरकारें बनवाईं व गिर्राइं, क्योंकि अब इसका फायदा अपना-अपना वोट बैंक बढ़ाने तथा सियासत करने के काम आता है। इन सियासी चालों से अब देश की जनता अंजान नहीं रही। यह भी सच है कि जब कोई राजनीतिक दल किसी धर्म बिशेष से जुड़ता है, तब उसकी भूमिका सांप्रदायिक सी हो जाती है। जिससे केवल कट्टरवाद पनपता है तथा नफरत ही फैलती है। फिर हर तरफ तनावपूर्ण माहौल देखा जाता है। कोर्ट नें अपने इस अहम फैसले में आस्था को आधार बताकर जो फैसला दिया, उसने निसंदेह दोनों ही कौमों के लोगों के बीच नफरत को खत्म करने तथा आपसी सुलह का रास्ता खोला है।
देखा गया है कि इस फैसले को दोनों ही पक्षों नें सम्मान दिया। कहीं पर कोई हलचल नहीं हुई, सभी नें अमन व शांति का परिचय दिया। दंगा-फसाद का तनिक भी माहौल नहीं दिखा। हां, पूर्ण सहमति भी नहीं दिखी। इस पर भी सब कुछ शांत था। शांत नहीं दिखे तो वही चंद राजनीतिक लोग। जो इन्हीं पर अपनी सियासी बाजी खेलते हैं व हर वक्त इसी ताक में रहते हैं। इन लोगों को यह स्थिति जरुर बहुत अटपटी व अपची सी लगी। जहां पर अब सुलह की बात आगे बढ़ने लगी है, या फिर न्यायिक तरीके से हर कोई अपनी बात कहने को स्वतंत्र है। इसी बीच अपने आप को मुस्लिमों के हिमायती मानने वाले मुलायम सिंह यादव जी का यह बयान आ गया कि इस फैसले नें मुसलमानों को ठगा सा कर दिया। इस पर कोई ज्यादा बवाल मचता। इससे पहले मुस्लिमों नें ही मुलायम के इस बयान पर खासी आपत्ति दर्ज करा दी। इसका मतलब साफ है कि अब कोई भी इन राजनीतिक चालों में फंसकर बेवकूफ बनना नहीं चाहता।
मुकदमे के इतने सालों में जो युवा थे, अब बूढ़े हो चले हैं। कल के बच्चे अब युवा हो चुके हैं। फायदे और नुकसान की गणित सबको अच्छी तरह आ चुकी है। विवादित भूमि अयोध्या- जहां का यह पूरा मामला है। वहां का हर हिन्दू और मुसलमान सब एक साथ रहते थे और आज भी रहते हैं। उनको आपस में एक दूसरे से कोई दिक्कत नहीं होती। दिक्कत केवल बाहरी लोगों को है, और बाहरी दखलंदाजी ही माहौल को बिगाड़ती है। आज की अमन परस्त आबादी आपसी सुलह से पूरे मामले को निपटाने के लिए तैयार है। बात भी आगे बढ़ रही है। जनता ने ंतो समझदारी का परिचय दे ही दिया है। अब बारी देश के राजीनीतिज्ञों की है। इक्कीसवीं सदी की युवा जनता का यह ताजा संदेश देश की मुख्य धारा की राजनीति करने वालों के लिए किसी सबक से कम नहीं होगा। कि अब आपस में कोई भी धर्म और संप्रदाय के नाम पर लड़ना नहीं चाहता। राजनेताओं तथा अपने आप को जनता का सच्चा रहनुमा व हिमायती मानने वालों को लोकहित के लिए साफ सुथरे मुद्दे ढूंढने होंगे। वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की जनता अब अपनी कुर्बानी देना नहीं चाहती।