Saturday, June 12, 2010

बड़े वर्ग की दरकार है सामूहिक विवाह



कई लड़कियों की शादी करने में तो पिता की कमर ही टूट जाती है। विवाह के लिए लिया गया कर्ज बाकी की जिंदगी को भी दुश्वार कर देता है। इन सब स्थिति से बचने के लिए जरूरतमंद परिवार की कन्याओं के खर्च बगैर विवाह के लिए सामाजिक संस्थाओं की भूमिका सराहनीय हो जाती है। कुछ वैवाहिक संस्थाएं योग्य वर-वधू हेतु बायोडाटा एक्सचेंज करते हैं।

कहा गया है कि किसी कमजोर, जरूरतमंद या असहाय परिवार की कन्या का विवाह करानें से बढ़कर कोई अन्य पुनीत कार्य नहीं है। इस बात का प्रमाण है कि आज हर छोटे-बड़े जिलों, कस्बों या शहरों में कई वैवाहिक संस्थाएं मिलजुकर सैकड़ों कन्याओं के हाथ सामूहिक विवाह के माध्यम से पीले कर रही हैं। जिनमें से कुछ सर्वजातीय वैवाहिक समितियां तथा कई सजातीय संस्थाएं क्रमश: सभी जातियों के तथा अपनी जाति के सामूहिक विवाह में सक्रिय हैं। ये संस्थाएं विवाह जैसे सामाजिक पुण्य कार्य में अपनी सराहनीय भूमिका निभाती हैं। प्रशंसनीय बात यह भी है कि अब इन सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रमों में अपेक्षाकृत अच्छी संख्या देखी जा रही है। इन संस्थाओं के बैनरतले शादियां कराने पर समय की बर्बादी, दान-दहेज व फिजूलखर्ची जैसी कुरीतियों से भी समाज को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि समाज का बड़ा वर्ग भी इसमें सम्मिलित हो ताकि कोई भी जरूरतमंद व कमजोर परिवार अपनी नजरों में हीन व हास का पात्र न महसूस करे। आज शादी-विवाह समाराहों में खर्च होने वाला अनाप-शनाप पैसा बिल्कुल पानी की तरह बहाया जाता है, जो कहीं-कहीं पर अप्रासंगिक सा लगता है। यह अनावश्यक खर्च फिजूलखर्च की श्रेणी में ही गिना जाता है। आज योग्य वर को पाने के लिए भी दान-दहेज के रास्ते पर चलने से भी नहीं बचा जा सकता है। दहेज के सामान की मांग व मोटी रकम दिये बगैर अच्छा जीवन साथी मिलनाआसान नहीं होता। सबसे पहले अच्छे दूल्हे की बड़ी कीमत होती है, कीमत को चुकाने की स्थिति में ही शादी की बात आगे बढ़ती है। नहीं तो, बात खत्म। अपनी जेब के हिसाब से दूल्हा ढूंढऩा पड़ता है क्योंकि आज दूल्हे खरीदे जाते हैं। कई जगह बड़े या सक्षम लोग अपनी मर्जी से लड़के पक्ष को दान-दहेज से लाद देते हैं। ऐसे लोग समाज में अपनी हैसियत का उच्च प्रदर्शन करते हैं, जिसमें अपना स्टेटस व रुतबा दिखाना भी खास मकसद होता है। अक्सर ऐसा दिखावटी प्रदर्शन विभिन्न वर्गों के बीच प्रतियोगिता का रूप भी ले लेता है। फिर किसी की बराबरी करने के लिए शादी समारोह में अपना भी रुतबा दिखाने के लिए आम आदमी कर्जदार भी बन जाता है। क्योंकि कई लड़कियों की शादी करने में तो पिता की कमर ही टूट जाती है, इस प्रकार विवाह के लिए लिया गया कर्ज बाकी की जिंदगी को भी दुश्वार कर देता है। इन सब स्थिति से बचने के लिए जरूरतमंद परिवार की कन्याओं के खर्च बगैर विवाह के लिए ऐसी संस्थाओं की भूमिका सराहनीय हो जाती है। कुछ वैवाहिक संस्थाएं योग्य वर-वधू हेतु परफेक्ट पेयर मैचिंग के लिए बायोडाटा एक्सचेंज करने का काम भी सुलभ कराती हैं। अपनी मनपसंद दूल्हा-दुल्हन का चयन होने तथा रिश्ता तय हो जाने से विवाह तक की पूरी जिम्मेदारी वैवाहिक संस्था की होती है। सामूहिक विवाह कराने वाले संगठन नव विवाहित जोड़ों को गुजर-बसर करने के लिए घर-गृहस्थी का जरूरी सामान विदाई के समय उपहार स्वरूप भी देते हैं। इतना सब होने पर भी सामूहिक विवाह कराने वाली संस्थाएं प्रचार व प्रसार के जरिये ऐसे परिवारों की खोजबीन में लगी रहती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद परिवारों की कन्याओं का विवाह कराया जा सके। परंतु, देखने में यह भी आता है कि अपनी लड़की की शादी आदि के लिए व्यवस्था-इंतजाम आदि न कर पाने पर भी कुछ परिवार सामूहिक विवाह में आने से कतराते है। इसका एक दूसरा पहलू भी हमारा समाज है, क्योंकि इन्हें समाज का डर भी सताता है कि अपने लोगों के बीच कहीं हंसी की बात न हो जाये। हमारे समाज की विडम्बना भरी विचारधारा यह भी है कि सामूहिक विवाह केवल निम्न वर्गों के लिए ही उपयुक्त है। क्योंकि जिनके पास शादी आदि के लिए खर्च की व्यवस्था नहीं है, वही लोग इसका लाभ लेने के योग्य हैं। जबकि सच यह है कि किसी समाज का निर्माण सभी वर्गों के एकसाथ समाहित होने पर ही होता है। दिखता यह है कि ऐसे सामूहिक सामाजिक विवाह समारोहों में बड़े वर्ग की हिस्सेदारी व सहभागिता नगण्य सी है। मध्यम वर्ग के लोगों के आयोजनों में आने से निश्चित तौर पर जरूरतमंद परिवारों की संख्या में और भी इजाफा होगा। सजातीय वैवाहिक संस्था से जहां पर जाति-विशेष को बल मिलता है, वहीं पर सर्वजातीय विवाह कराने से समाज की ताकत भी मजबूत होती है। सामूहिक विवाह का फायदा यह भी है कि इससे अनावश्यक खर्च की बचत के साथ दबावग्रस्त दान-दहेज देने की मजबूरी से भी छुटकारा मिल सकता है। जहां पर शादियों में दहेज एक अभिशाप है वहीं पर विवाह आदि पर किया गया अनाप-शनाप खर्च समाज के विभिन्न वर्गों के बीच हीन भावना भी पैदा करता है। सामूहिक विवाह को बढ़ावा देने तथा अन्य वर्गों को जागरूक करने की हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी भी बनती है। सामूहिक विवाह समाज में सामाजिक एकता व जागरुकता लाता है।

Thursday, June 3, 2010

पैसा-पैसा करते हैं, सब पैसे पर ही मरते हैं


हर व्यक्ति केवल पैसा ही पैसा मांग रहा है, जिसमें पारिवारिक रिश्ते, सगे-संबंधी व दोस्ती-यारी सभी रिश्तों पर पैसा शुरू से ही भारी रहा है। परंतु, अब रिश्ते खासतौर पर पैसे के तराजू से ही तोले जाते हैं। जिसके पास पैसा है, उसके पास व साथ लोगों की भीड़ होती है। जिसके पास पैसे की कमी है, वह अकेला व तन्हा देखा जाता है।

पैसे की जरूरत हर एक को है, और पैसे की आवश्यकता भी हर जगह है। बगैर पैसे के कोई भी काम लगभग नामुमकिन है। इस बात का प्रभाव हर जगह दिखाई देता है। आज के इस अर्थयुग व गलाकाट प्रतियोगी माहौल में पैसा कमाना आसान नहीं रहा। पैसा कमाने में आज तमाम जोखिम हैं। परंतु फिर भी ज्यादातर लोग अधिक से अधिक पैसा इकट्ठा करना चाहते हैं। इसी उद्देश्य के लिए व पैसे की ही खातिर दिनरात मेहनत करते तथा पैसे के पीछे भागते नजर आते हैं या फिर पैसे का अत्यधिक मोह इन्हें अपने पीछे भगाता रहता है। आज पैसा जिंदगी की बुनियादी जरूरतों के लिए सर्वप्रमुख देखा जाता है। मनुष्य के पास आय के साधन सीमित हैं, परंतु व्यय में बहुत अधिक असीमितता दिखाई पड़ती है। आय की तुलना में खर्च का प्रतिशत काफी बढ़ता जा रहा है। जिसका कारण निश्चित रूप से आपसी दिखावे की प्रतियोगिता भी है। अक्सर असीमित खर्च करने की प्रवृत्ति दूसरे को दिखाने के लिए विशेष तौर पर होती है। और इस तरह अपना स्टेटस सिंबल बनाने व दिखाने के लिए काफी हद तक फिजूलखर्च व अपव्यय भी किया जाता है। जो कि किसी सामान्य आय वाले परिवार के मासिक बजट को गड़बड़ा देता है। सीधी बात यह है कि इस दिखावे की दुनिया में लोग 'पॉम्प एंड शो' की प्रवृत्ति इस कदर अपनाते हैं कि अपनी असली हैसियत से कहीं आगे बढ़ चढ़कर खर्च करते हैं, जिसका असर यह होता है कि लोगों के पांव चादर के बाहर देखे जाते हैं। फिर बात इतने पर नहीं रुकती, और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोन व ब्याज पर पैसे लेकर आदमी कर्जदार होने पर मजबूर हो जाता है। पूरे मसले की जड़ है आमदनी अठ्ठनी, खर्चा रुपया। एक सर्वे की रिपोर्ट यह बताती है कि एक आम आदमी के खर्च करने की सीमा बढ़ गई है। इसी के तहत अब खरीदारी भी फैशन का रूप ले चुकी है। आम आदमी की जेब में अब पैसे कम क्रेडिट कार्ड ज्यादा मिलते हैं। अपनी जेब के अलावा लोन, ब्याज व क्रेडिट कार्ड आदि से खरीदारी करने को रुतबे की तरह से देखा जाता है। पैसे को कैसे भी हथियाना आज लोगों का परम लक्ष्य बन चुका है। वहीं कुछ लोग जल्दी से जल्दी अमीर व पैसा बनाने के लिए गलत काम करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। किसी को नुकसान पहुंचा कर भी अपना काम बनाना या पैसा ऐंठना ही एक मात्र मकसद होता है। पैसा ही कहीं-कहीं झगड़े व फसाद की जड़ भी बन जाता है। जिसके लिए लोग एक दूसरे को मरने-मारने पर भी मजबूर हो जाते हैं। पैसे की मोह माया लोगों पर इस कदर हावी है कि अच्छा-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता है, उद्देश्य केवल एक होता है कि किसी भी तरह पैसा आना चाहिए। पैसे का बोलबाला हर तरफ नजर आता है। हर व्यक्ति केवल पैसा ही पैसा मांग रहा है, जिसमें पारिवारिक रिश्ते, सगे-संबंधी व दोस्ती-यारी सभी रिश्तों पर पैसा शुरू से ही भारी रहा है। परंतु, अब रिश्ते खासतौर पर पैसे के तराजू से ही तोले जाते हैं। जिसके पास पैसा है, उसके पास व साथ लोगों की भीड़ होती है। जिसके पास पैसे की कमी है, वह अकेला व तन्हा देखा जाता है, उसको खास तव्वजो नहीं मिल पाती। शायद इसीलिए लोग अपनी पहचान बनाने को पैसा कमाने के लिए बहुत मेहनत-मशक्कत करते हैं। बहुत से लोग दिन के १८-१८ घंटे तक फील्ड व ऑफिस में काम करते हैं ताकि अधिक से अधिक पैसा कमाया जा सके। जिसका सीधे तौर पर प्रतिफल यह होता है कि अपने परिवार के लिए बड़ी मुश्किल से समय दे पाते हैं। यह पैसा ही है कि जिसको कमाने के लिए लोग अपना घर, गांव व देश से दूर हो जाते हैं, या अपने घर-परिवार व लोगों की याद आने पर भी नहीं पहुंच पाते या साथ में रह पाते हैं। कुल मिलाकर पैसे का चुम्बकीय आकर्षण ही लोगों को इस कदर अपनी ओर खींचता है कि वह अपनों से दूर होता जाता है। पैसा दोस्ती बनाता भी है, और आपस में दुश्मनी भी पैसा ही कराता है। शेक्सपियर नें एक जगह लिखा भी है 'मनी लूजेज इटसेल्फ, एंड फ्रेंडशिप ऑल्सो।Ó मतलब पैसा और दोस्ती दोनों एक साथ खत्म हो जाती है जब पैसे को अधिक महत्व दिया जाता है। किसी को जरूरत के समय पर आर्थिक मदद करना मानव स्वभाव व नैतिकता भी बताई गई है। परंतु देखने में कम ही दिखाई पड़ती है। पैसा बहुत तेज भागता है, उसकी चाल बहुत तेज होती है। इसलिए पैसे को पकडऩे के लिए आदमी पैसे की चाल से अधिक तेज भागना चाह रहा है। आज देश में प्रतिव्यक्ति आय का औसत ग्राफ बढ़ा है। यह सच है कि आम आदमी की आय बढ़ी है, परंतु खर्च उससे कई गुना अधिक है। बजट से बाहर का खर्च पूरे आय-व्यय का संतुलन बिगाड़ देता है, जो आगे चलकर जिंदगी के लिए काफी जोखिम भरा होता है।

हैलो! मैं आपकी आत्मा हूं मेरी आवाज सुनो


पूरे समय अगर हम सचेत व सजग रहें तो हम पाते हैं कि हमारे अंदर से एक आवाज आती है जो हमें पुकारती है। उसकी आवाज में अच्छे कार्यों को करने की प्रेरणा होती है व बुरे काम को करने से रोकती है तथा स्पष्ट रूप से मना करती है। हम महसूस करते हैं कि एक पल में वह अपना आदेश देती है। जिंदगी का यह क्षण बहुत नाजुक होता है, फैसला लेने की आवश्यकता होती है। एक निर्णय में जिंदगी बदल सकती है।

आज मोबाइल व फोन के बहुत यूजर हैं, ज्यादातर लोगों के पास फोन की सुविधा है। जिसमें दिनभर तमाम कॉलें आती हैंै। घंटी बजती है, फोन उठाकर बातचीत होती है। हम अपने फोन को हमेशा अपने नजदीक रखते हैं ताकि आने वाली किसी कॉल की घंटी हमें आसानी से सुनाई पड़ सके। परंतु, क्या हमने कभी सोचा या गौर किया है कि हमारी आत्मा भी हमें बीच-बीच में कॉल करती है, हमें पुकारती है। उसके बुलाने की घंटी ऐसी होती है कि हम सजग रहें तभी हम उस पर ध्यान दे पाते हैं, नहीं तो उसकी कॉल मिस्ड कॉल बनकर रह जाती है। एक अनुत्तरित कॉल हो जाती है, इस तरह से हमारे जीवन के लिए अन्तर्रात्मा की एक जरूरी व महात्वपूर्ण कॉल छूट जाती है। हमारी आत्मा बिल्कुल ठीक समय पर अपना संदेश हमें भेजती है। यह हमारी आत्मा की तरफ से आने वाले एसएमएस होते हैं, जिनको ध्यान से पढऩा बहुत जरूरी होता है और उससे अधिक आवश्यक होता है उस पर अमल करना। सिर्फ ढेर लगाने से या दूसरों को मैसेज फॉरवर्ड करने मात्र से अपना फायदा नहीं हो सकता है। जिस तरह से तमाम फोन कंपनियां हरएक छोटे-बड़े धार्मिक त्योहार, राष्ट्रीय पर्व या अन्य किसी अवसर पर एसएमएस भेजा करती हैं। उसी प्रकार हमारे शरीर के अंदर की आत्मा भी हमें हर एक छोटी-बड़ी सुख या दुख की घड़ी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपने मैसेज भेजती है। एक झटके में अनुभव हो जाता है कि हमें अचानक कुछ नया मिल गया। समय रहते हमने इस पर अमल कर लिया, तो उस समय अविस्मरणीय अनुभूति के स्वामी हो जाते हैं। पूरे समय अगर हम सचेत व सजग रहें तो हम पाते हैं कि हमारे अंदर से एक आवाज आती है जो हमें पुकारती है। उसकी आवाज में अच्छे कार्यों को करने की प्रेरणा होती है व बुरे काम को करने से रोकती है तथा स्पष्ट रूप से मना करती है। हम महसूस करते हैं कि एक पल में वह अपना आदेश देती है। जिंदगी का यह क्षण बहुत नाजुक होता है, फैसला लेने की तुरंत आवश्यकता होती है। एक निर्णय में ही पूरी जिंदगी बदल सकती है व सफल हो जाती है। किसी भी तरह का टालमटोल करने पर हमको कोई फायदा नहीं मिलता। अब यह हमारे ऊपर है कि हम उसकी कॉल को जरूरी मानकर अक्षरश रिसीव करते हैं या नकार तो नहीं देते हैं। वैसे इसमें भी कोई दोराय नहीं है कि आज इंसान इस कदर व्यस्त होता जा रहा है कि एक पल भी अपने लिए नहीं रख पा रहा है कि वह स्वयं से बातचीत कर सके। बाहरी लोगों से खूब बात होती है। हर वक्त इंगेज रहते हैं पर स्वयं की अपनी आत्मा से कनेक्टीविटी नहीं बन पाती। अगर कोई बात सुनाई भी पड़ी, तो हिम्मत नहीं बन पाती कि उस बात का पालन व अनुकरण किया जाय। रास्ता कठिन लगता है, प्राय: आसान वाला रास्ता चुन लिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि अगर उसके बताये गये रास्ते पर हम चलें तो आगे बढऩे की शक्ति भी वही देता है, फिर अच्छे बुरे की सब जिम्मेदारी उसी की बन जाती है। वही सब कुछ संभालता है। वह अपनी आवाज में कहता है कि केवल तुम इतना करो, बाकी सब मैं करूंगा। केवल पहली बार साहस दिखाने की आवश्यकता है, फिर इसकी भी कमी नहीं रहती। इसके बाद तमाम ऊर्जा व असीम शक्ति भी हम अपने अंदर महसूस करते हैं। जब तक अंदर से आने वाली आवाज को स्वीकार नहीं किया जाता, केवल तब तक वह कमजोर लगती है। एकबार भरोसा रखकर उसपर काम करने से ही उसकी असली शक्ति व मजबूती को आंका जा सकता है तथा अपने अंदर नई ताकत का तर्जुबा होता है। प्राय: मोबाइल पर मिस्ड कॉल को डायल कर छूटी हुई कॉलों पर बात करी जाती है। वहीं पर आत्मा की अनसुनी कॉल को फिर से सुनने के लिए चिंतन आवश्यक है। जिससे उसके द्वारा भेजे गये सभी संदेश व बातें स्पष्ट हो जाती हैं। चिंतन करने से किसी भी प्रकार की दुविधा व असमंजस की स्थिति स्वत: ही खत्म हो जाती है चिंतन का अभ्यास हमें आत्मा की स्पष्ट छवि महसूस कराता है तथा एक सही मार्ग दिखलाई पड़ जाता है। स्वयं के जागृत रहने से आत्मा भी जागी रहती है और आत्मा का सजग रूप ही परमात्मा है। सभी के शरीर में आत्मा का वास है। शारीरिक संचेतना व मन की निश्छलता से ही सजग आत्मा के साथ परमात्मा का भी सानिध्य प्राप्त हो जाता है। आत्मा एक जागृत प्रहरी का भी काम करती है। हमें जगाती है, सचेत करती है। हमें भटकाव से भी बचाती है। इसके समय पर बजने वाले अलार्म की आवाज को बहुत तवज्जो देने की आवश्यकता होती है।

सर्वशक्तिमान है...क्योंकि यह समय है



समय का चक्र पूरा होने पर ही किसी बच्चे का जन्म होता है, फिर किसी का वक्त आ जाने पर ही उसकी मृत्यु भी निश्चित ही होती है। समय के पास सबकुछ निश्चित है। समय की अलग सत्ता है, जिसपर किसी की विजय नहीं होती। समय को जीता नहीं जा सकता, केवल समय के साथ जिया जा सकता है।

क्त, यानि की समय। कल और आज के बीच वक्त। दिन और रात के बीच भी यही वक्त। यह समय ही है जो भूत और भविष्य के बीच में बना रहता है। हर वक्त बदलता रहता है यह समय। वक्त पूरी तरह से चलायमान है। यह किसी के वश में नहीं, और इस पर किसी का अंकुश भी नहीं। सभी पर राज करता है यह समय। कल जो था, वह आज नहीं। आज जो है, वह कल नहीं होगा। एकबार समय जाकर वापिस भी नहीं लौट पाता। हर एक तारीख इतिहास बनती जाती है और हर एक घटनाक्रम यादों के पन्नों में दर्ज होता जाता है। समय के इस भागते पहिए को रोकना भी किसी के बस की बात नहीं। छोटे से छोटा व बड़े से बड़ा व्यक्ति भी समय के आगे बौना दिखाई देता है। इसी समय के चक्र ने राजा, मंत्री व बड़े रसूखवालों के अहं को भी अपने पैरों पर ला दिया। यह वही समय है जिसने किसी को सड़क से महल तक पहुंचा दिया तो किसी का सिंहासन छीनकर देश निकाला दे दिया। इसलिए समय को समझना भी बहुत जरूरी है। समय जितना बलवान है, दूसरा कोई नहीं। अपने जमाने का सबसे ताकतवर इंसान भी समय के चलते एक समय बूढ़ा व असहाय हो जाता है। किसी वक्त का बलिष्ठ आदमी भी एक समय कमजोर व बेजान हो जाता है। दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान, जिसकी सुंदरता का कोई भी सानी नहीं होता। जिसकी अद्वितीय खूबसूरती की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होती। समय के फेर के साथ यह भी ऐसी नहीं रहती व दिखती है। समय का असर इस पर भी दिखाई देता है। सुंदरता भी समय के साथ ढलती जाती है। यही समय सुंदर त्वचा व आकर्षक काया को झुर्रीदार व बेजान कर देता है। एक समय पर अपनी किस्मत पर इतराने व फूले न समाने वाले की भी तकदीर इसी समय के चलते ही ऐसी करवट लेती है कि एक ही झटके में सबकुछ बदल जाता है। सबकुछ अपने एक इशारे पर नचाने वाला भी वक्त के किसी झंझावात में फंसकर चकरघिन्नी बनकर खुद नाचने पर मजबूर हो जाता है। समय अपना खिलंदड़ खेल हर वक्त व हर किसी के साथ हमेशा खेला करता है। कोई व्यक्ति समय के बहुत आगे निकल जाना चाहता है, तब स्थिति यह भी हो जाती है कि उसे कभी-कभी समय के काफी पीछे भी देखा जाता है। जीवन में भविष्य की योजनाएं बनाना व उसके अनुरूप सफलता पाने के लिए तो सभी सदैव प्रयासरत रहते हैं, परंतु सच यह है कि जब तक किसी काम होने का समय नहीं आ जाता, तब तक वह काम नहीं हो पाता। हकीकत भी यही है कि जब-जब जो भी होना है, वह तब ही होता है। किसी के भी जीवन में जिंदगी का हर दृश्य भविष्य के समय में छिपा होता है। समय-समय पर हर किसी की जिंदगी परत-दर-परत के रूप में सामने आती जाती है। और इसी समय से ही जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव भी सामने देखे जाते हैं। समय की ताकत को समझना बेहद जरूरी है क्योंकि वक्त की बादशाहत के आगे किसी और की तनिक भी नहीं चल पाती। समय के पास ही सबकुछ बदल देने की प्रबल क्षमता होती है। उम्र का बदलाव भी समय के पास है, मौसम भी समय के पहिए के साथ बदल जाता है। आज अगर किसी के पास परेशानी है तथा वह झंझटों से सामना कर रहा है, तो वक्त के बदलते ही उसकी परिस्थितियों में भी बदलाव देखा जाना संभव है। एक पल का गम कब दूसरे क्षण खुशी के ठहाकों में बदल जाय, किसी को पता नहीं। राम को भी जब राजसिंहासन मिलने वाला था तब समय के चक्कर में ही राज-पाठ छोड़कर चौदह सालों तक जंगलों में भटकना पड़ा। जब इसी समय नें फिर करवट बदली तो एकबार फिर उन्हें राजगद्दी वापिस मिली। समय भटकाता भी है। जब तक किसी भी चीज का समय पूरा नहीं हो जाता, वह नहीं होती। समय का चक्र पूरा होने पर ही किसी बच्चे का जन्म होता है, फिर किसी का वक्त आ जाने पर ही उसकी मृत्यु भी निश्चित ही होती है। समय के पास सबकुछ निश्चित है। समय की अलग सत्ता है, जिसपर किसी की विजय नहीं होती। समय को जीता नहीं जा सकता, केवल समय के साथ जिया जा सकता है। वक्त को जिसके साथ जो कुछ करना होता है, वह करता है। समय के साथ किसी का बड़बोलापन भी नहीं चल पाता। किसी पल भी वक्त किसी का अभिमान चकनाचूर कर सकता है, उसे सफलता के आसमान से जमीन की गर्त में मिला सकता है। एकपल में राजा को रंक व गरीब व्यक्ति को भी पैसे में खेलते देखा जा सकता है। इसलिए समय को नजरअंदाज करना किसी के हित में नहीं है। वक्त की परवाह करना बेहद आवश्यक है क्योंकि समय किसी के लिए भी नहीं रुकता और न ही किसी के साथ स्थायी तौर पर ठहर सकता है। जाने-अनजाने समय की अवहेलना व उपेक्षा करना ठीक नहीं। क्योंकि कोई रहे या न रहे, कुछ रहे न रहे लेकिन हर वक्त रहता है।

स्वस्थ दिमाग, तंदरुस्त शरीर व संतुलित रसायन


शारीरिक बीमारियों की मूल जड़ हमारा पेट है, इसमें किसी रसायन की अवस्था ठीक न होने से कई बीमारियों का जन्म होता है। वहीं, मानसिक बीमारियों की खास वजह हमारा मस्तिष्क व दिमाग होता है। यहां के रसायनों की असंतुलित अवस्था से ही मन घबराने लगता है, मन किसी काम में नहीं लगता है, एकाएक मन चिड़चिड़ा होता जाता है।

हमारा शरीर तमाम प्रकार के रसायनों से भरा पड़ा है। शरीर पूरी तरह से एक रासायनिक प्रयोगशाला की तरह से काम करता है। जिसमें हर वक्त कुछ न कुछ रासायनिक समीकरण बना व बदला करते हैं। इन्हीं रसायनों के बदलने व मिश्रण से ही होने वाले परिवर्तन हमारे भारीर, दिल व दिमाग में भी दिखलाई पड़ते हैं। इनके होने से ही हमारा शरीर मुस्कराता है, रोता है व दिल गुदगुदाता है। और इनमें किसी भी प्रकार का असंतुलन होने पर ही शरीर व दिमाग की तमाम बीमारियां जैसे तनाव, अवसाद, चिड़चिड़ापन, शारीरिक निष्क्रियता व वैचारिक नकारात्मकता शरीर पर हावी होना शुरू हो जाती है। ध्यान की नियमित क्रिया तथा योग व प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से ही इन रासायनिक गड़बडिय़ों को संतुलित व दुरस्त रखा जा सकता है। जिस प्रकार से शरीर में किसी भी प्रकार की खून की अशुद्धता होने पर शरीर पर तमाम प्रकार के दाने, फोड़े-फुंसी या चर्म रोग जैसी बीमारियां देखी जाती हैं। किसी रसायन की गड़बड़ी से ही रक्त में अशुद्धता हो जाती है। फिर ब्लड को प्योरीफाई करने के लिए दवाओं व सिरप आदि का प्रयोग किया जाता है। वैसे भी शरीर में होने वाली और भी बीमारियां इस बात की द्योतक होती हैं कि शरीर में फलां केमिकल का रियेक्शन सही नहीं है। अर्थात असंतुलित रसायनों की क्रियाओं से ही तमाम बीमारियों के लक्षण दिखाई देते हैं, फिर दवाओं, इंजेक्शन या टॉनिक से इन गड़बड़ रसायनों को दुरस्त किया जाता है। इसी प्रकार से दिमाग के रसायनों के गड़बड़ाने से ही कई प्रकार की मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं। शारीरिक बीमारियों की मूल जड़ हमारा पेट या उदर होता है, इसमें किसी रसायन की अवस्था ठीक न होने से कई बीमारियों का जन्म होता है। वहीं, मानसिक बीमारियों की खास वजह हमारा मस्तिष्क व दिमाग होता है। यहां के रसायनों की असंतुलित अवस्था से ही मन घबराने लगता है, मन किसी काम में नहीं लगता है, एकाएक मन चिड़चिड़ा होता जाता है। इसी के साथ शरीर में थकावट व नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं। ये सभी वस्तुत: बीमारी नहीं बल्कि बीमार या कमजोर रसायन के लक्षण मात्र होते हैं। जिसको दवाओं या थेरेपी से ठीक किया जाता है, इनका उपचार होता जिसकी रोकथाम के लिए एंटीबायटिक भी दी जाती है। यह तो इन सब असंतुलित रसायनों का इलाज हुआ। इन सबसे बचने के लिए परहेज भी आवश्यक होता है। कहा गया है कि 'प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योरÓ। अगर इस पर भरोसा किया जाय तो हमारे पास ऐसी चमत्कारिक व अद्भुत शक्तियां भी हैं जिनके प्रयोग से इन व्याधियों से दूर रहा जा सकता है। योग और प्राणायाम का नियमित अभ्यास शरीर में होने वाली तमाम रासायनिक गड़बडिय़ों से बचाव तो करता ही है तथा साथ ही आने वाली अनेक बीमारियों व परेशानियों को हमसे दूर रखता है। वहीं ध्यान का निरंतर अभ्यास हमें मानसिक बीमारियों से बचाता है। ध्यान व योग हमारे देश की प्राकृतिक व पुरातन विधियां हैं जो आज के समय में भी बहुत कारगर हैं। इन दोनों के रोजाना अभ्यास से हम शरीर व मस्तिष्क दोनों को असीमित लाभ पहुंचा सकते हैं। ध्यान व योग हर उम्र के लिए फायदेमंद हैं। जरूरी नहीं है कि इनका उपयोग केवल बीमारी अवस्था में ही किया जाय। ये बीमारियों का बहुत लाजवाब परहेज है, इनसे भारीर व मस्तिष्क की सभी रासायनिक क्रियाएं सामान्य रूप से काम करती है। आजकल जहां इनका उपयोग बढ़ती उम्र के लोगों में देखा जा रहा है, वहीं छोटे बच्चों क मस्तिष्क व शरीर के विकास में इनका अहम व आधारभूत योगदान हो सकता है। बशर्ते, हम इन पर पूरा भरोसा करके अपनी दैनिक दिनचर्या में शामिल करें। आज डिप्रेशन बढ़ती उम्र के लोगों के साथ छोटी उम्र के बच्चे, विद्यार्थी, घरेलू व कामकाजी महिलाएं या पुरुष लगभग सभी हैं। कारण भी है क्योंकि आज की भागमभाग लाइफ स्टाइल में बच्चों को पढ़ाई या कॅरियर का दबाव, नौकरी या रोजगार में बढ़ती प्रतिद्वंद्विता से होता तनाव, घर का कामकाज व सभी प्रकार की जिम्मेदारियों के निर्वहन में शरीर व मस्तिष्क दोनों का प्रयोग एकसाथ करते हैं। और देखा जाता है कि हम शरीर की देखभाल के लिए तो खाने-पीने की स्वास्थ्यवर्धक पोशक तत्वों का उपभोग करते हैं, अपने खानपान में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतते, तो फिर अपने दिमाग के साथ इतना सौतेलापन आखिर क्यों दिखाते हैं? हम गाड़ी में पेट्रोल भर देते हैं, तो गाड़ी चलती है। इसके मैकेनिकल पाट्र्स भी अपना सही काम करते रहें इसके लिए जरूरी है कि समय-समय पर चेक-अप व सर्विस भी हो।

Friday, May 7, 2010

उनको मानें, उनकी भी मानें-तब बनेगी बात



महापुरुष को अपना आदर्श मानना जीवन में किसी प्रेरणास्रोत की तरह से होता है। लेकिन, इसके साथ जरूरी यह भी है कि इनको मानने के साथ इनकी बताई गई बातें व सीख को भी इसी ढंग से मानें। प्राय: देखने में यह आता है कि गुरुओं को मानने वाले तो बहुत लोग है, परंतु प्रायोगिक तौर पर उनका अनुसरण नदारद मिलता है।


आज लोगों को सम्मान देने व मानने वालों की तादात में कोई कमी नहीं है। कोई कहता है कि मैं फलां गुरु को मानता हूं। कोई अपना आध्यात्मिक गुरु बना लेता है तथा उसको अपने जीवन का सुधारक मानने लगता है। कोई किसी महापुरुष को अपना आर्दश बना लेता है और बताता है कि यही मेरे जीवन के प्रेरणास्रोत हैं। कोई अपने माता-पिता का सम्मान करता है तथा इनको बहुत मानता है। परंतु, इन सबके बीच यह बात किसी विडंबना से कम नहीं लगती कि एक तरफ तो लोग अपने जीवन में किसी न किसी को महत्व देते हैं तथा इनको मानने की सार्वजनिक घोषणा करते रहते हैं और दूसरी ओर व्यक्तिगत तौर पर यही लोग इनकी ही कही हुई बातों व सिद्धांतों को नही मानते हैं, उनका अमल नहीं करते हैं। बाहर से तो हम सीखने के प्रयास में रहते हैं, लेकिन अंदर से लगभग खाली ही रहते हैं। जिंदगी में किसी का सम्मान करना या मानना अच्छा सरोकार है। माता-पिता, गुरु, आध्यात्मिक गुरु या किसी महापुरुष को अपना आदर्श मानना जीवन में किसी प्रेरणास्रोत की तरह से होता है। लेकिन, इसके साथ जरूरी यह भी है कि इनको मानने के साथ इनकी बताई गई बातें व सीख को भी इसी ढंग से मानें। प्राय: देखने में यह आता है कि गुरुओं को मानने में तो बहुत लोग है, परंतु प्रायोगिक तौर पर इनका अनुकरण नदारद मिलता है। यह सच है कि हम लोगों को तो खूब मानते हैं परंतु सच्चाई यह भी है कि उनकी बिल्कुल नहीं मानते हैं। सार्वजनिक रूप से उनको स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं होती है। लेकिन, व्यावहारिक जिंदगी की छोटी-बड़ी बातों के समय पर इनकी कही हुई बातों को दरकिनार कर देते हैं। लगभग भुला देते हैं। और सब कुछ अपने ढंग से करते व समझते हैं। जिंदगी में किसी को महत्व देने या मानने का मतलब ही यही है कि अब हमने उसे अपना गुरु बना लिया। तब फिर उसके बताये गये मार्ग का अनुसरण व अनुकरण भी तदैव ही करें तभी हमारी मंजिल हमें आसानी से मिल सकती है। मान लिया जाये कि हम कहीं जाना चाहते हैं और अचानक रास्ता भूल जाते हैं। फिर हमें आस-पास किसी से रास्ता पूछना पड़ता है। तब हम क्या करते हैं-उसके बताये मार्ग पर चलते हैं और अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। अगर बताये गये मोड़ पर हम नहीं मुड़ते, उसकी नहीं मानते। तो क्या मंजिल मिलना संभव होता? बात यही है कि हमसे बुद्धिमान, अनुभवी व जानकार जिसको भी हमने अपना मसीहा खुद अपनी पसंद से चुना उसमें किसी की कोई जोर जबरदस्ती भी नहीं थी फिर उसको मानने के साथ उसकी कही व बताई गई बातों को मानने में फेरबदल देखने को मिलता है। जबकि सच्चाई व फायदेवाली बात तभी है, जब हम गुरुजनों द्वारा बताये व सिखाये गये मार्ग का भलीभांति अनुसरण करते हैं। सफल होने के लिए उनकी भी माननी पड़ेगी। सिर्फ उनको मानने से काम नहीं चलने वाला है। केवल बाहर ही बाहर किसी को स्वीकार कर लेने से कोई बात नहीं बनेगी, जब तक इसका प्रयोग अंदर से नहीं किया जाता। फिर इन सबको अपनी आदत व प्रकृति में आत्मसात कर लिया जाय। क्योंकि सार्वजनिक दिखावे से मन में बहुत अधिक बदलाव नहीं आ सकेगा, मन विचलित होगा और न ही शांति प्राप्त होगी। यह तो दोतरफा जीवन होगा कि उनको तो बहुत महत्व देते हैं लेकिन उनकी बातों व सीखों को ज्यादा मूल्य नहीं देते हंै। उनकी कही हुई बातों व सीखों को अपने दैनिक जीवन के आचरण व लोकाचार मेें ढालने पर ही हम असलियत में उनसे जुड़ सकेंगे तथा सच्चे अर्थों में उन्हें मानेंगे।
समझाने व सिखाने वालों की कोई कमी नहीं है, केवल कमी है तो इन पर अमल करने वालों की। जिस किसी ने भी सच कही हुई बातों का अपने जीवन में अक्षरश: पालन कर लिया वह सचमुच जिंदगी में सफल हुआ है। फिर उसे किसी को अपना गुरु बताने या मानने की सार्वजनिक घोषणा करने की भी कोई आवश्यकता नहीं होती है। सबकुछ अपने आप गुरु की प्रतिछाया के रूप में प्रदर्शित हो जाता है। रामायण, बाइबिल, गीता, कुरान, अनेक महापुरुषों व देवपुरुषों की सजग वाणी हमें क्या-क्या सिखाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि हम इन्हें नहीं मानते हैं। लेकिन इसके बाद की जिम्मेदारी हमारे ऊपर आ जाती है कि हम इनसे कितना सीखते व अमल कर पाते हैं। गांधी जी के विचारों को मानने वालों की कोई कमी नहीं, लेकिन गांधी जी के विचारों को अपने जीवन में ढालनें वालों की कमी है। पुरुषोत्तम राम के सिद्धांतों व कर्मों को अपने जीवन मे अमल करनें की आवश्यकता है।

गलत कथनी ही कहीं करनी न बन जाए



किसी जरूरतमंद की आर्थिक सहायता करने या दान पुण्य में लगाया गया पैसा खजाने को खाली नहीं करता है, बल्कि इस पुनीत कार्य से किसी व्यक्ति या समाज का उद्धार होता है। साथ ही अपनी सार्मथ्यवश जो भी बन पड़ा ऐसा आत्मबोध होने से आत्मसंतुष्टि का भाव भी जागृत होता है। क्योंकि ईश्वर ही किसी योग्य व सक्षम व्यक्ति को अपना माध्यम बनाता है। फिर उसका खजाना भरने की जिम्मेदारी भी उसी की बन जाती है।

भगवान श्री सत्य नारायण व्रत कथा में एक बहुत ही प्रेरक उल्लेख है कि जब साधु नामक बनिया सामान बेचने के लिए बाजार जा रहा था। उस वक्त उसकी नाव कीमती सामान से लदी हुई थी। इसी समय उसकी परीक्षा लेने के लिए भगवान एक भिखारी के वेश में उसके सामने प्रकट हुए और कुछ सामान की याचना की। इस पर व्यापारी ने कुछ देने से बचने के लिए कहा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है, मेरी नाव तो धास-फूस व पत्तों से भरी हुई है। उसके कुछ समय बाद ही उसकी नाव पानी के ऊपर उतराने लगी। उसके कहने के अनुसार ही नाव का कीमती सामान एक झटके में ही धास व पत्ते हो गया। उसने जैसा कहा, बिल्कुल वैसा ही हो गया। विषय यह है कि आज यही आम जिंदगी में लगभग सबके साथ हो रहा है कि हम अपने बारे में गलत बयानबाजी भी करते हैं। मौका पडऩे पर हम अपने आपको गरीब, दुखी व असहाय दिखा व बताकर दूसरों की मदद करने के बजाय उनसे सहानुभूति चाहने लगते हैं। जबकि एक तरफ हम अमीरी का दिखावा करते हैं, पर दूसरों की जरूरत के समय अपनी गरीबी दिखाने लगते हैं। फिर संभावना ज्यादा हो जाती है कि कहीं हमारी जिंदगी असल में ही ऐसी न हो जाये। ईश्वर सुख-दुख, रुपया-पैसा व अमीरी-गरीबी सबको देता है। जीवन में लगभग सभी के पास रुपये-पैसे के साथ सुख तथा कभी आर्थिक तंगी के साथ परेशानी व दुख भी आता है। ये सब क्रम से आते-जाते रहते हैं। इनमें से कोई भी एक चीज किसी के पास सदैव नहीं रहती। अगर आज किसी के पास पैसे की कमी है, और समस्याएं हैं, तो निश्चित रूप से कल नहीं होंगी। जबकि इसके उल्टे, उनके जीवन में सम्पन्नता तथा सुख है व इसके बाद भी परेशान दिखना तथा अपनी समस्याओं का दुखड़ा रोने से दूसरों की सहानुभूति हासिल करना ठीक नहीं होता है। प्राकृतिक रूप से भी यही है कि हम अपने बारे में जैसा आकलन करते हैं, सोचते हैं, और दूसरों को बताते व दिखाते हैं ठीक वैसा ही सब कुछ अपने आप परिवर्तित हो जाता है। और एक समय यह अपना पूरा साकार रूप ले लेती है। प्रबल संभावना यह हो जाती है कि सब कुछ होते हुए भी कुछ न होने का नाटक जैसी प्रतिक्रिया देने से एक दिन वैसी ही प्रकृति बन जानी निश्चित है। क्योंकि यह सर्वदाता ईश्वर की देयशक्ति व अनुकम्पा का सीधे तौर पर अपमान के बराबर है। किसी को अपनी क्षमतानुसार आर्थिक मदद या कुछ देने से एक उदार छवि बन जाती है, उसे लगता है कि यह व्यक्ति सम्पन्न है तथा लोगोंं के लिए बहुत मददगार है। इश्वर करे कि इसकी सम्पन्नता और बढ़े ताकि यह और ज्यादा लोगों का भला कर सके। किसी जरूरतमंद की आर्थिक सहायता करने या दान पुण्य में लगाया गया पैसा खजाने को खाली नहीं करता है, बल्कि इस पुनीत कार्य से किसी व्यक्ति या समाज का उद्धार होता है। साथ ही अपनी सार्मथ्यवश जो भी बन पड़ा ऐसा आत्मबोध होने से आत्मसंतुष्टि का भाव भी जागृत होता है। क्योंकि ईश्वर ही किसी योग्य व सक्षम व्यक्ति को अपना माध्यम बनाता है। फिर उसका खजाना भरने की जिम्मेदारी भी उसी की बन जाती है। एक कहानी है-एक टे्रन यात्रियों से भरी थी। एक अंधा भिखारी भी ट्रेन में चढ़ा व गाना गाकर भीख मांगने लगा। ऊपर की बर्थ पर बैठे एक व्यक्ति ने जेब से सिक्का निकालकर नीचे बैठे यात्री से भिखारी को देने को कहा। उस यात्री ने सिक्का भिखारी को दिया तो भिखारी उस व्यक्ति को दुआएं देने लगा। इस पर उस व्यक्ति नें भिखारी से कहा कि यह सिक्का ऊपर बैठे भाईसाहब ने दिया है। तब अंधे भिखारी ने कहा कि बाबू जी, अंधा मैं हंू लेकिन ऊपर वाला सबकुछ देखता है। वही सबको देता है। सच है कि ऊपर बैठा ईश्वर ही सबके लिए इंतजाम करता है। एक की मदद के लिए दूसरे को भेजता है। वह पूरी प्रक्रिया बनाता है। इसलिए, सक्षम होने पर किसी की सहायता करने से पीछे नहीं हटना चाहिए तथा हमारी कथनी भी नहीं होनी चाहिए कि मैं क्या कर सकता हंू? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। इश्वर केवल उसी के पास ऐसा प्रस्ताव पहुंचाता है जो सक्षम होता है। मना करने, ठुकरानें या बहाना बनानें में व्यक्ति जो कुछ भी कहता है फिर ईश्वर उसी की बात को सही भी कर देता है। जब उस बनिया व्यापारी नें भिखारी के रूप में भगवान से धास व पत्तों की बात कही तो भगवान नें कहा कि जाओ तुम्हारा ही कथन सत्य हो जाय। और उसका सब कीमती सामान धास व पत्ता ही हो गया। समाज में बढ़ती हुई विडम्बना ही है कि वैसे तो हमारे पास सबकुछ होता है लेकिन जरूरतमंद की सहायता के समय सबकुछ खाली बताते हैं। किसी की मद्द से बचनें के लिए कहीं हमारी कथनी उस बनिया व्यापारी की तरह ही न हो जाये।