Wednesday, October 21, 2009

एक साथ मिलकर दिल से मनाएं दिवाली



आज के इस प्रयोगधर्मी दौर में पारिवारिक एकता को बनाये रखना हम सबके लिए बड़ी मांग है। हम सबकी जिम्मेदारी भी है कि आपसी सामंजस्य को हर हाल में बनाये रखें तथा हर दिल में प्रेम का दिया जलाने का प्रयास करें। तब निश्चित ही सभी लोग एक साथ मिलकर प्रेम भरे दिल से दिवाली मनाएंगे।

१४ साल वनवास काटने तथा रावण को मार विजय श्री प्राप्त करने के बाद भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन पर नगरवासियों ने अपने राजा रामचन्द्र जी का पूरे दिल से स्वागत किया। श्री राम की अयोध्या वापसी पर पूरा नगर दीपमालाओं व चमचमाते प्रकाश से जगमगा उठा था। हर ओर खुशहाली व चहल-पहल थी। हर एक के दिल में अपार खुशियां थीं। लोगों ने इस दिन को एक त्योहार के रूप में मनाया। आज पूरे भारत वर्ष में यह दिन दीपावली के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस प्रकार यह दिन अपार खुशियां, समृद्धि व पारिवारिक एकता का प्रतीक भी है।
रामायण व रामचरित मानस के अनुसार इस दिन के ठीक १४ साल पूर्व अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कैकेर्ई के मांगे एक वरदान के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को राज महल छोड़कर वनवास जाना पड़ा था। जिस दिन श्री राम ने अयोध्या छोड़ी, उस दिन पूरी अयोध्या में मातम छाया हुआ था। हर तरफ शोकाकुल माहौल, रोते-बिलखते लोग, आंखों मेंं आंसुओं का सैलाब तथा असहनीय पीड़ा लिए हुए लोगों ने श्री राम को न चाहते हुए भी अयोध्या से विदा किया। यह बहुत ही मर्मस्पर्शी घटना थी। पूरे अयोध्यावासी उस समय असहनीय पीड़ा से गुजरे थे। वहां के लोग श्री राम के बिछुडऩे से इतने दुखी व स्तब्ध थे कि बीमार पडऩे लगे। इसी तरह के असहनीय शोक के कारण राजा दशरथ का कुछ ही दिनों में ही निधन हो गया। अपना वनवास पूरा करने के बाद श्री राम जब १४ साल बाद अयोध्या लौटे तब पूरी अयोध्या में खुशियों की लहर दौड़ पड़ी। लोगों में अति उत्साह था। एक तरफ जहां श्री राम ने चौदह साल इधर-उधर जंगलों में काटे, वहीं पूरे चौदह साल अयोध्यावासियों के दिल में भी गम के बादल छाये रहे। अब मौका था- खुशियां मनाने का, आनंद व मस्ती का। सभी लोगों ने अपने-अपने घरों को खूब सजाया संवारा, सफाई, रंगाई-पुताई व नये-नये कपड़े पहन घरों में दीपमाला जलाकर पूरी अयोध्या को श्रीराम के स्वागत में जगमग कर दिया।
इसीलिए दीपावली का यह पर्व हम सब अपने पूरे परिवार के साथ मनाते हैं। यह त्योहार पारिवारिक एकता का भी सूचक है। एक परिवार के कई लोग अलग-अलग जगह व शहरों में रहते हैं, और इस दिन दूर-दराज स्थानों में रहने वाले सभी लोग एक जगह पूरे कुटुंब के साथ मिलकर बड़े हर्षोल्लास के साथ इस त्योहार का आनंद उठाते हैं। दीपावली का त्योहार पूरे परिवार के एक साथ मिल जुल कर खुशियां मनाने का है। हिंदू संस्कृति में इससे बड़ा दूसरा पर्व और कोई नहीं हैं जो एक साथ इतने उत्साह से मनाया जाता है। देखने वाली बात यह भी है कि अपने देश में बड़े-बड़े कुटुंबों में एक साथ किसी पर्व या अवसर को मनाने की परंपरा मात्र औपचारिकता बनती जा रही है। इसका प्रमुख कारण शायद परिवार का विघटन या टूटते-बिखरते परिवारों की स्थिति है। आज बड़े परिवार कई छोटे-छोटे परिवार में विभाजित हो रहे हैं। देखा यह भी जा रहा है कि ऐसे कुछ खास अवसरों पर भी लोग दिल से मिलकर एक साथ नहीं हो पाते। पहले संयुक्त परिवार की परंपरा को सभी लोग मिलकर एकसाथ निभाते थे, फिर संयुक्त परिवार से एकल परिवार का चलन प्रारंभ हुआ, तत्पश्चात इसके भी हिस्से होना शुरू हो गये। किसी संयुक्त परिवार की संरचना में सबसे बड़ी रुकावट आती है रहन-सहन को अच्छी तरह समझ पाने की कमी। यह हमारी ही कमी है कि हम इसके मतलब को अच्छी तरह नहीं समझ पाये हैं। इस पर गांधी जी ने भी कहा है कि परिवार के सदस्यों की एकजुटता से परिवार मजबूत होता है, परिवार के मजबूत होने से समाज मजबूत होता है और समाज के मजबूत होने से ही देश मजबूत होगा। इसीलिए हर एक परिवार का मजबूत होना अति आवश्यक है। दीपावली का यह पावन पर्व पारिवारिक एकता की इस तरह मिसाल भी है कि जब श्री राम की दूसरी मां कैकेई के पुत्र भरत को राजगद्दी व श्री राम को वनवास मिला था। जब श्री राम ने अयोध्या छोड़ी, उस समय भरत नगर में नहीं थे। वापस आने पर जब उन्हें श्री राम के वनवास जाने का समाचार मिला तो वह बहुत दुखी हुए तथा उन्होंने राज-पाठ नहीं स्वीकारा और वे उसी समय श्री राम को वापस लाने महल से निकल पड़े। वह श्री राम को वापस महल लाने में तो सफल नहीं हुए परंतु उनकी अनुपस्थिति में राज सिंहासन पर उनकी खड़ाऊ को रखकर राज्य का कार्यभार देखा। यह दोनों भाइयों के बीच आपसी प्रेम व एकता की अनूठी मिसाल थी। वहीं श्रीराम की अयोध्या वापसी पर पूरा नगर आज फिर एकजुट था। आज के इस प्रयोगधर्मी दौर में पारिवारिक एकता को बनाये रखना हम सबके लिए बड़ी मांग है। हम सबकी जिम्मेदारी भी है कि आपसी सामंजस्य को हर हाल में बनाये रखें तथा हर दिल में प्रेम का दिया जलाने का प्रयास करें। तब निश्चित ही सभी लोग एक साथ मिलकर प्रेम भरे दिल से दिवाली मनाएंगे।

Thursday, October 8, 2009

परम सुख की उपलब्धि का तरीका है ध्यान



जब हम ध्यान में होते हैं तो वस्तुत: हम शरीर रूप से होते ही नहीं हैं। जब हमारा ध्यान और मन इस शरीर से अलग हो जाता है, या यूं कहा जाय कि जब हम अपना वजूद पूरी तरह से मिटा देते है तब ध्यान की सच्ची उपलब्धि होती है। ऐसी स्थिति में पूरे अन्त:करण में एक अलग सुख की अनुभूति होती है। हम अपने अंदर एक विशेष धुन का अनुभव करते हैं।

आज विज्ञान और गणित में कई विधियां हैं, सब कुछ फार्मूलों पर ही आधारित है। अगर ऐसा हुआ तो यह होगा, अगर नहीं हो पाया तो फेल। सबकी अपनी पद्धति है, काम करने का अलग तरीका है। इसी प्रकार जीवन में भी सुख प्राप्त करने व इसे परम सुख बनाने के विशिष्ट तरीके को ही हम ध्यान कहते हंै। ध्यान के नियमित अभ्यास से ही हमें मन वांछित सफलता, धैर्य व साहस के साथ परम सुख की भी उपलब्धि हो सकती है।
वैसे, हम सबको अपने दैनिक जीवन में रोजमर्रा के घर से बाहर तक के काम-काज निपटानें के लिए ऊर्जा शक्ति की परम आवश्यकता होती है। इसी ऊर्जा शक्ति की कमी की वजह से कोई व्यक्ति कभी-कभी बोझिल भी दिखाई पड़ता है, जबकि नियमित रूप से ऊर्जा शक्ति का संचयन व वर्धन करने से ही व्यक्ति सुंदर, मजबूत व हमेशा तरोताजा दिखाई पड़ता है। ये सब अंदरुनी बातें हैं। जिनका इलाज केवल दवाओं व फल-मेवा आदि खाने से नहीं बल्कि हमारे शरीर के अंदर की मशीनरी के साथ अन्त:करण को शुद्ध, तंदुरस्त व चुस्त रखने वाली पद्धति का नाम है-ध्यान। घरेलू काम करते समय परम सुख की अनुभूति तथा बाजार आदि में काम में रहते हुए हमेशा परम सुख का अनुभव कैसे किया जा सकता है? इन सभी प्रश्नों का संतोष जनक उत्तर हमें नियमित रुप से ध्यान करने से अपने आप मिल जाता है। किसी व्यक्ति के अच्छी जगह पर रहने या अच्छा खाना खाने से खुशी हो सकती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह व्यक्ति सुखी भी हो। सुख का मतलब ही यही है कि व्यक्ति के ह्रदय व मन स्थल में किसी भी प्रकार की कोई पीड़ा न हो। यह भी अक्सर देखा गया है कि एक गरीब व्यक्ति के पास मकान का सुख नहीं है, गाड़ी नहीं है व पहनने को अच्छे कपड़े नहीं हैं। उनके पास कोई भौतिक संपदा भी नहीं है और न ही कोई सुख समृ़िद्ध का साधन, लेकिन फिर भी सुखी हो सकते है। वहीं दूसरी ओर अमीर व्यक्ति के पास घर, बंगला, गाड़ी व वैभव के सभी साधन मौजूद है, और फिर भी यह जरूरी नहीं कि वह अपने जीवन में पूरी तरह से सुख का अनुभव कर रहा हो।
जब हम ध्यान में होते हैं तो वस्तुत: हम शरीर रूप से होते ही नहीं हैं। जब हमारा ध्यान और मन इस शरीर से अलग हो जाता है, या यूं कहा जाय कि जब हम अपना वजूद पूरी तरह से मिटा देते है तब ध्यान की सच्ची उपलब्धि होती है। ऐसी स्थिति में पूरे अन्त:करण में एक अलग सुख की अनुभूति होती है। हम अपने अंदर एक विशेष धुन का अनुभव करते हैं। ठीक इसी प्रकार की अनुभूति व सुख का अनुभव अपने काम या व्यवसाय में भी किया जा सकता है। जब हम पूरे मन से अपने कार्य में लिप्त होते हैं और हमें किसी और चीज का जरा भी ख्याल नहीं रह जाता। बस काम के प्रति ही अपना पूर्ण समर्पण करते हैं, चाहे वह पढ़ाई लिखाई हो या फिर नौकरी रोजगार। ऐसे समय में हम अगर अनुभव करें तो देखेंगे कि हम वर्तमान में इतना डूब जाते हैं कि दूसरों के प्रति तथा अपना भी तनिक होश नहीं रह जाता। इस समय हमारे शरीर के अंदर ही अंदर एक विशेष धुन चल रही होती है तथा पूरा मन आनंदमय व असीम सुख का अनुभव करता है। परिणाम स्वरूप जब इसी सुख की आवृत्ति बढ़ जाती है और इस आवृत्ति की पुनरावृत्ति लगातार होती रहती है तब इससे प्राप्त होने वाला सुख परम सुख बन जाता है।
आज का मानव अपने जीवन में सुखी रहने के लिए कितना प्रयत्नशील है। घर बनवाता है, गाड़ी खरीदता है और तमाम ऐशो आराम के साधन भी इकट्ठा करता है। परंतु इन सबसे मिलने वाला सुख वस्तुत: यर्थाथ सुख नहीं बल्कि बनावटी है। जबकि असली सुख हमारे अंदर है, और हमें इसे ध्यान के जरिए बाहर निकालना है। इतने समय तक इसके ऊपर इतनी गंदगी व विचार रूपी कूड़ा-करकट डाल कर दबा दिया गया है कि जब तक इसके ऊपर पड़ी परतें नहीं हटायी जाएंगी तब तक अंदर की अनुभूति जल्दी नहीं हो सकती। एक जगह कोई मूर्तिकार रहता था, उसके घर के पास ही एक बड़ा पत्थर कई दिनों से पड़ा था। वह अक्सर उस पत्थर को देखा करता था। एक दिन मूर्तिकार ने उस पत्थर पर एक मूर्ति बनानी शुरू की। कुछ दिनों के बाद जब मूर्ति बनकर तैयार हुई तो जो कोई भी उधर से निकलता, उस मूर्ति की बहुत तारीफ करता। मूर्ति वाकई बहुत खूबसूरत बनी थी। ऐसे में एक व्यक्ति ने मूर्तिकार से पूछा कि आपने इस बेकार पड़े पत्थर से इतनी आकर्षक व खूबसूरत मूर्ति कैसे बना दी। इस पर मूर्तिकार ने कहा कि मूर्ति तो इस पत्थर के अंदर पहले से ही थी, मैने तो केवल इसके ऊपर के बेकार पत्थर को तराश दिया और वही खूबसूरत मूर्ति बाहर आ गई। इसी प्रकार हमें भी करना है कि हमारे अंदर विद्यमान वास्तविक सुख के उऊपर पड़े कूड़ा-करकट को ध्यान में ही बैठकर हटाना है। ध्यान के नियमित अभ्यास से सुख की संवेदनशीलता व अनुभूति बढ़ जाती है।

Monday, October 5, 2009

अमूल्य है गांधी जी का जीवन दर्शन



गांधी जी ने अपने जीवन में सभी धर्मों को बराबरी से सम्मान दिया क्योंकि वह भारत को सर्व धार्मिक राष्ट्र बनाने का सपना देखते थे। इसी के साथ उन्होंने सारे जीवन केवल सत्य का मार्ग अपनाया।
दे दी हमे आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। गांधी का मतलब- महान व्यक्ति, एक विचार धारा व सत्य-अहिंसा का पुजारी। एक साधारण से दिखने वाले पुरुष में अनेक असाधारण प्रतिभाओं का समिश्रण ही है- मोहनदास करमचन्द गांधी। जो आगे चलकर शांति के मसीहा के रूप में विख्यात हुए तथा अपनी जान की आहूति देकर भारत की आजादी का अपना लक्ष्य पा लिया। हिंदुस्तान की आजादी का सपना देखने वाले मोहनदास करमचन्द गांधी जी का जन्म पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। बनिया परिवार में जन्म लेने वाले इस बालक की आगे चलकर क्या हस्ती होगी, इस बात का किसी को तनिक भी अंदाजा नहीं था। गांधी जी अपने बाल्यकाल में बेहद शर्मीले व अन्तर्मुखी स्वभाव के थे। उनके असली संगी-साथी उनकी किताबें ही थीं। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही गांधी जी का बाल-विवाह कस्तूरबाई के साथ हो गया था। उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। स्कूल के दिनों में जिमनास्टिक विषय में रुचि न होने के कारण उस समय वह अपने बीमार पिता की सेवा करना ज्यादा पसंद करते थे। एक बार उन्हें जिमनास्टिक पीरियड में गैरहाजिर रहने के कारण दो आना का जुर्माना भी भरना पड़ा। अपनी सुलेख व हैंड राइटिंग से वह बहुत असंतुष्ट व शर्मिंदा रहते थे क्योंकि वह सुलेख को अच्छी शिक्षा का हिस्सा मानते थे। गांधी जी को अपने बचपन के मित्रों द्वारा मांसाहारी भोजन के लिए प्ररित किये जाते थे। उनके एक मित्र ने उनको बताया कि हम लोग मांसाहारी भोजन न करने के कारण ही कमजोर हैं, और अंग्रेज लोग मांसाहारी होते हैं। इसीलिए वे हम पर अपना शासन चलाने के लिए योग्य व सक्षम होते हैं। इन सब बातों से गांधी जी को बहुत पीड़ा पहुंचती थी। गांधी जी का परिवार वैश्णव था। उन्हें सच से बेहद लगाव था तथा इस बात का डर था कि उनके मांसाहारी होने की बात पता चलने पर परिवारजनों को बहुत आघात लगेगा। जबकि वह चाहते थे कि सभी लोग मजबूत व साहसी हो, जिससे कि अंगे्रजों को हराकर भारत को स्वतंत्र कराया जा सके। जब वह 16 साल के थे तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। उन्हें इस बात का अत्यंत दु:ख व आघात लगा तथा अपने आप में शर्मिंदा भी थे कि अपने पिता के अन्तिम क्षणों में उनके पास क्यों नहीं रह पाये? 1887 में गांधी जी के मेट्रीकुलेशन पास करने के बाद इंग्लैंड रवानगी से पहले उन्हें शराब, मांस और औरत से दूर रहने की कसम दिलाई गई। उस समय अंग्रेजी भाषा में ज्यादा अभ्यस्त न होने के कारण वह अंग्रेजों की बातों का मुश्किल से जवाब दे पाते थे। कुछ समय बाद गांधी जी इंग्लैंड की एक्जीक्यूटिव कमेटी ऑफ वेजिटेरियन में चुन लिये गये। इंग्लैंड से वापस आने पर गांधी जी को मां की मृत्यु का समाचार मिला। इस समय उन्हें पिता की मृत्यु से भी ज्यादा आघात पहुंचा। बंबई आकर उन्होंने अपनी वकालत शुरू की, लेकिन उनका मन वकालत करने में नहीं लगा तथा कुछ ही समय में बंबई छोड़कर राजकोट में अपना ऑफिस बनाया। जहां पर उन्होंने लोगों के लिए एप्लीकेशन व लेटर आदि ड्राफ्ट करने का काम शुरू किया। एक दिन एक ब्रिटिश अधिकारी, एक पॉलिटिकल एजेन्ट, जो साहिब कहे जाते थे के द्वारा अपमान तथा चपरासी द्वारा बाहर निकालने की घटना ने उनको हिला कर रख दिया। इसी बीच गांधी जी को पोरबंदर से एक कम्पनी का प्रस्ताव आया। जिसमें गांधी जी को साउथ अफ्रीका की कोर्ट में कम्पनी के एक केस के तहत वकीलों को सलाह देने के लिए लगभग एक वर्ष के पूरे खर्चे के साथ 105 पौंड देने की पेशकश की गई। गांधी जी इस प्रस्ताव से बिल्कुल संतुष्ट नहीं थे, परंतु देश छोडऩे व नये अनुभव के लिए साउथ अफ्रीका रवाना हुए। गांधी जी का सामाजिक व राजनैतिक जीवन-विदेशों मे रहते हुए गांधी जी को वहां पर रहने वाले हिंदुस्तानियों के बारे में बहुत हमदर्दी थी। गांधी जी ने प्रेटोरिया में रहने वाले भारतीयों के बारे में जानना चाहा तथा उन्होंने सभी भारतीय नागरिकों को अपने काम में सच्चाई को पहचानने की पहली मीटिंग करी। वहां पर काम करने वाले भारतीय व्यापारियों को पूरी सच्चाई के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहने के लिए प्रेरित किया। अपने तीन साल के साउथ अफ्रीका दौरे के दौरान गांधी जी ने विभिन्न धर्म, सम्प्रदायों एवं जातियों का तुलनात्मक रूप से गहन अध्ययन किया, और हर धर्म व जाति के प्रति उनमें विशेष आस्था बनी। गांधी जी ने अपने जीवन में सभी धर्मों को बराबरी से सम्मान दिया क्योंकि वह भारत को सर्व धार्मिक राष्ट्र बनाने का सपना देखते थे। इसी के साथ उन्होंने सारे जीवन केवल सत्य का मार्ग अपनाया तथा सभी से सत्य का अनुपालन करने का आह्वान भी किया। गांधी जी ने सत्य को कभी नहीं छोड़ा। गांधी जी कहते थे कि सत्य का मार्ग बहुत कठिन है। उस पर आसानी से नहीं चला जा सकता, चलने में अनेक दिक्कतें भी आती हैं, परन्तु अन्त में जीत सच की ही होती है। भारत की आजादी तथा हिंदुस्तान का भाग्य विधाता कोई राजा महाराजा, रण क्षेत्र का योद्धा, या साधू संत नहीं बल्कि दुबला-पतला एक बूढ़ा आदमी था। इस व्यक्ति का नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। आजादी के इस रचयिता के पास अंगे्रजों से मुकाबला करने के लिए न कोई हथियार था, और न ही अपने बचाव के लिए कोई ढाल। गांधी जी के पास था केवल सत्य का साथ व अदम्य साहस। वैसे गांधी जी के पास अपने आप को भोजन से वंचित रखने का अर्थात अनशन पर बैठने का ऐसा ब्रम्हास्त्र था, जो बड़े-बड़े ब्रितानियों को उनके आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर देता था। गांधी जी इतने सादगी पसंद व्यक्ति थे कि वह अपनी बात को कहने के लिए हाथ से लिखकर पत्र व्यवहार करते थे। उनमें इतना चुम्बकीय आकर्षण था कि जो कोई भी उन्हें निकट से जानता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। किंग मार्टिन लूथर गांधी जी से बहुत प्रभावित रहा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गांधी जी बहुत पसंद किये जाते रहे तथा हिंदुस्तान की इस हस्ती ने पूरे विश्व में अपना डंका बजाया। गांधी जी लोगों के बीच में शांति व न्याय प्रिय मसीहा के रूप में पहचाने गये। गांधी जी ने देश को आजादी दिलाई परंतु एक बड़ा डर भी उनको सताता था। और वह था, धार्मिक आधार पर आजाद हिंदुस्तान का बंटवारा। अंगे्रज शासक भी भारत छोडऩे से पहले हिंदुस्तान को बांट देना चाहते थे। जब कि गांधी जी ने बार-बार कहा था कि भारत के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने होंगे। गांधी जी का अंतिम जीवन-गांधी जी जीवन की अंतिम अवस्था में निरंतर अनशन पर बैठने से शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो गये थे। इस समय गांधी जी को बुरी तरह खांसी भी होने लगी थी। गांधी जी की शिष्या मनु गांधी जी के कमजोर व हांफते हुए शरीर को देखकर दुख से भर गईं। गांधी जी से खांसी की गोली खानेे को कहने से मनु डर भी रही थीं। परंतु उनकी हालत को देखकर उससे न रहा गया और मनु ने गोली खिलाने की बात कही। गांधी जी ने उत्तर दिया कि तुम्हें राम पर भरोसा नहीं रह गया है? खांसते हुए उन्होंने कहा कि यदि मैं किसी बीमारी से मर जाऊं, तो तुम्हारा कर्तव्य होगा कि सारी दुनिया से कहो कि मैं ढोंगी महात्मा था। अगर कोई मुझे गोली मार दे, और मैं गोली खाने के बाद आह किये बिना, होठों पर बस राम का नाम लिये हुए परलोक चला जाऊं, तब तुम कहना कि मैं सच्चा महात्मा था। शायद गांधी जी को अपने अंतिम समय का आभास हो गया था, इसीलिए उन्होंने मनु से वही प्रार्थना गीत गाने को कहा- न थको न हारो, आगे बढऩा स्वीकारो। रुकने का नही काम, बढ़ते जाओ प्यारों।
दे

Tuesday, September 29, 2009

रक्तदान को महादान बनाने के लिए जन जागरुकता जरूरी


कुछ प्रोफेशनल ब्लड डोनर्स ब्लड बैंक के वर्किग स्टाफ के साथ साठ-गांठ से हर महीने या दस-पंद्रह दिन में अपना खून बेचकर रुपए कमाते हैं। इन्हें लोगों की जान की कोई परवाह नहीं, ये सरकारी नियमों का माखौल उड़ाते हैं तथा खून का गंदा खेल कर रहे हैं।

रक्त-दान महादान कहा जाता है। रक्तदान करने वाला महान हो जाता है और रक्त पाने वाले को नया जीवन मिल जाता है। २२ सितंबर स्वैच्छिक रक्त दान दिवस के रूप में मनाया जाता है। देखा जाता है कि इस दिन अनेक समाजसेवी संस्थाएं या ब्लड बैंक स्वैच्छिक रक्त दान व जागरुकता शिविर का आयोजन करते हैं। इनका उद्ïदेश्य लोगों को रक्त दान के प्रति जागरूक करना और जरूरत मंद लोगों के लिए रक्त उपलब्ध कराना होता है। परंतु, कहीं न कहीं रक्त दान करनें से कमजोरी या किसी प्रकार की बीमारी हो जाने की गलतफहमी व भ्रांति अभी भी लोगों की सोच पर हावी है। इसके चलते अभी भी गरीब व किसी जटिल बीमारी से ग्रस्त मरीज को समय पर ब्लड सुलभ तरीके से उपलब्ध नहीे हो पाता।
जब कोई बीमार अस्पताल में रक्त की आवश्यकता व कमी से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है तब उसका परिवार रक्त की व्यवस्था के लिए दर-दर भटकता फिरता है। ऐसे मौकों पर खास रिश्तेदार, करीबी, दोस्त और जिम्मेदार पड़ोसी भी मुंह फेरने लगते हैं। इस समय तीमारदार परिवार के लिए व्यक्ति की बीमारी से ज्यादा बड़ी समस्या हो जाती है कि किस तरह मरीज के लिए खून की तुरंत व्यवस्था की जाय? सरकारी या गैर सरकारी ब्लड बैंक भी ब्लड एक्सचेंज करके ही खून मुहैया कराते हैं। अत: किसी भी ब्लड बैंक से खून लेने के लिये ब्लड डोनर की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में आसानी से कोई भी ब्लड देने के लिये तैयार नहीं होता है। एक-दो यूनिट ब्लड तो किसी भी तरह बिना किसी ब्लड डोनर के खरीदा भी जा सकता है, क्योंकि बगैर एक्सचेंज के एक यूनिट ब्लड की कीमत बहुत ज्यादा होती है। किसी भी जटिल बीमारी या स्थिति में जब ज्यादा ब्लड की आवश्यकता होती है तब डायरेक्ट खरीदना भी साधारण व्यक्ति या किसी पीडि़त परिवार के लिये आसान नहीं होता है। अब सवाल यह है कि इस समय अपने रिश्तेदार, मित्र या पड़ोसी खून देने से आखिर क्यों कतराते हैं? यह कैसी भ्रांति है कि हम किसी को खून देने से कमजोर या बीमार पड़ सकते हैं? जब कि हम यह अच्छी तरह जानते हैं तथा भली-भांति सहमत भी हैं और मेडिकल साइंस की रिपोर्ट भी यही कहती है कि एक स्वस्थ शरीर से एक यूनिट खून निकलने या किसी जरूरतमंद को दान करने से रक्तदाता के शरीर पर किसी भी तरह का दुष्प्रभाव नहीं देखा जाता बल्कि यह हमारे शरीर के तमाम पोषक तत्वों को और तंदुरुस्त करता है तथा शरीर पर किसी भी तरह की कमजोरी भी नहीं होती व कुछ ही दिनों में शरीर में रक्त फिर से तैयार हो जाता है। वही ब्लड डोनर तीन महीने के बाद अपनें शरीर से दुबारा ब्लड निकलवाने या डोनेट करने के योग्य व सक्षम हो जाता है।
स्वैच्छिक रक्तदान व जागरुकता अभियान के लिए सरकार करोड़ों रुपये हर साल खर्च करती है, परंतु इसका व्यापक रूप से प्रचार नहीं हो पा रहा है। शायद इसीलिए लोगों में रक्तदान के प्रति जागरुकता की विशेष कमी देखी जा रही है। आखिर गड़बड़ी कहां पर हो रही है यह भी देखने व समझने की बात है। रक्तदान से होने वाली किसी भी प्रकार की कमजोरी या बीमारी की भ्रामक भ्रांति को दूर करने के लिए स्वैच्छिक रक्तदान शिविर से अधिक रक्तदान जागरुकता पर जोर देना चाहिए तथा लोगों को रक्तदान से शरीर पर होने वाले लाभों को अच्छी तरह से समझाने का भी प्रयास चाहिए। इसी जागरुकता की कमी के कारण ही लोग स्वैच्छिक रूप से रक्त देने के लिए तैयार नहीं हो पा रहे हैं, जिसके कारण सरकारी या गैर सरकारी ब्लड बैंक में पर्याप्त मात्रा में रक्त का स्टाक नहीं हो पाता है। शायद इसीलिए ब्लड बैंक से मिलने वाले खून की कीमत बहुत ज्यादा होती है। किसी आकस्मिक घटना के समय गरीब व सामान्य आदमी के लिए खून की व्यवस्था कर पाना सहज नहीं है, क्योंकि कोई भी ब्लड बैंक बिना किसी ब्लड डोनर के खून नहीं देता है। रक्तदान जागरुकता की कमी के साथ कुछ प्रोफेशनल ब्लड डोनर्स ने अपने शरीर से खून निकलवाने का धंधा बना लिया है, ये लोग ब्लड बैंक के वर्किग स्टाफ के साथ साठ-गांठ से हर महीने या दस-पंद्रह दिन में अपना खून बेचकर रुपए कमाते हैं। इन स्टाफ को भी खून व रक्तदाता के किसी भी मानक व नियम-कानून की कोई चिंता नहीं होती। कई जगहों पर पाया गया है कि इन्हें लोगों की जान की कोई परवाह नहीं, ये सरकारी नियमों का माखौल उड़ाते हैं तथा खून का गंदा खेल कर रहे हैं। लोगों की जिंदगी से खेलकर गंदे व्यापार से ढेरों रुपया कमाना ही इनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। आधारभूत बात यह है कि मुख्यत: कमी खून की नहीं बल्कि लोगों में जागरुकता की है। सरकार, समाजसेवी संस्थाएं व ब्लड बैेंक सभी लोग एकसाथ मिलकर रक्तदान जागरुकता अभियान व्यापक तरीके से करें। लोगों में रक्तदान में प्रति जागरुकता व उत्सुकता ही देश में होने वाली रक्त की अनुप्लब्धता को दूर कर सकती है, जब लोग खुद अपनी मर्जी व अर्जी से रक्तदान करने लगे व रक्त के दान का असली पुण्य समझे तब जाकर ही रक्तदान महादान कहलाएगा। -

Saturday, September 19, 2009

मस्ती की पाठशाला है पूरा मानव जीवन



जिंदगी हर एक बात पर हमें कुछ ना कुछ सिखाती है तथा आने वाला हर एक पल हमारे लिए एक नया अनुभव बन जाता है। आज के इस अर्थयुग में पैसा कमाने के लिये हमें अपने नौकरी-रोजगार में कई तरह की मुश्किलों आदि का सामना करना पड़ता है। व्यवसायिक प्रतियोगिता व प्रतिद्वंद्विता के दौर में अपनी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का दबाव भी हम पर बना होता है, जिससे ही हम अपनी पहचान बना सकते हैं।

अपने स्कूल के दिनों में तो मौज-मस्ती सभी ने की होगी। उस समय न कोई चिंता और न कोई फिकर। उन दिनों न कोई भूतकाल होता है, और न ही कोई भविष्य। बस जो भी चल रहा होता है वही बच्चे जाते हैं। प्रत्येक बच्चा हर एक पल व हर एक क्षण को पूरी मस्ती के साथ जीता है। स्कूल में तो क ख ग का ज्ञान किताब से मिलता है, परंतु जिंदगी का क ख ग सीखने के लिये हमे जिंदगी की पाठशाला से रू ब रू होना पड़ता है। यह हमारे जीवन की ऐसी पाठशाला है जो कभी खत्म नहीं होती। इसमें हमें नित्य नये अध्याय सीखने को मिलते हैं। हम सब यहां स्टूडेंट की तरह होते हैं। आवश्यकता यहां पर भी वही है कि हम इस पाठशाला में भी पूरा मस्त होकर सीखें तो हमारी जिंदगी पूरी मस्ती की पाठशााला से कम नहीं लगेगी। हम सभी नेे स्कूल में मौज-मस्ती के साथ पढ़ाई की, फिर नौकरी-रोजगार की बात हो या घर-गृहस्थी का कोई भी पड़ाव, जिंदगी के हर कदम पर एक अलग तरह की मौज है तथा अनोखी मस्ती। अब सब कुछ हम पर निर्भर करता है कि हम इस जिंदगी की पाठशाला से कितना सीखकर उसका आनंद उठा पाते हैं। अगर हम अपने बचपन की ही बात करें तो आज भी हम अपने बचपन को याद कर प्रसन्न हो जाते हैं। उस जीवन में किसी भी तरह की कोई टेंशन नहीं और किसी भी बात का कोई झंझट नहीं दिखता था। यह शुरुआती फेज़ कितना आनंदमयी होता है, जिसमें हम सब बच्चे पूरी मस्ती में होकर अपने बचपन का लुत्फ उठाते हैं। स्कूली जीवन की पढ़ाई-लिखाई छूटने के बाद में हम नौकरी-पेशे आदि में आ जाते हैं। स्कूल के किताबी पाठ के बाद में अब हमें जिंदगी के वास्तविक व यर्थाथ अध्याय पढऩे पड़ते हैं। अभी तक हमने स्कूल में पढऩा-लिखना, लोक व्यवहार व नैतिकता आदि जो कुछ भी सीखा, वह सब कुछ हमें अपने जीवन में उतारना व ढालना होता है। एक तरह से देखा जाय तो स्कूल के बाद का हमारा यह जीवन बिल्कुल एक प्रायोगिक शिक्षा की तरह से है। जिस प्रकार कोई छात्र या छात्रा जब किसी प्रोफेशनल कोर्स की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद उसे कुछ समय इन्टर्नशिप करनी होती है। अगर हम ध्यान से अपने जीवन को देखें व जियें तो हमारे जीवन का यह पड़ाव भी पूरी मौज-मस्ती में जिया जा सकता है तथा बिना एक पल भी गंवाये हम इसका पूरा आनंद ले सकते हैं। जिंदगी हर एक बात पर हमें कुछ ना कुछ सिखाती है तथा आने वाला हर एक पल हमारे लिए एक नया अनुभव बन जाता है। आज के इस अर्थयुग में पैसा कमाने के लिये हमें अपने नौकरी-रोजगार में कई तरह की मुश्किलों आदि का सामना करना पड़ता है। व्यवसायिक प्रतियोगिता व प्रतिद्वंद्विता के दौर में अपनी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का दबाव भी हम पर बना होता है, जिससे ही हम अपनी पहचान बना सकते हैं। ऐसे में एक बात का ध्यान रखना बहुत आवश्यक हो जाता है कि हम किसी भी काम को तनाव में रहकर नहीं कर सकते हैं। नौकरी व्यापार में कई तरह का दबाव, वर्क लोड व बॉस का प्रेशर इतना सब होने के बावजूद हमें खुद अपने काम में सौ प्रतिशत परिणाम की अपेक्षा होती है, क्योंकि अब सवाल हमारी परफॉर्मेन्स का बन जाता है। ऐसे में केवल एक ही रास्ता दिखाई देता है कि हम अपने काम में ही एन्जॉयमेंट ढूढ़े। आनंदमग्न होकर अपने काम में तल्लीन हो जाना ही सफलता की गारंटी बन जाता है। इसको इस उदाहरण से समझें कि कि अगर हम किसी तनाव में हैं या किसी समस्या से ग्रस्त हैं, और हम उससे निकलनें का हल खोज रहे हैं। परिणाम यह होता है कि अक्सर हल तो मिलता नहीं और इसके विपरीत हम अपना तनाव और बढ़ा लेते हैं। इसी समस्या पर किसी दूसरे व्यक्ति से राय या सलाह लेनें पर वह व्यक्ति हमको इसका हल तुरंत बता देता है, क्योंकि उसका दिमाग उस वक्त किसी तनाव में नही रहता। इसका अर्थ यही है कि जब हम कहीं पर उलझे हुए होते हैं तो हमारा दिमाग भी इसी भटकाव में धूमता रहता है तथा किसी भी स्थिति का बारीकी से विश्लेषण व आकलन नहीं कर पाता है। अगर हम भी ऐसी किसी स्थिति में किसी भी प्रकार का तनाव व दबाव का अनुभव न करें तो हम भी इसका हल व तरीका ढूढऩें में समर्थ व सफल हो सकेंगे। वैसे हमारी जिंदगी के भी कई रूप है क्योंकि हमारी जिंदगी कई स्टेप्स में चलती है बचपन से किशोरावस्था, युवावस्था व फिर वृद्धावस्था। इन सभी स्टेज में क्रमश: बहुत बदलाव देखा जाता है। देखते ही देखते कल का बच्चा युवा हो जाता है और फिर प्रबुद्ध व्यक्ति बन जाता है। जिंदगी के बीच रहकर तथा उसके बीच हॅसखेल कर हम सब कुछ सीखते चले जाते है। जीवन के हर दौर में अगर हम नाचते-गाते चलें तो फिर हमें जिंदगी का सही अर्थ मिल जाता है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई हो या घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी, ऑफिस का काम हो या फिर नौकरी-रोजगार में परेशानी। सब कुछ केवल पार्ट ऑफ दि लाइफ है। यह सब केवल हिस्सा मात्र है, यही सब कुछ नहीं हो जाता है। परंतु हम अपनी समझ से इन्हीं को सबकुछ मानकर बेवजह ही परेशान हुआ करते हैं। जब कि यह हमने भी देखा है कि कोई भी परेशानी हमेशा नहीं रहती, कोई झंझट सदैव नहीं चलता। चलता है तो बस जीवन। हम किसी भी चीज को अपने सिर पर बोझ की तरह न लें। अगर हम इसे बोझ मान बैठे तो फिर जल्द ही थकने की संभावना हो जायेगी। जीवन यात्रा का रस कम हो सकता है। हम ऐसा समझें की यह सब ऐसी जिम्मेंदारियां है कि बस हमसे बन पड़ रही है, और हम करते जा रहे है। जो कुछ किया उसका कोई गुमान नहीं, जो भी नहीं कर पाये उसका भी कोई क्षोभ नहीं। फिकर केवल एक बात की होनी चाहिए कि हम अपनें जीवन के हर पड़ाव में कितना ज्यादा मस्त हो सकते हैं। जिस प्रकार बचपन की प्रारंभिक शिक्षा की बात करें तो आजकल बच्चों को पढ़ाई के तनाव से बचानें के लिये स्कूलों में प्ले ग्रुप सेशन होता है। जिसमें बच्चों में खेल की मस्ती के साथ पढऩे-लिखने की आदत डाली जाती है जिससे कि बच्चा पढ़ाई में एन्जॉय करे, बोझ समझ कर बोर न हो जाय। हमें चाहिए कि बाकी की जिंदगी को भी हम इसी तरह से जियें, जिंदगी की हर खुशी को हम सब साथ मिलकर सेलेबे्रट करें। जीवन को एक आनंद के उत्सव के रूप में समझे व जिंदगी के हर सबक को एन्जाय के साथ सीखते चलें।
ईश्वर नें हमें जो जीवन दिया है वह मस्त होकर जीने के लिये ही दिया है। उसमें झूम जाने व डूब जाने के लिये दिया है। अगर हम मस्त होकर जियें तो उसकी हर एक बात, जिंदगी के हर पल व रिश्ते का सही अर्थ आसानी से समझ सकते हैं। उसकी दी हुई हर सॉस में उसका अनुभव कर सकते हैं। फिर हमारा पूरा जीवन आनंद की मौजों से भरा-पूरा लगने लगता है। चाहे वह हमारा परिवार हो, रिश्ते हों या लोक व्यवहार सभी में हमें आनंद दिखेगा व असीम रस की फुहार भी दिखाई देंगी।

Thursday, September 10, 2009

देश-दुनिया में हर जगह पहचान हैं बेटियां


बेटे की जगह जन्म लेती है बेटियां।
कोमल, सहज व सहृदय होती हैं बेटियां॥
अब बेटे से कहीं कम नहीं है बेटियां।
हर घर का सम्मान है बेटियां॥
देश दुनिया में हर जगह पहचान है बेटियां।
स्वर्णिम दिशा में उडऩे का अरमान है बेटियां॥
न रोके इन्हें कोई, न लगाएं इनपे बेडिय़ां।
क्योंकि अब देश का स्वाभिमान हैं बेटियां॥

ज हर जगह नारी सशक्तिकरण की बात हो रही है। महिलाओं को आगे लाने व उनको बढ़ावा देने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है। हो भी क्यों न, क्योंकि देश की आजादी के समय से ही कितने ही आंदोलनों व स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर संघर्ष किया। आज के इस कॉरपोरेट युग में भी महिलाओं की हिस्सेदारी व भागीदारी कम नहीं आंकी जा सकती। देश के विकास में इनके सराहनीय योगदान की अपेक्षा करना बेमानी होगी। देश की तरक्की के लिए हर एक महिला का जागरूक होना बहुत आवश्यक हो गया है। हमें भी देश के भविष्य के लिए महिलाओं की तस्वीर को और मजबूती से पेश करना होगा।
अब महिलाएं केवल घर के कामकाज तक सीमित नहीं रहीं। ये महिलाएं अब अपने घरों से निकल कर बड़े-बड़े ऑफिस संभाल रही हंै। प्रशासनिक स्तर से लेकर खेल, व्यापार, नौकरी, अंतरिक्ष, मीडिया तथा देश-विदेश हर जगह महिला, नारी व बेटियां अपने दम पर अपनी व देश की अमिट छाप छोडऩे में सफल रहीं। साधारण व घरेलू महिलाओं के लिए ऐसी समर्पित महिलाएं सदैव प्रेरणास्रोत व मार्ग प्रशस्ति का भी कार्य करती हैं। साधारण महिलाएं या छात्रा इनसे सबक लेकर अपनी जिंदगी में कुछ बनकर देश के लिए कुछ कर दिखाने का हौसला भी रखती हैं। महिलाएं आज भारतीय राजनीति का एक अहम व सशक्त हिस्सा बनती जा रही हैं। इसका एक उदाहरण हमारे सामने श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं जो आज भारत की राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में हैं। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने तथा उन्हें आगे लाने के लिए अभी केंद्र सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया, जिसमेंं महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पंचायती चुनाव में ५० फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। इससे महिलाओं को राजनीति में आने के ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकेंगे तथा महिलाओं की दावेदारी तथा समग्र विकास और सशक्त तरीके से हो सकेगा।
इतना सब होने के बावजूद कहीं न कहीं कन्या भ्रूण हत्या देश के गौरव व स्वाभिमान को कलंकित सा करता जा रहा है। एक तरफ हम महिलाओं के योगदान से अभिभूत होकर गौरांवित महसूस करते हैैं, वहीं दूसरी ओर गर्भ कन्या को उसके जन्म लेने से पहले ही एक नारी की कोख में मारे दे रहे हैं। यह कितनी विडम्बना है कि एक नारी ही अपनी ही कुल के साथ कैसी दुश्मनी निकाल रही है? इतना ही नहीं एक पुरुष, जिसको एक नारी ने ही जन्म दिया है, केवल एक पुत्र की चाहत में उसी नारी के कन्या भ्रूण की हत्या उसके जन्म लेने से पहले कर दे रहे हंै। केवल एक बेटे की ललक आज समाज को देश के विकास में अपनी भागीदारी निभाने वाली बेटी का हत्यारा बना रही है। सच यह भी है कि आज की बेटी किसी बेटे से कम नहीं है। इसका मुख्य कारण वैचारिक संकीर्णता कहा जाए या फिर इसके पीछे और कोई खास वजह? इन सबके पीछे क्या कारण हैं? ये हमें देखने होंगे। यह हमारी सबकी सामाजिक जिम्मेदारी बन जाती है कि हम इस समस्या की मूल वजह को तलाशें व इसका हल खोजें। आज यह कन्या भ्रूण हत्या समाज में इतना संवेदनशील व वीभत्स रूप ले चुका है कि इसे संगीन अपराध की धाराओं में गिना जा रहा है। आज मनुष्य किसी कन्या को जन्म देने से इतना क्यों घबरा रहा है? क्यों इतना सहमा हुआ है? उसका डर समाज में बढ़ती हुई लड़कियों व महिलाओं के प्रति सामाजिक असुरक्षा की भावना से भी हो सकता है। क्योंकि आये दिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़, शारीरिक शोषण, मार-पीट व बलात्कार जैसे क्रूर व जघन्य अपराध आम होते जा रहे हैं। कन्या भ्रूण हत्या का दूसरा बड़ा कारण लड़कियों के विवाह में दिए जाने वाले दान-दहेज की सामाजिक कुप्रथा भी कुछ कम जिम्मेदार नहीं है। समाज में उपजे इस वर्ग विशेष के बीच के अंतर की खाई, आपसी प्रतिद्वंद्विता तथा हीन भावना के डर से बचने के लिए भी मनुष्य ऐसे कठोर फैसले लेने पर कभी-कभी मजबूर हो जाता है।
ऐसा लगता है कि शायद अभी तक हमारी सरकारें ऐसे माता व पिता को अपने विश्वास में नहीं ले पाई हैं। उनको सामाजिक सुरक्षा व अधिकार का भरोसा नहीं दिला पाई हैं जिसके ही परिणामस्वरूप लोग सांसत में रहकर अभी तक अपनी धारणाओं में परिवर्तन लाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। जब तक हमारे समाज में व्याप्त इन बुराइयों का खात्मा नहीं होगा, लोग आश्वस्त नहीं होंगे। महिला सशक्तिकरण के बुनियादी पहलू पर हमारा प्रयास और मजबूत तब हो सकता है, जब हम महिलाओं को उन पर होने वाले किसी भी तरह के सामाजिक व घरेलू अत्याचार से मुक्त करवा दें। किसी भी नारी का जीवन एक बेटी से ही आरंभ होता है, इसलिए हर एक बेटी को जन्म लेने दें, उसे पलने दें तथा उसे आगे बढऩे से न रोकें। कहा गया है कि नारी दुर्गा का ही रूप है। नारी के कई रूप हैं। नारी के रूप में ही मॉ है, बहन है, पत्नी है व बेटी है। इनके रहने से ही हमारे घर का सम्मान है तथा इनकी उन्नति, प्रगति व सशक्त उपस्थिति हमारे देश का स्वाभिमान है।
बेटे की जगह जन्म लेती हं बेटियां।
कोमल, सहज व सहृदय होती हैं बेटियां॥
अब बेटे से कहीं कम नहीं है बेटियां।
हर घर का सम्मान है बेटियां॥
देश दुनिया में हर जगह पहचान है बेटियां।
स्वर्णिम दिशा में उडऩे का अरमान है बेटियां॥
न रोके इन्हें कोई, न लगाएं इनपे बेडिय़ां।
क्योंकि अब देश का स्वाभिमान हैं बेटियां॥

Saturday, September 5, 2009

अनमोल जीवन का समझें मोल


वेद-पुराण भी कहते हैं कि 36 करोड़ योनियों के बाद हमें मनुष्य का जीवन मिलता है। दुनिया में कितने ही छोटे-छोटे जीव जंतु, पशु-पक्षी सभी सांस लेते हैं। हमारे चारों ओर अनेक प्रकार का जीवन देखने को मिलता है। ईश्वर की बसाई गई इस दुनिया में कई तरह के प्राणियों का वास है। अगर हम बारीकी से इन सबका विश्लेषण व आकलन करें तो हम पाएंगे क्यों मानव जीवन को ही अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। अगर हम प्रकृति को देखें तो हमें सुंदर-सुंदर हरियाली दिखाई पड़ती है।

ईश्वर की विश्वव्यापी संरचना में सबसे सशक्त जीवन केवल मनुष्य को ही मिला है। वैसे तो जीवन सभी के पास है जीव-जंतु, पशु-पक्षी सभी श्वास लेते हैं। मनुष्य भी श्वास लेता है। परन्तु मनुष्य के पास अपनी बात व्यक्त करने के लिए सबसे मजबूत माध्यम है, उसकी बोलचाल की भाषा। वह बातचीत कर अपने विचार व्यक्त कर सकता है। यह विशेष योग्यता व क्षमता किसी दूसरे जीव-जंतु या पेड़-पौधे के पास नहीं है। इन सबसे अलग मनुष्य को एक और चीज बड़ी अद्भुत मिली और वह है विचारशील मस्तिष्क। मनुष्य किसी भी चीज को महसूस व समझने के अतिरिक्त सोच व विचार भी कर सकता है। उसका चिंतन सबसे महत्वपूर्ण है, जो मनुष्य को अन्य किसी भी जीवन से बहुत भिन्न व अद्वितीय कर देता है।
वेद-पुराण भी कहते हैं कि 36 करोड़ योनियों के बाद हमें मनुष्य का जीवन मिलता है। दुनिया में कितने ही छोटे-छोटे जीव जंतु, पशु-पक्षी सभी सांस लेते हैं। हमारे चारों ओर अनेक प्रकार का जीवन देखने को मिलता है। ईश्वर की बसाई गई इस दुनिया में कई तरह के प्राणियों का वास है। अगर हम बारीकी से इन सबका विश्लेषण व आकलन करें तो हम पाएंगे क्यों मानव जीवन को ही अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। अगर हम प्रकृति को देखे तो हमें सुंदर-सुंदर हरियाली दिखाई पड़ती है, बड़े-बड़े पेड़ दिखाई देते हैं जो तेज हवा के झोंकों के साथ झूमते हुए हमसे अपनी भाषा में कुछ कहते नजर आते हैं। खुशबूदार बेल व फूलदार पौधे भी रंग-बिरंगे फूलों व अपनी महक से हम सबको अपनी ओर आकर्षित कर मन मोह लेते हैं। इसी से ही ये अपनी प्रकृति व स्वभाव को अभिव्यक्त करते हैं। उनमें अलग तरह का जीवन दिखाई पड़ता है। उनकी भाषा केवल उनकी खुशबू है। वे अपनी महक से ही हमसे बातचीत करते हैं। हम भी अपने घर-आंगन में फूलदार पौधों को लगाते हैं। खुशबूदार बेल रोपते हैं। फूल खिलने पर उनकी सुगंध चारों ओर फैलती है तो मन बहुत प्रसन्न हो उठता है तथा एक अलग तरह की शांति की अनुभूति होती है। ये सब फूल खूबसूरत दिखने के साथ अपनी मौन भाषा के साथ प्रेम व शांति का संदेश देते हैं क्योंकि फूल को प्रेम व शांति का प्रतीक भी कहा गया है।
पेड़-पौधे व फूलों में महसूस करने की अद्भुत क्षमता होती है। लगभग हमारी ही तरह, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति का तरीका बहुत अलग है। जो जल्दी हर एक की समझ में नहीं आ सकता है। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि किसी व्यक्ति को फूल व उसकी सुगंध का कोई असर नही पड़ता, जबकि दूसरा आदमी रंग-बिरंगे फूलों को देखकर व महक से अभिभूत होकर अपने को रोक नहीं पाता और पौधे के पास जाकर बैठ जाता है। पशु-पक्षी अपनी सांकेतिक भाषा से आपस में बातचीत कर लेते हैं, हमारे लिए यह केवल आवाज है लेकिन यह इनकी अपनी भाषा है। एक पक्षी या कोई चिडिय़ा अपनी आवाज से सैकड़ों चिडिय़ा अपने पास बुला लेती है, गाय या कोई जानवर अपने बच्चे को अपनी आवाज से अपने पास बुला लेती है। उनकी हर आवाज कुछ न कुछ कहती है। सभी पशु-पक्षियों की अपनी अलग आवाज है। ये आपस में बात करने के लिए इसी भाषा का प्रयोग करते हैं। यह बिल्कुल ऐसा ही है कि जैसे हम किसी ऐसी जगह जाते हैं, जहां की भाषा व बोली से हम अंजान है। वहां पर न हम बोल पाते हैं और न ही वहां की भाषा को समझ ही पाते हैं, लेकिन वहां के लोग अपनी भाषा में बातचीत करते हैं। हमें उनकी बातें समझ में नहीं आती केवल आवाज ही सुनाई पड़ती है। पशु-पक्षियों में महसूस करने की भी क्षमता होती है, वह हमारी तरह बीमार भी पड़ते हैं तथा इनको भी हमारी तरह दवा व मरहम की जरूरत पड़ती है। मनुष्य को मिली इस बड़ी सौगात की सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी सोच व विचारशील दिमाग दोनों एक दूसरे को बढ़ाने का भी काम करता है।
अगर किसी व्यक्ति की सोच अच्छी, बड़ी व सकारात्मक हुई तो उसका दिमाग भी इसी तरह से बढ़ता जाता है फिर उसकी बु़िद्ध उसका और विस्तार कर देती है, धीरे-धीरे यह एक प्रक्रिया की तरह काम करने लगती है। मनुष्य इस मिले दुर्लभ जीवन के अवसर का लाभ उठा सकता है क्योंकि उसके पास समझने की शक्ति व समझदारी भी है, जो अन्य किसी भी जीवन को नहीं मिली। इसको अपना कर वह अपना जीवन महत्वपूर्ण बना सकता है क्योंकि व्यक्ति अपनी अनुभूति व अभिव्यक्ति से बहुत बलवान है। वैसे तो जीवन में बहुत झंझट हैं, लेकिन यह भी शाश्वत सच है कि यह मानव जीवन भी करोड़ों साल व असंख्य जीवन के झंझटों के बाद मिला है। हमारा जीवन दूसरे किसी भी जीवन से बहुत अलग व महान है क्योंकि हमारे पास दृष्टि, जीभ, विवेक, सोच, समझ व सहनशीलता सब कुछ है। अब सब कुछ हम पर निर्भर है कि हम ईश्वर के इस उपहार स्वरूप जीवन को कितना संभाल पाते हैं तथा अपनी बुद्धि, समझ व सहनशीलता को अपने जीवन में कितना उतार पाते हैं, जिससे कि हमारा यह अमूल्य जीवन तथा इस जीवन की कोई भी घड़ी व्यर्थ व निरर्थक न होने पाये। मानव जीवन देखा जाए तो कठिन भी है क्योंकि अपने इस जीवन में अपने साथ पारिवारिक जिम्मेदारी भी निभानी होती है, साथ ही कहीं से आपसी सामंजस्य भी न टूटने पाये यह भी देखना होता है। पशु-पक्षी व जीव-जंतु दूसरों की भावनाओं को नहीं समझ सकते, हमारे अंदर वह शक्ति है कि हम समझ सकते हैं तथा दूसरों की भावनाएं भी न आहत हो, यह भी ध्यान रखना पड़ता है। जिंदगी की तमाम जिम्मेदारियां कभी-कभी मुिश्कलें व झंझावात भी पैदा कर देते हैं। यह हमारे लिए बोझ नहीं बल्कि हमारा परीक्षण करती हैं और यथार्थ यही है कि जो इन सबको हंसते-मुस्कराते पार कर जाता है, वह अपने जीवन में सफल हो जाता है और उसका जीवन सार्थक हो जाता है। आज जितने भी लोग महान हुए, उनका जीवन भी बिल्कुल आसान नहीं रहा या उनके पास कोई झंझट या समस्या नहीं रही। भारत ऋ षियों व मुनियों का देश कहा जाता है। इन सभी ने मानव जीवन की श्रेष्ठता को जाना तथा इसके मूल्य को अच्छी तरह समझ कर अपने जीवन को सफल किया। इस धरती पर जन्मे कितने ही लोगों ने इस सबक को सीखा, वे जिंदगी की मुश्किलों से तनिक भी नहीं डरे बल्कि उन्होंने इन सबका सामना किया तथा अपने इस महत्वपूर्ण जन्म को कभी विफल नहीं होने दिया और अपने महानतम कार्यों से इस जीवन को और मूल्यवान कर दिया।