Friday, August 28, 2009

सब कुछ बयां कर देती हैं आंखें


आंखें हमारे जीवन में एक बड़ी दौलत की तरह हैं। इन्हीं आंखों से हमें अपने जीवन में कोई प्यारा लगने लगता है तो कोई दुश्मन नजर आता है। कोई अच्छा लगता है तो कोई बुरा। प्रेम, पीड़ा, कष्ट, संयोग-वियोग, शृंगार, वीररस सभी तरह के उद्गार आंखों से ही कभी अश्रु बन कर तो कभी चमक बनकर सब कुछ बयां कर देते हैं।

अंधता या अंधापन, देख न सकने की दशा का नाम है। दृष्टिहीनता भी इसी का नाम है। प्रकाश का अनुभव ना कर सकने से लेकर जो कार्य देखे बिना नहीं किए जा सकते, उसे अंधता कहा जाता है। इसीलिए मरने से पहले अपनी आंख दान करने से आप किसी दूसरे की जिंदगी में रोशनी फैला सकते हैं।
आंखें हर किसी के जीवन की शोभा हैं। हम पैदा होते ही सबसे पहले अपनी आंखों से ही इस दुनिया को देखना शुरू करते हैं। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों व अन्य रिश्तों को भी अपनी नवजात अवस्था से ही इन्हीं आंखों से पहचानना शुरू कर देते हैं। रंगों की पहचान भी आंखों से ही करते हैं। हमारे जीवन में आंखों का बहुत ही महत्व है। हमारे शरीर की सुंदरता में भी आंखों का बहुत योगदान होता है। खासकर नारी की सुंदरता को कवि अपनी कलात्मक शैली के द्वारा वर्णन करते हैं जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की आंखें नारी की सुंदरता को अलग-अलग तरीके से वर्णित व सुशोभित करती हं।
हमारा पूरा का पूरा व्यक्तित्व हमारी आंखों से दिखाई दे जाता है। हम अगर कभी कुछ छिपाना भी चाहें तो हमारी आंखें सब कुछ बयां कर देती हैं। हमारा आत्मविश्वास भी इन्हीं आंखों से ही झलकता हुआ दिखाई दे जाता है। अगर हम किसी दूसरे व्यक्ति पर अपना विश्वास जमाना चाहते हैं या उस पर अपना असर छोडऩा चाहते हैं तो हम उसकी आंखों में आंखें डालकर बात करते हैं, कमजोर व झूठा आदमी ऐसा नहीं कर सकता हैं। इसी प्रकार किसी भी प्रकार की खुशी या कोई गम हो, सब कुछ आंखों से ही प्रकट हो पड़ता है। जहां क्रोध के समय आंखें आग की तरह लाल हो जाती हैं, वहीं खुशी के समय आंखों में एक चमक देखी जाती है। हिंदी भाषा में कितने ही मुहावरे इन्हीं आंखों पर लिखे गये हैं। आंखों में शर्म आ जाना, आंखों द्वारा अपने क्रोध व प्यार को दर्शाना, गुस्से में अपनी आंखें लाल-पीली कर लेना, आंखें निकालना, आंखों में डर लाना, आंखों से किसी को डराना, आंखों को बन्द कर लेना, आंखें फेर लेना, आंखों में बिठाना, आंखों का तारा, आंखों में खटकना, आंखें सेंकना, आंखें चार हो जाना, आंखों में तस्वीर बसाना, आंखें चुराना न जाने कितनी ही तरह से हम अपनी भावनाओं को आंखों से व्यक्त करते हैं। जिस प्रकार से किसी व्यक्ति की आंखें उसके बारे में हमें बताती हैं, उसी प्रकार हमारी आंखें भी उसको पढऩे का काम करती हैंं। जिससे ही हम उसके बारे में सही-सही पता लगा सकते हैं क्योंकि किसी का अवलोकन व सूक्ष्म निरीक्षण भी हम अपनी इन्हीं आंखों से ही करते हैं। अब हम अपनी आंखों से ही व्यक्तियों की पहचान करने लगते हैं। अच्छे और बुरे का पता भी इन्हीं आंखों से करते हैं। कभी-कभी किसी से बात करने के लिये आंखों की मौन भाषा का प्रयोग किया जाता है। नयनों की इसी मौन भाषा से कितने ही वार्तालाप हो जाते हैं। किसी प्रेमी और प्रेमिका के जीवन में इसका कितना प्रयोग है, यह वह ही जानते हैं। आंखों की भाषा से ही मौन प्रेषण, मौन स्वीकृति तथा मौन सहमति भी हो जाती है, यहां पर बातें सिर्फ आंखें ही करती हैं। बाकी सब कुछ मौन रहते हुये एक दर्शक की ही भांति चश्मदीद गवाह बन कर रह जाता है। जिंदगी में आगे बढऩे का सपना भी सबसे पहले हमारी आंखें ही देखती हैं। हमारे आस-पास विभिन्न आकृतियों की आंखों वाले व्यक्ति रहते हैं। किसी की छोटी आंखें, किसी की बड़ी आंखें, किसी की काली आंखें, और किसी की भूरी आंखें। इन्हीं आंखों से ही कोई व्यक्ति मासूम, कोई निर्दयी और कोई धूर्त भी नजर आता हैं। जहां बच्चों की आंखों से उनका भोलापन झलकता है, किसी नवयुवक की आंखों में ऊर्जा व आगे बढऩे का सपना दिखाई पड़ता है। किसी बुजुर्ग की आंखों से उनकी जिंदगी के अनुभव का अहसास होता है। सबकी आंखें कुछ न कुछ कहती हैं। बॉडी लैंग्वेज के जानकार दूसरों की आंखों की बनावट के आधार पर उनके पूरे व्यक्तित्व का वर्णन कर देते हैं। यही आंखें हमारे मुख के आभामंडल को बढ़ाने का भी काम करती हैं। इन्हीं आंखों की बनावट से ही कोई व्यक्ति सुंदर कहा जाता है तो कोई कुरूप हो जाता है। नयनों की अलग-अलग बनावटों को ही अलग नाम दिये गये। जिसमें हिरनों जैसी आंखों वाली, कमल जैसी आंखों वाली, सागर की तरह आंखों वाली, नीली आंखों वाली, नशीली आंखों वाली तथा नशे की प्याली जैसी आंखें नारी के अपरिमित सौंदर्य के आकर्षण की साक्षी बनती हैं।
फिल्मी दुनिया में भी इन्हीं आंखों पर कई गीत लिखे गये। फिल्मी सुंदरियों के सौंदर्य को उनकी आंखों की सुंदरता से आंका गया। कई फिल्मों के टाइटल भी 'आंखें रखा गया। सरहद पर तैनात फौजी भी २४ घंटे सीमा की चौकसी के लिये हर वक्त अपनी आंखें चौकस व चौकन्ना रखते हैं। अदालतें भी किसी भी घटना में चश्मदीद गवाह की गवाही को अति महत्वपूर्ण मानती हैं। हममें से बहुत लोग अपनी मृत्यु के बाद अपनी आंखों को दान कर जाते हैं ताकि जिनके पास आंखें नहीं हैं वे लोग भी अब उनकी आंखों से इस दुनिया को देख सकें। इस धरती की प्राकृतिक सुंदरता को देखने व महसूस करने के लिये हम आंखों से ही काम लेते हैं। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को हम जीवन की आंख मिचौली भी कहते है। हमारी आंखों के ठीक बीच में माथे पर का स्थान त्रिनेत्र का स्थान कहा गया है। भगवान शिव ने जब अपना तीसरा नेत्र खोला तो दुनिया में प्रलय ही आ गई। इसी स्थान पर आज्ञा चक्र भी होता है। कुंडलिनी ध्यान में हम इसी स्थान को जाग्रत करते हैं तथा मस्तक के इसी स्थान पर हम टीका व रोचना आदि लगाते है जो माथे को तो सुशोभित करता ही है तथा इससे ऊर्जा भी मिलती है। आज्ञा चक्र सक्रिय होने तथा ज्ञान चक्षु खुल जाने से ही हमें अपने पूरे जीवन का वास्तविक दर्शन भी समझ में आने लगता है। इस प्रकार हम आत्मा और परमात्मा के बीच सेतु बनाने में भी सफल होते हैं। महाभारत काल में भी जहां धृतराष्ट्र की आंखों में रोशनी नहीं थी, वहीं उनकी पत्नी गंधारी भी सारे जीवन अपनी आंखों में पट्टी बांधे रही। इस तरह उन्होंने भी अपना सारा जीवन अंधत्व में ही जिया। अपने अंधेपन के कारण ही धृतराष्ट्र महाभारत के युद्ध मैदान कुरुक्षेत्र न जा सके और फिर युद्ध का आंखों देखा हाल संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से सुनाया। आज जो कुछ भी हम महाभारत के बारे में जानते है वह सब संजय की अलौकिक दिव्य दृष्टि की ही बदौलत है। आंखें हमारे जीवन में एक बड़ी दौलत की तरह हैं। इन्हीं आंखों से हमें अपने जीवन में कोई प्यारा लगने लगता है तो कोई दुश्मन नजर आता है। कोई अच्छा लगता है तो कोई बुरा। प्रेम, पीड़ा, कष्ट, संयोग-वियोग, श्रंगार, वीररस सभी तरह के उद्गार आंखों से ही कभी अश्रु बन कर तो कभी चमक बनकर सब कुछ बयां कर देते हैं। खुली आंखों से तो हम सब कुछ देखते हैं, हर एक व्यक्ति के बारे में और हर एक स्थान के बारे में जान लेते हैं, वहीं आंखों को बंद कर ध्यान में बैठने से हमें अपने बारे में सब कुछ मालूम हो जाता है।

Friday, August 21, 2009

सच का कबूलनामा आखिर किसके हित में?



ऐसा लगता है कि इस गेम शो की पूरी पृष्ठभूमि केवल सेक्सुअल रिश्तों पर ही आधारित है। हो सकता है कि कभी जाने-अनजाने अगर किसी से गलती हुई हो, उसके परिवार वालों को इसकी जानकारी भी हो और उसे माफ भी कर दिया हो या स्वयं उसने पाश्चाताप कर लिया हो, फिर यह सच गुजरी जिंदगी का सच नहीं बल्कि गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा हुआ।

कहा गया है कि सत्य महान है, हमें सच बोलना चाहिए क्योंकि सत्य की ही जीत होती है, परन्तु आजकल टेलीविजन के एक चैनल पर अलग तरह का एक बिंदास गेम शो 'सच का सामना प्रसारित किया जा रहा है। यह गेम शो अमेरिका में प्रसारित 'मोमेन्ट ऑफ ट्रुथ पर आधारित है। इस गेम शो का एक सच यह भी है कि इसका कंटेन्ट काफी विवादास्पद है, जिससे कार्यक्रम के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दो याचिकाएं भी दाखिल की गईं,परंतु कोर्ट ने इसकी सामाजिक, नैतिक जिम्मेदारी व पहरेदारी करने से इंकार कर दिया।
इस गेम शो की खास बात यह है कि इसमें प्रतिभागियों को एक करोड़ रुपये जीतने के लालच में अपने जीवन से जुड़े २१ प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं। इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता राजीव खंडेलवाल के अनुसार प्रतिभागियों को एक पॉलिग्राफिक टेस्ट से गुजरना पड़ता है, जिसमें प्रतिभागियों द्वारा दिए गए उत्तर के सच और झूठ का फैसला पॉलिग्राफिक टेस्ट में प्रतिभागियों के रिकॉर्ड किये गये ब्लड प्रेशर, हार्ट बीट, पल्स रेट तथा शरीर में होने वाली उथल-पुथल के आधार पर किया जाता है। इस दौरान प्रतिभागियों से ५० प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें से २१ प्रश्नों का सामना मुख्य गेम शो में करना होता है। अब देखने वाली बात यह है कि प्रतियोगिता के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न काफी हद तक प्रतिभागी के बेहद निजी जीवन से जुड़े होते हैं। जिसमें प्रतिभागी को सच का सामना करने की क्षमता, साहस व निर्भीकता का परिचय देना होता है। इस दौरान ज्यादातर सवाल सेक्सुअल रिलेशनशिप व शारीरिक संबंधों पर आधारित होते हैं। प्रतिभागियों को बन्द कमरे के सच का खुलासा इस गेम शो के माध्यम से अपने परिवार, सगे- सम्बंधियों के सामने करना होता है। जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता है, प्रश्नों का स्तर भी सिमटकर काफी संवेदनशील होता जाता है।
ऐसा लगता है कि इस गेम शो की पूरी पृष्ठभूमि केवल सेक्सुअल रिश्तों पर ही आधारित है, जिंदगी का सच केवल एक ही पहलू पर समेट दिया गया है लेकिन सच यह भी है कि जिंदगी का केवल एक ही पहलू नहीं है। हो सकता है कि कभी जाने-अनजाने अगर किसी से गलती हुई हो, उसके परिवार वालों को इसकी जानकारी भी हो और उसे माफ भी कर दिया हो या स्वयं उसने पाश्चाताप कर लिया हो, फिर यह सच गुजरी जिंदगी का सच नहीं बल्कि गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा हुआ। कुल मिलाकर यह पूरा गेम शो जिंदगी के ऐसे सच का खुलासा करवाने तथा अपनी इज्जत की खुली नुमाइश का आमंत्रण है जो अत्यंत व्यक्तिगत होते हुये सार्वजनिक कर दिये जाते हंै, क्योंकि प्रतिभागी के साथ उसी के सगे-संबंधी, मित्र या रिश्तेदार ही होते हैं तथा टीवी पर व्यक्तिगत जिंदगी का पर्दाफाश करना पूरे परिवार की एकता व सामंजस्य के लिये बेहद खतरनाक है। शायद इसीलिए इस गेम शो को अन्य देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है। कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों के परिवार के सदस्यों के बीच अक्सर ऐेसे सच के सामने की बात पर नोक-झोंक हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। गंभीर सच खुलने से परिवार में कोई बड़ी घटना हो जाय तो भी कोई आश्चर्य नहीं। पिछले हफ्ते नोएडा में रहने वाले एक सिक्योरिटी गार्ड की जिंदगी पर इस रियलिटी गेम शो का इतना असर हुआ कि वह फांसी लगाकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया। हुआ यूं कि उक्त सिक्योरिटी गार्ड अपनी पत्नी के साथ सच का सामना कार्यक्रम टीवी पर देख रहा था। कार्यक्रम के बाद उसने पत्नी से शादी के पहले का सच जानना चाहा, पहले तो उसकी पत्नी ने इंकार कर दिया, परंतु जब पति ने कसम देकर उस पर दबाव बनाया और उसे कुछ भी न कहने का आश्वासन दिया। इस पर उसकी पत्नी ने ऐसा सच कबूला कि गार्ड ने आत्महत्या करना ही मुनासिब समझा।
सच का सामना ऐसा गेम शो है जो अमेरिकी सोच व संस्कृति पर आधारित है जो कहीं से हमारी संस्कृति के साथ मेल नहीं खाता, क्योंकि गेम शो में पूछे जाने वाले प्रश्न वहां के वातावरण व कल्चर के आधार पर बनाये गये हैं जो यहां के परिवेश से मेल नहीं खाते। हम सब यहां पर पारिवारिक परिवेश में रहते हैं, भारत में जिंदगी का ऐसा खुलापन संयुक्त परिवार की धज्जियां उड़ा सकता है। इस प्रतियोगिता में होने वाले सभी प्रतिभागी जिंदगी के सच का सामना करने के लिये अपने परिवार के बड़े-बुजुर्ग तथा बड़े हो चुके बेटे-बेटियों के साथ एक करोड़ रुपये जीतने के लालच मे जाते हैं लेकिन लौटते वक्त इनामी राशि को तो छोड़ दीजिए, उनके परिवार का भी बिखराव हो जाय, इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण निश्चित रूप से ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींचना, ढेरों विज्ञापन बटोरना महज चैनल की टीआरपी बढ़ाने से ज्यादा नहीं है। इस तरह के कार्यक्रम पेश करना दर्शकों के किस तरह से हित में है पता नहीं।

Sunday, August 16, 2009

...तब हर तरफ हिन्द की जय और जय भारत होगा


हम सभी देश के सच्चे सपूत व अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी अपने आप समझते हुये देश के अंदर रहकर ही अन्य कई तरीकों से देश की सेवा कर सकते हैं। हम सब मिलकर एक साथ रहें तथा एक-दूसरे के काम आ सकें, किसी भी असहज स्थिति में भी हममें से कोई भी अपना संयम व धैर्य न खोये बल्कि भारत की एकता व अखंडता को हरदम मजबूत करें तथा देश की तरक्की के लिये अपना बहुमूल्य योगदान दें। सही मायनों में तब हर तरफ हिन्द की जय होगी और जय भारत होगा।

देश की आजादी के लिए कितने ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुये देश की बलिवेदी पर कुर्बान हो गये। उनके दिमाग में केवल देश की आजादी का ही जुऩून था और देश के लिये कुछ कर गुरजने का जज्बा। स्वतंत्रता दिवस के दिन जब पूरे भारत वर्ष में तिरंगा लहरता है, तब पूरा देश उन देशभक्त सेनानियों व सैनिकों के जज्बे को सलाम करता है। मुकाबला चाहे मुगलों से रहा हो या अंग्रेजों से हुआ हो, चाहे सियाचिन का युद्ध हो या फिर कारगिल की कहानी। जब कभी भी देशभक्ति गीतों या फिल्मों में हम अपने सैनिकों को देश के दुश्मनों से लड़ते हुये देखते हैं तो हर हिन्दुस्तानी का खून खौलने सा लगता है, नसें तन जाती हैं, मुठ्ठियां भिंच जाती हैं। तब शहीदों के बलिदान को याद कर दिल यही कहता है कि काश! हमें भी सरहद पर कुछ करने का मौका मिला होता तो हम भी किसी से पीछे नहीं रहते।
देश की रक्षा के लिये तैनात सैनिकों की तरह अपनी माटी पर मर मिटने वालों की कोई कमी नहीं है। फौजियों व सैनिकों का दायित्व है कि देश के हर नागरिक की रक्षा व सुरक्षा मुहैया कराना। ऐसे में हर भारतीय नागरिक का कत्र्तव्य बन जाता है कि हम सब देश के अन्दर की जिम्मेदारी संभालें। अगर हम सैनिक नहीं बन पाये, सरहद पर नहीं पहुंच पाये तो भी जरूरी यह नहीं कि देश की सेवा सरहद पर केवल सैनिक बनकर ही की जा सकती है। अगर हमारे अन्दर देश सेवा की ललक है तो हम अपना काम करते हुये भी देश के सच्चे सेवक बन सकते है। हमारे देश का किसान खेती कर अन्न उगाकर अपनी एक अलग तरह से जिम्मेदारी का निर्वहन करता है। हम उसी का पैदा किया हुआ अन्न खाकर ही पलते व बढ़ते हैं। देश की रक्षा के लिए सरहद पर तैनात फौजियों के लिए भी अनाज किसान की बदौलत ही पहुंचता है। इस तरह किसान भी फसल उगाकर देश की सेवा करता है। अगर एक किसान के कन्धे पर बन्दूक न सही पर वह अपने कन्धे पर हल रखकर अपने देश सेवा के जज्बे को पूरा करता है। देश की प्रगति के दो मजबूत आधार है एक हैं-हमारे देश के जवान यानी कि सैनिक और दूसरा है किसान। इसीलिए हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा भी दिया। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी ने भी इसी नारे के आगे जय विज्ञान भी जोड़ दिया। क्योंकि विज्ञान की प्रगति के बिना आज किसी भी देश की उन्नति की कल्पना नहीं की जा सकती। इन्हीं वैज्ञानिकों व इंजीनियरों की सोच से ही आज हमारे पास एक से एक नये आधुनिक तकनीक के हथियार व मशीनें हैं। इनके ही द्वारा ईजाद किये हुए नये-नये स्वचलित हथियार सैनिकों के पास हैं, जिनसे वे देश की सरहद पर दुश्मनों से मोर्चा लेने तथा उन पर फतह कर सकने में सफल होते हैं। अगर ये इंजीनियर या वैज्ञानिक सैनिक नहीं बने तो क्या हुआ! ये सब अपने तरीके से देश की सेवा में हमेशा प्रयत्नशील हैं।
देश सेवा में हमारे देश का प्रेस व मीडिया तथा इससे जुड़े पत्रकार बन्धु भी अपनी संवेदनशील जिम्मेदारी के निर्वहन में कभी पीछे नहीं रहते। इन सबकी २४ घंटे की अबाधित सेवा से ही हमें दूर-दराज तथा देश-विदेश की ताजा खबरें टीवी, रेडियो व समाचार पत्रों के माध्यम से हमें मिलती हैं। लोक हित व देश हित के लिए किसी भी संदेश व घटना के बारे में लोगों को अवगत कराना इनके दायित्व में आता है। ये सब देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होते हुये अपना काम बखूबी करते जाते हैं। इनको भी सैनिक न बन पाने का दिल में कोई मलाल नहीं, क्योंकि सीमा पर फौजी का हथियार बंदूक है तो देश के अंदर इनका हथियार इनकी कलम, इनका अखबार या इनकी आवाज है। ये देश सेवा के अपने जज्बे को पूरा करते हैं। हमारे देश का लेखक भी सीमा पर डटकर मुकाबला करने वाले सैनिकों से पीछे नहीं रहना चाहता। इसीलिए वह अपनी कलम से देशभक्ति गीत, वीर रस की कविताएं, प्रेरणादायक लेख व रचनाएं लिखता है। जिनको पढ़कर हम अपना सर्वस्व बलिदान करने में पीछे नहीं देखते। इस तरह एक लेखक, पत्रकार, कवि व रचनाकार भी अपनी कलम से देश सेवा में लगा रहता है।
किसी भी संदेश या घटना को हमारे देश में फिल्मों या फिल्मी गीतों के माध्यम से भी अभिव्यक्त किया जाता है। कितने फिल्म निर्माताओं ने देश की एकता व अखंडता के लिये देशभक्ति फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से कुछ को तो देश के अच्छे व सच्चे सपूत का लेबल भी मिला। इसका उदाहरण है कि फिल्म अभिनेता मनोज कुमार को आज भारत कुमार के नाम से जाना जाता है। इस तरह से देश प्रेम के अपने जज्बे को अभिनय से भी दिखाया जा सकता है। हमारे देश के अन्दर काम करनें वाले कई समाजसेवी संगठन ऐसे हैं, जो लोग देश सेवा की सच्ची भावना से ही गरीबों, बेसहारा बच्चों के पोषण, शिक्षा, चिकित्सा व सामूहिक विवाह जैसे कामों में अपना उल्लेखनीय योगदान करके अपने राष्ट्रसेवा के जज्बे को पूरा करते हैं।
हमारे देश के खिलाड़ी भी पूरे विश्व पटल पर अपने खेल से भारतीय परचम को फहराने में पीछे नही हैं। हम सब भारत के नागरिक हैं, हम सबके अन्दर अगर देश सेवा की ललक है तो यह जरूरी नहीं कि इसके लिए केवल सैनिक ही बना जाय, फौजी वाली वर्दी ही पहनी जाय, सरहद पर ही जाया जाय और दुश्मन से ही दो-दो हाथ किये जाए।
हम सभी देश के सच्चे सपूत व अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी अपने आप समझते हुये देश के अंदर रहकर ही अन्य कई तरीकों से देश की सेवा कर सकते हैं। हम सब मिलकर एक साथ रहें तथा एक-दूसरे के काम आ सकें, किसी भी असहज स्थिति में भी हममें से कोई भी अपना संयम व धैर्य न खोये बल्कि भारत की एकता व अखंडता को हरदम मजबूत करें तथा देश की तरक्की के लिये अपना बहुमूल्य योगदान दें। सही मायनों में तब हर तरफ हिन्द की जय होगी और जय भारत होगा।

Saturday, August 8, 2009

जिंदगी में नकल कर नहीं बन सकते असली हीरो



यह एक अलग वास्तविकता है कि हमारा वास्तविक जीवन अंदर से बहुत अलग नहीं है जो रील लाइफ की रीयल्टी से बहुत मेल खाता है। अब अगर अपने वास्तविक जीवन की तुलना फिल्मी जीवन से की जाए तो आश्चर्य नहीं होगा कि ये दोनों जीवन बिल्कुल एक ही तरह से चलते हैं। एक है रील और दूसरा है रीयल।

सिनेमा शुरू से ही हर वर्ग को लुभाता रहा है। हम सभी सिनेमा से ही अपना मनोरंजन करते आये हैं। आज के युवा वर्ग में फिल्मों व प्रिय कलाकार के प्रति इतना अधिक क्रेज देखा जा सकता है कि अमुक फिल्म के हीरो की नकल करने में पाछे नहीं रहते। चाहे उनका हेयर स्टाइल हो, कपड़ों का नया फैशन हो या फिर नया कल्चर। वैसे भी फिल्में समाज में संदेश देने का कार्य करती हैं। फिल्मों को समाज का आईना भी कहा जाता है। जो कुछ भी समाज में होता है, वह सब हमारी फिल्मों में दिखता है। आज फिल्में किसी भी बात को जन साधारण तक पहुंचाने का बहुत सशक्त साधन व माध्यम बन चुका है। आज के बदलते हुए सिनेमा के दौर में पर्दे के जीवन को रील लाइफ के नाम से जाना जाता है, जो हमारी रीयल लाइफ यानि की वास्तविक जीवन को प्रेरित व प्रभावित करती हैं। इसी कड़ी में सबसे बड़ी व संवेदनशील जिम्मेदारी निभानी होती है फिल्म के निर्माता व निर्देशक को, जिनके हाथ में दर्शक की सबसे कमजोर नब्ज भी होती है।
रील लाइफ यानि सिनेमा की सबसे मजबूत डोर फिल्म निर्देशक के पास होती है। वह इसी डोर से सभी कलाकारों को नचाता है। कलाकार भी अपनी जान डालकर अपने पात्र को जीवंत कर देता है। फिर हम सब उस कलाकार व अभिनेता के मुरीद व प्रशंसक बन जाते हैं। अपने वास्तविक जीवन में फिल्म के किरदार को ढूंढऩे लगते हैं। पर्दे पर किसी का अभिनय हमको इस हद तक लुभाता है कि हमको अपना दीवाना बना देता है। खास बात यह है कि पर्दे पर किसी कलाकार का रोल इतना सधा हुआ होता है कि जिसमें एक आदर्श पुरुष के सभी गुण दिखाये जाते हैं। अब विडम्बना यह है कि हम उक्त कलाकार की प्रशंसा करते हें और अनुकरण करते हैं उनकी केवल बाहरी छवि का। हम आकर्षित होते हैं उनके चरित्र से भी, परन्तु उसको नहीं अपनाते। हम केवल दिखने वाले हीरो बनना चाहते हैं। यह एक अलग वास्तविकता है कि हमारा वास्तविक जीवन अंदर से बहुत अलग नहीं है जो रील लाइफ की रीयल्टी से बहुत मेल खाता है। अब अगर अपने वास्तविक जीवन की तुलना फिल्मी जीवन से की जाए तो आश्चर्य नहीं होगा कि ये दोनों जीवन बिल्कुल एक ही तरह से चलते हैं। एक है रील और दूसरा है रीयल। एक को चलाता है फिल्म निर्माता व निर्देशक तथा दूसरे को चलाता है परमात्मा व परमेश्वर। ये दोनों ही अपने अपने क्षेत्र के सुप्रीमो है, इन दोनों के पास ही सबकी डोर होती है, जिससे कि वह जब चाहे, जहां चाहे, जैसे चाहे और जिसको चाहे नचा सकता है। एक फिल्म निर्देशक अपनी डोर से सभी पात्रों को अभिनय में जीना सिखाता है, नाच-गाना भी सिखाता है तथा जरूरत पडऩे पर सस्पेंस भी पैदा करता है। इसी हिसाब से ही कहानी में मोड़ भी लेता है, जिससे कि पात्रों के जीवन में उतार-चढ़ाव भी लाता है। ठीक ऐसा ही क्या हमारे जीवन में नही होता है? हम भी सब तो इस दुनिया में एक पात्र की ही तरह से तो है, यहां पर तो एक ही आदमी को कई तरह के पात्रों को एकसाथ जीना पड़ता है क्योंकि एक ही व्यक्ति के पास कई प्रकार के रिश्ते होते हैं और इन सभी को एकसाथ निभाना होता है, सभी के साथ न्याय करना होता है, नहीं तो जीवन में एक भूचाल सा आ जाता है। अगर किसी भी रिश्ते को कोई चोट पहुंची या कोई कसर रही तो ठीक उसी तरह का दर्द महसूस होता है जिस प्रकार एक कलाकार की अच्छी खासी बड़े बजट वाली फिल्म फ्लॉप हो जाने के बाद की स्थिति हो जाती है। जिस तरह से कोई कलाकार फिल्मों में काम करके ही अपने अभिनय में परिपक्व होता जाता है तथा दर्शको के बीच में लोकप्रिय भी हो जाता है तथा फिल्मी दुनिया में उसकी साख भी बनती जाती है। फिर फिल्म निर्देशक उस अभिनेता को अपनी किसी खास फिल्म के लिए अनुबंधित करता है क्योंकि पब्लिक के बीच में उसकी खास पहचान व इमेज बन जाने के कारण पूरी फिल्म उसके ग्लैमर को कैश कराती है। अत: इस प्रकार फिल्म किसी संदेश को जन-जन तक भी पहुंचाती है तथा हिट भी हो जाती है। बिल्कुल ठीक इसी प्रकार से हमारे वास्तविक जीवन में भी हमारी जिंदगी का निर्देशक अर्थात परमात्मा भी एक ऐसे ही आदमी का चुनाव करता है जिसके हर एक क्षण में तथा हर एक सांस में ईश्वर व परमात्मा समाया हुआ हो, एक ऐसा इंसान जो हमेशा परमात्मा का ही अनुभव करता हो तथा जिसके जीवन के हरएक पल में ईश्वर साक्षी हो। वह एक ऐसे इंसान को अपना संदेश देने के लिए, लोगों को सत्य व असत्य का मार्ग समझाने तथा धर्म का पालन करवाने के लिए हमारे समक्ष अपना देवदूत बनाकर भेजता है। यहां पर परमात्मा भी पर्दे के पीछे से अपना काम करता है। बस हमें वह दिखाई नही देता है, परन्तु होता सब उसी की ही मर्जी का है। यहां पर हम भी सब पात्र की ही तरह कार्य करते हैं हमारी वास्तविक कहानी में वह मुख्य अभिनेता का किरदार एक ऐसे इंसान को सौंप देता है जिसमें ईश्वर के प्रति सच्ची लगन व पूर्ण समर्पण की भावना होती है। वह अपने अनुभव, संस्मरणों को उदाहरण सहित हमारे समक्ष रखकर हमको ईश्वर की शरण में पहुंचाने का कार्य करता है तथा जीवन को सच्ची तरह से जीने की कला भी सिखाता है। ऐसे कई साधू-संत, महात्माओं व गुरुओं ने अपना पूरा जीवन आनंद में ही जिया है तथा हमें भी जीवन को जी भर जी लेने का तरीका भी बताया है। हम ऐसे महात्माओं का बहुत सम्मान करते, उनके प्रवचनों व कही हुई बातों को बहुत ध्यान से सुनते हैं, इनको ईश्वर के समतुल्य भी समझने लगते हैं तथा इनको ईश्वर की ही तरह से पूजते हैं। हम इनसे पूरी भक्ति व आस्था के साथ जुड़ जाते हैं, हम दूर-दूर तक जाकर इनके प्रवचनों को सुनते तथा सम्मेलनों में भाग भी लेते है, कई-कई दिनों तक इन महापुरुषों के सानिध्य में रहते हैं और कुछ लोग इनके द्वारा दिये गये प्रसाद स्वरूप दीक्षा कार्यक्रम में भी अपना नाम लिखाते हैं तथा इनसे दीक्षा भी लेते। वहां पर इस तरह का माहौल बन जाता है कि इनके लाखों लोग एक साथ प्रशंसक होते, भारी भीड़ एकसाथ जय-जयकार करती है। लगभग सभी संत व महात्मा सभी भक्तों को जीवन का सार बताते हैं कि क्रोध, लोभ, माया, मोह सभी छोड़ो; केवल ईश्वर व परमात्मा का भजन करो। सभी साधु संत अपने कई संस्मरणों व प्रसंगों सहित सभी भक्तों को ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ानें के तरीके व लाभ बताते हैं, इस तरह से पूरा वातावरण ईश्वरीय ही हो जाता है एक समय इनके अन्दर से परमात्मा ही आनन्ददायी प्रवचनों की बौछार से सभी भक्तों को भिगो देता है और सभी लोग हृदय से बहुत आनंदित अनुभव करते हैं। अब खास बात देखनी यह होती है कि जितनी भी बातें हमको हमारे जीवन में अपनाने व आचरण में शामिल करने के लिए कही जाती हैं, उसमें हम कितनी आस्था से खरे उतरते हैं और इन सब बातों को अपने जीवन में कितना आत्मसात करते हैं और कितना अपने दैनिक जीवन के उपयोग में लाते हैं ? साधु-महात्माओं द्वारा ईश्वरीय बातें सुनने में तो किसी को भी बहुत अच्छी लगती हैं लेकिन इन सबका अपने जीवन में अमल करना मुख्य बात है।

Friday, July 31, 2009

हौसला रख चलते रहें, मिलेगा तरक्की का टर्निंग प्वाइंट




हर एक के जीवन काल में कभी न कभी अर्पाचुनिटी नामक अवसर आता अवश्य है, दरवाजा भी खटखटाता है, कभी-कभी बहुत धीमे से आवाज सुनाई पड़ती है, और हममें से बहुत लोग इस सुनहरे अवसर को भ्रम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। और जो लोग इसके संकेत को समझकर अपना लेते हैं, उनके जीवन को नई दिशा मिल जाती है, और यही बन जाता है जीवन का टर्निंग प्वाइंट।


आज का मनुष्य बिल्कुल मशीन हो गया है, वह सुबह से शाम तक मशीन की तरह कार्य करता है। सबकुछ पूरी तरह से सिस्टमैटिक हो गया है, सब की जीवन शैली अपनी जगह सेट हो गयी है। चाहे वह ९ से ५ तक काम करने वाला सरकारी कर्मचारी हो, सुबह ८ से रात १० बजे तक काम करने वाला व्यापारी हो या फिर असीमित समय में काम करने वाला कोई वर्किंग प्रोफेशनल हो, सभी लोग आज जीवन की इसी रस्साकशी में फं सते-जूझते हुए दिखाई दे रहे हैं। हमसब अपने जीवन में हमेशा एक बूम की तलाश में रहते हैं कि कोई मौका ऐसा मिल जाए कि नौकरी में प्रमोशन मिल जाए, कोई अवसर ऐसा हाथ लग जाए कि व्यापार में तरक्की हो जाए, कोई ऐसी परिस्थिति हो जाए कि बॉस की नजरों में भी अपना नाम हो जाए। इसी तरह के ख्यालात, सोच व सपने आजकल लगभग हर काम करने वालों के मन में हैं। हर कोई अपनी वर्तमान तरक्की से खुश व संतुष्ट नहीं है तथा हर एक व्यक्ति भविष्य में आगे बढऩा चाहता है, इसी कारण हर एक आदमी अवसर की खोज करता फिर रहा है। अब अहम बात यह है कि हमको यह अवसर मिलेगा कहां से? कौन इसे हमें देगा? इसका तरीका व रास्ता कौन सा होगा? कौन बतायेगा यह रास्ता? इन सब सवालों के जवाब हमें अपने काम से ही ढूंढऩे होंगे। हमें जो भी कार्य सौंपा गया है, अगर हम उस कार्य को पूरी एकाग्रता व ईमानदारी से करते रहें तो वहीं पर हमको उसके रास्ते का संकेत भी दिखेगा व वहां तक पहुंचने का तरीका भी। बस एक बात हमें पहले ध्यान में ले लेना जरूरी है कि हम अपने साथ पूरी ईमानदारी बरतें, अगर इसमें जरा सी भी लापरवाही या चूक हुई तो फिर आगे बहुत मुश्किल हो जायेगी, क्योंकि हमारे भविष्य का रास्ता हमारे वर्तमान से ही होकर गुजरता है। हम आज जो भी कर रहे हैं भविष्य में हमें उसी का गुणात्मक रूप में प्रतिफल मिलेगा। दूसरी बात यह कि हम अपने कार्य में अपना पूरा समर्पण व त्याग की भावना रखें तथा मेहनत करने से भी पीछे न हटें क्योंकि मेहनत किसी भी कार्य में किये गये इनपुट की तरह होती है और परिणाम उसका आउटपुट। हम अक्सर महसूस करते हैं कि अपने जीवन में एक ही काम को करते-करते ऊब सी होने लगती है। हमारा मन भी थकान का अनुभव करने लगता है क्योंकि हर रोज सुबह से लेकर शाम तक वही काम-एक ही काम। ऐसे में काम करने की ऊर्जा का क्षय होने लगता है, जिससे भविष्य में आगे बढऩा, प्रगति व उन्नति के मार्ग पर पहुंचना बड़ा मुश्किल भरा लगने लगता है। अब सोचिये कि हम जिस कार्य को कर रहे हैं तथा जिस रास्ते पर चल रहे हैं और उसी में ऊब महसूस करने लगेंगे तो आगे का सफर कैसे होगा? हम आगे कैसे पहुंचेंगे? इसको इस बात से समझने का प्रयास करें कि जैसे बचपन में अगर आपने साइकिल चलाई हो, और मान लो कि हमें साइकिल से किसी पुल या पहाड़ी पर चढऩा हो। हम अपनी मेहनत व ताकत से चढ़ाई तक पहुंचते-पहुंचते बहुत थकान का अनुभव करते हैं फिर ऐसा लगता है कि अब आगे साइकिल नहीं चढ़ेगी और ठीक चढ़ाई से पहले जब मुश्किल से चार या पांच पैडल ही लगाने दूर हों तो ऐसा लगता है कि बस अब साइकिल से उतर पड़ो। बस यही चार या पांच पैडल ही चढ़ाई में बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अगर थोड़ी और मेहनत करी, थोड़ी और ताकत दिखाई तब मिल जाता है हमें लाइफ का टर्निंग प्वाइंट। फिर पुल उतरने में मेहनत करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती, आगे आराम है पूरा आनंद है। तब समय आ जाता है अपनी की गई मेहनत का लाभ उठाने का। हमारे जीवन में यह जरूरी हो जाता है कि हम अपने किसी भी कार्य को अपनी पूरी सामथ्र्य व सजगता के साथ करें। हम जब किसी भी कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वह एक बड़े दरवाजे की तरह होता है और जैसे-जैसे हम अपनी कर्तव्यनिष्ठा के साथ आगे बढ़ते जाते हैं तब हमें उस काम की बारीकियों को समझने का भी अवसर मिलता है, जो सफलता के छोटे-छोटे दरवाजे की तरह होते हैं। अब यह हमारे ऊपर है कि हम इनसे कितना सीखकर अपना रास्ता बना लेते हैं और अपनी तरक्की का टर्निंग प्वाइंट ढूंढ़ निकालते हैं। वैसे तो जिंदगी में अपने-अपने कार्यक्षेत्र में चलते-चलते बहुत से रास्ते दिखाई पड़ते हैं, जिनको एकसाथ देखने पर कभी-कभी भ्रम की भी स्थिति हो सकती है फिर मार्ग का सही चुनाव ही हमें अपने अपने लक्ष्य तक पहुंचाता है, नहीं तो बाकी की जिन्दगी अपना मूल रास्ता खोजने में ही लग जायेगी। जिस प्रकार कभी-कभी हम रास्ते की तलाश में चलते-चलते ऐसे रास्ते पर पहुंच जाते हैं जो आगे चलकर बंद हो जाता है, हमें जिसका डेड एन्ड मिल जाता है। ऐसी स्थिति में हम क्या करते हैं कि तुरन्त मार्ग बदलकर वापिस हो जाते हैं और वह भी बिना समय गंवाये। उसी प्रकार हमारी जिन्दगी में भी चलते-चलते कभी-कभी हमें कुछ समझ नहीं आता, आगे सब अन्धकार सा दिखाई देने लगता है और रास्ता खत्म सा मालूम पड़ता है। ऐसी स्थिति में परेशान नहीं होना है और न ही समय नष्ट करना है, बल्कि विवेक व अन्तर्मन से काम लेते हुए केवल 'यू टर्नÓ लेना होता है। टर्निंग प्वाइंट हमारे जीवन के सफर में मील के पत्थर की तरह हमें मिलता है क्योंकि यह हमारे कार्य व रास्ते की सही जानकारी भी देता है। हमें अपने अन्दर साहस व मेहनत की कोई कमी महसूस नहीं होनी चाहिए बल्कि हमेशा पहले से बेहतर इनपुट देने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे हर मनुष्य के अन्दर काम करने की अपार क्षमता होती है, इसका उदाहरण है कि हम अपने हर कदम में अपने ही रिकॉर्ड तोड़कर नये बनाते रहते हैं, हम अपनी ताकत व मेहनत का मापदंड स्वयं ही बढ़ाते हैं। यह बिल्कुल इस तरह से है कि जैसे आप अपनी मुट्ठी भींचकर देखें, फिर आप से कहा जाए कि मुट्ठी में और कसाव दें, तो आप महसूस करेंगे कि आपकी हर कोशिश में मुट्ठी और भिंचती जाएगी। यह आपकी कोशिश का ही परिणाम होता है और आपको मिलता है अपनी मेहनत का एक नया टर्निंग प्वाइंट, जिससे हमें यह मालूम होता है कि हममें हर वक्त और ज्यादा मेहनत कर पाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। हम अपने रास्ते पर चलते-चलते थक जरूर सकते हैं, परन्तु जरूरत हमेशा इस बात की है कि आगे बढ़ते जाने की इच्छा प्रबल होनी चाहिए, न कि छोटी या बड़ी मुसीबतों के आगे अपने घुटने ही टेक दें। हमारी यही विल-पावर ही हमें सफलता के दरवाजे तक ले जाती है। हमारी व्यवसायिक जिन्दगी के साथ हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी अक्सर कुछेक परिस्थितियों के बदलने मात्र से ही जीवन में एक बड़ा बदलाव देखा जा सकता है। पल भर में ही सबकुछ बदल जाता है। कभी अच्छे से बुरा और बुरा से अच्छा। स्थितियां बिल्कुल बदल जाती हैं और इसी टर्निंग प्वाइंट से हमारे जीवन में एक मोड़ आ जाता है। जीवन चलते रहने का ही नाम है, हमारी जिन्दगी के दो फेज़ एक साथ चलते है। एक व्यवसायिक व दूसरा निजी, यह हमारी ही जिम्मेदारी है कि हम इन दोनों को एकसाथ आगे बढ़ाए तथा एक बात और जरुरी है कि हम अपनी व्यवसायिक दुनियां में अपनी पारिवारिक व निजी जिन्दगी को कत्तई धुसनें न दें, बल्कि इन दोनों के बीच एक उचित फासला बनाकर चलें। वैसे भी ये दोनों समानान्तर रास्ते हैं। इनके आपस में मिल जानें से टकराव की स्थिति आ सकती है। इस प्रकार हमें हर वक्त सजग व सचेत रहकर आगे चलते जाना है, यही मानते हुए कि हमारी जिन्दगी की प्रगति का टर्निंग प्वाइंट बस आगे कुछ ही दूर पर है।

Thursday, July 23, 2009

स्कूली कोर्स में शामिल होना चाहिए योग और ध्यान


स्कूलों में शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए खेलकूद कराया जाता है तथा पीटी फिजिकल टे्रनिंग भी औपचारिक विषय की तरह प्रायोगिक रूप से दी जाती है। इसमें अधिकतर बच्चों की रुचि नहीं होती। योग और ध्यान को एक विषय की तरह पढ़ाने से जहां एक तरफ तन तंदुरुस्त व फिट रहेगा वहीं नियमित रूप से मेडिटेशन करने से बच्चों में अपने ही बारे मे रोमांचक जानकारी मिलेगी।

बच्चे ही हमारे देश का भविष्य है और हमारे देश के उज्जवल भविष्य के लिये हर एक बच्चे का शिक्षित होना बहुत आवश्यक है, जिसके लिये हमारी सरकारें विभिन्न तरह की योजनाएं चलाती हैं ताकि कोई भी बच्चा अनपढ़ न रह जाय। आज के बदलते हुये परिवेश में बच्चों के पाठ्यक्रम में गणित, विज्ञान व कम्प्यूटर के साथ योग व ध्यान को भी कोर्स में शामिल कर दिया जाय तो बच्चों के व्यक्तित्व व प्रतिभा में बहुआयामी निखार देखा जा सकता है। बच्चों के पाठ्यकम में नये विषयों के जोडऩे का अर्थ बच्चों को आज की पूरी जानकारी से लगातार अपडेट करते रहना ही होता है जिससे उनको ज्ञान के विकास के साथ ही अनुभव भी प्राप्त होता जाता है। बच्चों को जानकारी देने की इसी कड़ी में ही अभी सेक्स एजूकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करने की खूब जोर वकालत हो रही है। हम गणित के फार्मूले सीखते-सीखते और आधुनिक तकनीक को इस्तेमाल करते-करते जीवन की वास्तविक तकनीक को सीखना व सिखाना भूल गये। मूलत: हमने अभी तक योग व ध्यान को अपने जीवन में इतनी गम्भीरता से शामिल नहीं किया। इसकी वास्तविकता यह भी हो सकती है कि हमने अपने जीवन में उसी को अपनाया व बढ़ावा दिया जिसको हमने पढ़ा या जाना है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अभी तक हमें इसे एक विषय की तरह नहीं पढ़ाया गया, क्योंकि अभी तक केवल उन्हीं विषय का विस्तार हो पाया है जिनको हमने नियमित रुप से पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ा हो, जिसके गणित, विज्ञान व कम्प्यूटर शिक्षा का विस्तारित रूप आज उदाहरण के तौर पर हम सबके सामने हंै। आज जरूरत इस बात की है कि योग और ध्यान को बच्चों की शुरुआती शिक्षा से ही पाठ्यक्रम में शामिल करवाने की पुरजोर कोशिश की जाय ताकि सभी बच्चों को एक साथ छोटी उम्र से ही ध्यान व योग के पाठ को नियमित रूप से पढ़ाया जा सके। अभी तक स्कूलों में शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए खेलकूद कराया जाता है तथा पीटी फिजिकल टे्रनिंग भी औपचारिक तौर पर दी जाती है। इसमें अधिकतर बच्चों की रुचि भी नहीं होती है बल्कि आज के समय में यह एक ऊबाउ विषय की तरह है। योग और ध्यान को एक विषय की तरह पढ़ाने से जहां एक तरफ तन तंदुरुस्त व फिट रहेगा वहीं नियमित रूप से मेडिटेशन करने से बच्चों में अपने ही बारे में रोमांचक जानकारी मिलेगी। स्कूलों में टाइम टेबल के हिसाब से योग व ध्यान के बिषय का भी एक थ्योरी व प्रैक्टिकल पीरियड रखने से मन व दिमाग दोनों को नई स्फूर्ति मिलेगी। इस विषय को रुचिकर बनाना होगा क्योंकि बच्चे जो पढ़ते है, उन्हीं विषयों को जानने व समझने की उनमें अत्यधिक उत्सुकता व जिज्ञासा होती है।
आज योग के चमत्कार को कौन नहीं जानता तथा ध्यान की चेतना से कौन अनजान है? अगर हम कुछ सब जान रहे हैं तो बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा से ही उनको इस दिशा में अग्रसर कर दिया जाय ताकि उनकी अच्छी पढ़ाई-लिखाई के साथ बच्चा सदैव तन व मन से फिट व तंदुरस्त रह सके। सच्चाई यह है कि पढ़ाई लिखाई के इतने व्यस्ततम माहौल में बच्चों की सुबह से शाम तक पूरी दिनचर्या इतनी टाइट हो चुकी है कि उनके पास खाली समय बिल्कुल नहीं रहा। कोई बच्चा औसत से अत्यधिक मोटा, तो कोई अत्यधिक दुबला हो रहा है। इस प्रकार से बच्चों की सेहत का अनुपात कम होता जा रहा है। इनकी छोटी उम्र में ही अनेक प्रकार की बड़ी ब बीमारियों के लक्षण अभी से दिखाई पडऩे शुरू हो जाते हं। इसमे बच्चों की कोई गलती नहीं है, गलती हमारी है कि हमने उन्हें नहीं पढ़ाया। कोई बच्चा आज गणित के नये-नये फार्मूले, विज्ञान की नई तकनीक व अविष्कार को नौटंकी क्यों नहीं कहता, बल्कि उसके बारे में अधिक से अधिक जानना चाहता है। बच्चों के पास अभी समय है, अगर अभी से योग व ध्यान को इनकी शिक्षा व पाठ्यक्रम में जोड़ दिया जाय तो तुरन्त से ही इसके अभूतपूर्व परिणाम हमारे सामने आने शुरू हो जाएंगे। ध्यान की अद्भुत कला शुरुआत से ही बच्चों में विकसित की जानी चाहिए। इस प्रकार वे जो कुछ भी पढेंग़े-लिखेंगे, सब कुछ उनके दिमाग में चला जायेगा।
योग व ध्यान को बच्चों के जीवन में पढ़ाई के साथ और विषयों की तरह अपनाने से बच्चों के अन्दर सकारात्मक विचार व ऊर्जा उत्पन्न होने लगेगी। धीरे-धीरे बच्चा आत्मनिश्चयी व द्रढ़संकल्पी होकर अपने हर कार्य को सृजनात्मक व रचनात्मक कला के जौहर से करता है तथा जिन्दगी की हर बाजी जीतता हुआ दिखाई देता है। जहां स्कूल में पाठ्यक्रम के अन्य विषयों को पढऩे से बच्चे के अन्दर बौद्धिक क्षमता बढ़ती है, वहीं ध्यान को पढऩे से वह दूसरे व्यक्ति को भी आत्मीय रूप से अच्छी तरह समझ सकता है। सही मायनों में इस तरह से योग और ध्यान को स्कूल कोर्स में शामिल करके ही बच्चों की शिक्षा सम्पूर्ण की जा सकती है।

Thursday, July 16, 2009

अपना स्वभाव बदलें, किसी से अपेक्षा न रखें



आज लगभग हर मनुष्य इंसानी रिश्तों में प्यार ढूंढता नजर आ रहा है। आज के इस प्रयोगवादी माहौल में हर इंसान रिश्तों में किसी न किसी तरह की कमी महसूस कर रहा है। चाहे हमारा पारिवारिक व घरेलू रिश्ता हो या फिर दोस्त, व्यवहारी अथवा पड़ोसी आदि का। कहीं न कहीं हम गलतफहमी के शिकार हो रहे हैं। आज रिश्तों के बीच से मधुरता, आपसी सामंजस्य व मेलजोल कहीं खो सा गया है। इसका कारण शायद दूसरों से आवश्यकता से अधिक अपेक्षा रखना भी हो सकता है।


हमारा जीवन अकेले नहीं चल सकता। हमें अपने पूरे जीवन काल में चाहे वह शुरुआती दौर की पढ़ाई लिखाई का मसला हो, नौकरी रोजगार या फिर अपने रिश्तेदार पड़ोसियों का। जीवन के दौर में किसी न किसी किस्म का अपने जान पहचान वालों से हमें सहयोग लेना पड़ता है। जो हमारा भरोसा भी होता है कि जरूरत के समय या किसी आकस्मिक तौर पर कुछ लोग हमारे साथ खड़े होंगे। वस्तुत: किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार का सहयोग लेना या देना हमारे जीवन में एक डील की तरह होती है जो 'गिव एंड टेकÓ सिद्धांत पर निर्भर करती है। इस पॉलिसी की ही तरह जीवन के भी कुछ नियम हंै कि सबसे पहले आप किसी से अपेक्षा न रखें कि फलां व्यक्ति आपके काम आयेगा, वह आपकी सहायता करेगा। इसको इस उदाहरण से समझें कि अगर हम किसी गरीब को पैसे देतेे हैं या किसी भूखे को खाना खिलाते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से वह हमारी कोई मदद नहीं करता लेकिन जब हम कभी भी किसी तरह की मुसीबत में होते हैं तो ईश्वर किसी न किसी व्यक्ति को हमारे पास भेज देता है। इसलिये यह जरूरी नहीं कि हम जिसकी मदद कर रहे हंै वही हमारी सहायता करेगा। हमारा कत्र्तव्य यह होना चाहिए कि हम अपना काम पूरी निष्पक्षता व बिना किसी अपेक्षा के करते जाएं। एक बात तय है कि अगर हमें अपने जीवन में लगातार अपने मित्रों, पड़ोसियों व रिश्तेदारों से सहयोग मिलता है तो यह समझें कि आप दूसरों के मददगार हैं, और अगर नहीं, तो जरूरत है आपको पहल करने की। पहले दो, बाद में लो।
इसका सिद्धांत ही बिल्कुल अलग है। हमें बिना किसी अपेक्षा के वह काम करते जाना है, हमें वो सब चीजें देनी हंै जिनकी हमें अपने जीवन में आवश्यकता हो। जो हमारे लिये बहुत जरूरी हो, वह सब हम पहले दे। मान लें कि हम अपने किसी रिश्ते में प्यार की कमी महसूस कर रहे हों और हमें प्यार की जरूरत हो, तो हमें इधर उधर नहीं ढूंढना है, हमें पहले वह चीज अपने अन्दर डेवलप करनी होगी। अपने आपको प्यार से भरना पड़ेगा। हम अपने आपको प्यार से इतना भर दें कि जैसे किसी बर्तन में उसकी क्षमता से ज्यादा किसी चीज को भर देना, फिर वह पदार्थ इधर-उधर बिखरने सा लगेगा। फिर हमें अपने चारों तरफ प्यार की सुगंध की अनोखी अनुभूति होनी शुरू हो जाएगी। ऐसी स्थिति में हम सामने वाले की विचार व प्रकृति को बिल्कुल ध्यान न दें, क्योंकि उसका स्वभाव दूसरा हो सकता है। हमें अपना स्वभाव बनाना है। साथ ही दूसरे व्यक्ति की किसी भी मनोदशा को अपने मस्तिष्क में न कैद करें, क्योंकि इससे हमारा मन किसी पूर्वाग्रह का भी शिकार हो सकता है जिससे कि निगेटिव परसेप्शन की अधिक संभावना हो जाती है। अगर हमें किसी से सम्मान पाना है तो यह किसी से जबर्दस्ती हासिल नहीं किया जा सकता। हमें दूसरों की नजरों में सम्मान पैदा करने के लिए पहले उन्हें सम्मान देना होगा। हमें यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि हम जो कुछ भी करते हैं उसके परिणाम हमें उसी तरह मिलते हैं अगर हमने किसी को प्यार दिया तो प्यार मिला, अगर हमने किसी को मुस्कुराहट दी तो हमारी जिन्दगी में भी मुस्कुराहट आएंगी। सवाल दूसरा है कि हम अपने काम के प्रति कितना कमिटेड हंै। एक कहानी है, एक साधु नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू नदी में पड़ा तड़प रहा है। साधु ने सोचा कि इस बिच्छू को पानी से बाहर निकालकर फेंक दंू तो इसकी जान बच जाएगी। साधु ने बिच्छू को हाथ से पकड़कर जैसे ही पानी से बाहर फेंकना चाहा, बिच्छू ने हाथ में डंक मार दिया और झटका लगने के कारण बिच्छू फिर पानी में गिरकर तड़पने लगा। साधु ने फिर उसे उठाना चाहा, बिच्छू ने फिर डंक मारा। साधु ने अपना स्वभाव फिर भी नहीं बदला तथा अपनी कोशिश करते रहे। साधु के साथ ही नहा रहा एक दूसरा व्यक्ति सब देख रहा था। उसने साधु से कहा- कि हे महात्मा जी, जब यह बिच्छू आपको बार-बार काट रहा है फिर भी आप इसकी जान बचाना चाह रहे हैं! साधु ने जवाब दिया कि जब यह बिच्छू अपना स्वभाव नहीं बदल रहा तो फिर मैं अपना स्वभाव कैसे बदलूं? यह उन साधु महात्मा का स्वभाव था तथा यह प्रक्रिया उनके स्वभाव की वास्तविक प्रकृति बन गई थी। बात यही है, एक तो हम सामने वाले की एक इमेज अपने मस्तिष्क में बना लेते हैं कि वह कैसा आदमी है और उसी इमेज के आधार पर ही पूरे कैलकुलेशन कर लेते हैं। कभी-कभी हमारे अपने रिश्तों में सुख की अभिलाषा इतनी अधिक बढ़ जाती है कि हम लोगों से कोरी अपेक्षाएं करने लग जाते हंै। हम उनको कितना सुख दे पा रहे हंै इस बात पर हमारा कोई ध्यान नहीं होता, सिर्फ रुझान होता है कि हमें क्या मिल रहा है। वस्तुत: उल्टा यहीं पर हो रहा है। हम फसल पहले काटना चाहते हैं जबकि बोया वैसा है ही नहीं। तो हमें पहले बोने पर ध्यान देना है। अगर बीज हमने अच्छी तरह बो दिये तो निश्चित फसल भी अच्छी ही होगी। तब सही मायनों में खुशहाली होगी, फिर किसी से अपेक्षा रखने की भी कोई आवश्यकता न होगी। इस तरह से हमें अपने जीवन में जो कुछ भी चाहिए, वह सब कुछ पहले हमें दूसरों पर न्योछावर करना होगा फिर सब कुछ मिलना शुरू हो जायेगा।