Tuesday, September 29, 2009

रक्तदान को महादान बनाने के लिए जन जागरुकता जरूरी


कुछ प्रोफेशनल ब्लड डोनर्स ब्लड बैंक के वर्किग स्टाफ के साथ साठ-गांठ से हर महीने या दस-पंद्रह दिन में अपना खून बेचकर रुपए कमाते हैं। इन्हें लोगों की जान की कोई परवाह नहीं, ये सरकारी नियमों का माखौल उड़ाते हैं तथा खून का गंदा खेल कर रहे हैं।

रक्त-दान महादान कहा जाता है। रक्तदान करने वाला महान हो जाता है और रक्त पाने वाले को नया जीवन मिल जाता है। २२ सितंबर स्वैच्छिक रक्त दान दिवस के रूप में मनाया जाता है। देखा जाता है कि इस दिन अनेक समाजसेवी संस्थाएं या ब्लड बैंक स्वैच्छिक रक्त दान व जागरुकता शिविर का आयोजन करते हैं। इनका उद्ïदेश्य लोगों को रक्त दान के प्रति जागरूक करना और जरूरत मंद लोगों के लिए रक्त उपलब्ध कराना होता है। परंतु, कहीं न कहीं रक्त दान करनें से कमजोरी या किसी प्रकार की बीमारी हो जाने की गलतफहमी व भ्रांति अभी भी लोगों की सोच पर हावी है। इसके चलते अभी भी गरीब व किसी जटिल बीमारी से ग्रस्त मरीज को समय पर ब्लड सुलभ तरीके से उपलब्ध नहीे हो पाता।
जब कोई बीमार अस्पताल में रक्त की आवश्यकता व कमी से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है तब उसका परिवार रक्त की व्यवस्था के लिए दर-दर भटकता फिरता है। ऐसे मौकों पर खास रिश्तेदार, करीबी, दोस्त और जिम्मेदार पड़ोसी भी मुंह फेरने लगते हैं। इस समय तीमारदार परिवार के लिए व्यक्ति की बीमारी से ज्यादा बड़ी समस्या हो जाती है कि किस तरह मरीज के लिए खून की तुरंत व्यवस्था की जाय? सरकारी या गैर सरकारी ब्लड बैंक भी ब्लड एक्सचेंज करके ही खून मुहैया कराते हैं। अत: किसी भी ब्लड बैंक से खून लेने के लिये ब्लड डोनर की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में आसानी से कोई भी ब्लड देने के लिये तैयार नहीं होता है। एक-दो यूनिट ब्लड तो किसी भी तरह बिना किसी ब्लड डोनर के खरीदा भी जा सकता है, क्योंकि बगैर एक्सचेंज के एक यूनिट ब्लड की कीमत बहुत ज्यादा होती है। किसी भी जटिल बीमारी या स्थिति में जब ज्यादा ब्लड की आवश्यकता होती है तब डायरेक्ट खरीदना भी साधारण व्यक्ति या किसी पीडि़त परिवार के लिये आसान नहीं होता है। अब सवाल यह है कि इस समय अपने रिश्तेदार, मित्र या पड़ोसी खून देने से आखिर क्यों कतराते हैं? यह कैसी भ्रांति है कि हम किसी को खून देने से कमजोर या बीमार पड़ सकते हैं? जब कि हम यह अच्छी तरह जानते हैं तथा भली-भांति सहमत भी हैं और मेडिकल साइंस की रिपोर्ट भी यही कहती है कि एक स्वस्थ शरीर से एक यूनिट खून निकलने या किसी जरूरतमंद को दान करने से रक्तदाता के शरीर पर किसी भी तरह का दुष्प्रभाव नहीं देखा जाता बल्कि यह हमारे शरीर के तमाम पोषक तत्वों को और तंदुरुस्त करता है तथा शरीर पर किसी भी तरह की कमजोरी भी नहीं होती व कुछ ही दिनों में शरीर में रक्त फिर से तैयार हो जाता है। वही ब्लड डोनर तीन महीने के बाद अपनें शरीर से दुबारा ब्लड निकलवाने या डोनेट करने के योग्य व सक्षम हो जाता है।
स्वैच्छिक रक्तदान व जागरुकता अभियान के लिए सरकार करोड़ों रुपये हर साल खर्च करती है, परंतु इसका व्यापक रूप से प्रचार नहीं हो पा रहा है। शायद इसीलिए लोगों में रक्तदान के प्रति जागरुकता की विशेष कमी देखी जा रही है। आखिर गड़बड़ी कहां पर हो रही है यह भी देखने व समझने की बात है। रक्तदान से होने वाली किसी भी प्रकार की कमजोरी या बीमारी की भ्रामक भ्रांति को दूर करने के लिए स्वैच्छिक रक्तदान शिविर से अधिक रक्तदान जागरुकता पर जोर देना चाहिए तथा लोगों को रक्तदान से शरीर पर होने वाले लाभों को अच्छी तरह से समझाने का भी प्रयास चाहिए। इसी जागरुकता की कमी के कारण ही लोग स्वैच्छिक रूप से रक्त देने के लिए तैयार नहीं हो पा रहे हैं, जिसके कारण सरकारी या गैर सरकारी ब्लड बैंक में पर्याप्त मात्रा में रक्त का स्टाक नहीं हो पाता है। शायद इसीलिए ब्लड बैंक से मिलने वाले खून की कीमत बहुत ज्यादा होती है। किसी आकस्मिक घटना के समय गरीब व सामान्य आदमी के लिए खून की व्यवस्था कर पाना सहज नहीं है, क्योंकि कोई भी ब्लड बैंक बिना किसी ब्लड डोनर के खून नहीं देता है। रक्तदान जागरुकता की कमी के साथ कुछ प्रोफेशनल ब्लड डोनर्स ने अपने शरीर से खून निकलवाने का धंधा बना लिया है, ये लोग ब्लड बैंक के वर्किग स्टाफ के साथ साठ-गांठ से हर महीने या दस-पंद्रह दिन में अपना खून बेचकर रुपए कमाते हैं। इन स्टाफ को भी खून व रक्तदाता के किसी भी मानक व नियम-कानून की कोई चिंता नहीं होती। कई जगहों पर पाया गया है कि इन्हें लोगों की जान की कोई परवाह नहीं, ये सरकारी नियमों का माखौल उड़ाते हैं तथा खून का गंदा खेल कर रहे हैं। लोगों की जिंदगी से खेलकर गंदे व्यापार से ढेरों रुपया कमाना ही इनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। आधारभूत बात यह है कि मुख्यत: कमी खून की नहीं बल्कि लोगों में जागरुकता की है। सरकार, समाजसेवी संस्थाएं व ब्लड बैेंक सभी लोग एकसाथ मिलकर रक्तदान जागरुकता अभियान व्यापक तरीके से करें। लोगों में रक्तदान में प्रति जागरुकता व उत्सुकता ही देश में होने वाली रक्त की अनुप्लब्धता को दूर कर सकती है, जब लोग खुद अपनी मर्जी व अर्जी से रक्तदान करने लगे व रक्त के दान का असली पुण्य समझे तब जाकर ही रक्तदान महादान कहलाएगा। -

Saturday, September 19, 2009

मस्ती की पाठशाला है पूरा मानव जीवन



जिंदगी हर एक बात पर हमें कुछ ना कुछ सिखाती है तथा आने वाला हर एक पल हमारे लिए एक नया अनुभव बन जाता है। आज के इस अर्थयुग में पैसा कमाने के लिये हमें अपने नौकरी-रोजगार में कई तरह की मुश्किलों आदि का सामना करना पड़ता है। व्यवसायिक प्रतियोगिता व प्रतिद्वंद्विता के दौर में अपनी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का दबाव भी हम पर बना होता है, जिससे ही हम अपनी पहचान बना सकते हैं।

अपने स्कूल के दिनों में तो मौज-मस्ती सभी ने की होगी। उस समय न कोई चिंता और न कोई फिकर। उन दिनों न कोई भूतकाल होता है, और न ही कोई भविष्य। बस जो भी चल रहा होता है वही बच्चे जाते हैं। प्रत्येक बच्चा हर एक पल व हर एक क्षण को पूरी मस्ती के साथ जीता है। स्कूल में तो क ख ग का ज्ञान किताब से मिलता है, परंतु जिंदगी का क ख ग सीखने के लिये हमे जिंदगी की पाठशाला से रू ब रू होना पड़ता है। यह हमारे जीवन की ऐसी पाठशाला है जो कभी खत्म नहीं होती। इसमें हमें नित्य नये अध्याय सीखने को मिलते हैं। हम सब यहां स्टूडेंट की तरह होते हैं। आवश्यकता यहां पर भी वही है कि हम इस पाठशाला में भी पूरा मस्त होकर सीखें तो हमारी जिंदगी पूरी मस्ती की पाठशााला से कम नहीं लगेगी। हम सभी नेे स्कूल में मौज-मस्ती के साथ पढ़ाई की, फिर नौकरी-रोजगार की बात हो या घर-गृहस्थी का कोई भी पड़ाव, जिंदगी के हर कदम पर एक अलग तरह की मौज है तथा अनोखी मस्ती। अब सब कुछ हम पर निर्भर करता है कि हम इस जिंदगी की पाठशाला से कितना सीखकर उसका आनंद उठा पाते हैं। अगर हम अपने बचपन की ही बात करें तो आज भी हम अपने बचपन को याद कर प्रसन्न हो जाते हैं। उस जीवन में किसी भी तरह की कोई टेंशन नहीं और किसी भी बात का कोई झंझट नहीं दिखता था। यह शुरुआती फेज़ कितना आनंदमयी होता है, जिसमें हम सब बच्चे पूरी मस्ती में होकर अपने बचपन का लुत्फ उठाते हैं। स्कूली जीवन की पढ़ाई-लिखाई छूटने के बाद में हम नौकरी-पेशे आदि में आ जाते हैं। स्कूल के किताबी पाठ के बाद में अब हमें जिंदगी के वास्तविक व यर्थाथ अध्याय पढऩे पड़ते हैं। अभी तक हमने स्कूल में पढऩा-लिखना, लोक व्यवहार व नैतिकता आदि जो कुछ भी सीखा, वह सब कुछ हमें अपने जीवन में उतारना व ढालना होता है। एक तरह से देखा जाय तो स्कूल के बाद का हमारा यह जीवन बिल्कुल एक प्रायोगिक शिक्षा की तरह से है। जिस प्रकार कोई छात्र या छात्रा जब किसी प्रोफेशनल कोर्स की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद उसे कुछ समय इन्टर्नशिप करनी होती है। अगर हम ध्यान से अपने जीवन को देखें व जियें तो हमारे जीवन का यह पड़ाव भी पूरी मौज-मस्ती में जिया जा सकता है तथा बिना एक पल भी गंवाये हम इसका पूरा आनंद ले सकते हैं। जिंदगी हर एक बात पर हमें कुछ ना कुछ सिखाती है तथा आने वाला हर एक पल हमारे लिए एक नया अनुभव बन जाता है। आज के इस अर्थयुग में पैसा कमाने के लिये हमें अपने नौकरी-रोजगार में कई तरह की मुश्किलों आदि का सामना करना पड़ता है। व्यवसायिक प्रतियोगिता व प्रतिद्वंद्विता के दौर में अपनी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का दबाव भी हम पर बना होता है, जिससे ही हम अपनी पहचान बना सकते हैं। ऐसे में एक बात का ध्यान रखना बहुत आवश्यक हो जाता है कि हम किसी भी काम को तनाव में रहकर नहीं कर सकते हैं। नौकरी व्यापार में कई तरह का दबाव, वर्क लोड व बॉस का प्रेशर इतना सब होने के बावजूद हमें खुद अपने काम में सौ प्रतिशत परिणाम की अपेक्षा होती है, क्योंकि अब सवाल हमारी परफॉर्मेन्स का बन जाता है। ऐसे में केवल एक ही रास्ता दिखाई देता है कि हम अपने काम में ही एन्जॉयमेंट ढूढ़े। आनंदमग्न होकर अपने काम में तल्लीन हो जाना ही सफलता की गारंटी बन जाता है। इसको इस उदाहरण से समझें कि कि अगर हम किसी तनाव में हैं या किसी समस्या से ग्रस्त हैं, और हम उससे निकलनें का हल खोज रहे हैं। परिणाम यह होता है कि अक्सर हल तो मिलता नहीं और इसके विपरीत हम अपना तनाव और बढ़ा लेते हैं। इसी समस्या पर किसी दूसरे व्यक्ति से राय या सलाह लेनें पर वह व्यक्ति हमको इसका हल तुरंत बता देता है, क्योंकि उसका दिमाग उस वक्त किसी तनाव में नही रहता। इसका अर्थ यही है कि जब हम कहीं पर उलझे हुए होते हैं तो हमारा दिमाग भी इसी भटकाव में धूमता रहता है तथा किसी भी स्थिति का बारीकी से विश्लेषण व आकलन नहीं कर पाता है। अगर हम भी ऐसी किसी स्थिति में किसी भी प्रकार का तनाव व दबाव का अनुभव न करें तो हम भी इसका हल व तरीका ढूढऩें में समर्थ व सफल हो सकेंगे। वैसे हमारी जिंदगी के भी कई रूप है क्योंकि हमारी जिंदगी कई स्टेप्स में चलती है बचपन से किशोरावस्था, युवावस्था व फिर वृद्धावस्था। इन सभी स्टेज में क्रमश: बहुत बदलाव देखा जाता है। देखते ही देखते कल का बच्चा युवा हो जाता है और फिर प्रबुद्ध व्यक्ति बन जाता है। जिंदगी के बीच रहकर तथा उसके बीच हॅसखेल कर हम सब कुछ सीखते चले जाते है। जीवन के हर दौर में अगर हम नाचते-गाते चलें तो फिर हमें जिंदगी का सही अर्थ मिल जाता है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई हो या घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी, ऑफिस का काम हो या फिर नौकरी-रोजगार में परेशानी। सब कुछ केवल पार्ट ऑफ दि लाइफ है। यह सब केवल हिस्सा मात्र है, यही सब कुछ नहीं हो जाता है। परंतु हम अपनी समझ से इन्हीं को सबकुछ मानकर बेवजह ही परेशान हुआ करते हैं। जब कि यह हमने भी देखा है कि कोई भी परेशानी हमेशा नहीं रहती, कोई झंझट सदैव नहीं चलता। चलता है तो बस जीवन। हम किसी भी चीज को अपने सिर पर बोझ की तरह न लें। अगर हम इसे बोझ मान बैठे तो फिर जल्द ही थकने की संभावना हो जायेगी। जीवन यात्रा का रस कम हो सकता है। हम ऐसा समझें की यह सब ऐसी जिम्मेंदारियां है कि बस हमसे बन पड़ रही है, और हम करते जा रहे है। जो कुछ किया उसका कोई गुमान नहीं, जो भी नहीं कर पाये उसका भी कोई क्षोभ नहीं। फिकर केवल एक बात की होनी चाहिए कि हम अपनें जीवन के हर पड़ाव में कितना ज्यादा मस्त हो सकते हैं। जिस प्रकार बचपन की प्रारंभिक शिक्षा की बात करें तो आजकल बच्चों को पढ़ाई के तनाव से बचानें के लिये स्कूलों में प्ले ग्रुप सेशन होता है। जिसमें बच्चों में खेल की मस्ती के साथ पढऩे-लिखने की आदत डाली जाती है जिससे कि बच्चा पढ़ाई में एन्जॉय करे, बोझ समझ कर बोर न हो जाय। हमें चाहिए कि बाकी की जिंदगी को भी हम इसी तरह से जियें, जिंदगी की हर खुशी को हम सब साथ मिलकर सेलेबे्रट करें। जीवन को एक आनंद के उत्सव के रूप में समझे व जिंदगी के हर सबक को एन्जाय के साथ सीखते चलें।
ईश्वर नें हमें जो जीवन दिया है वह मस्त होकर जीने के लिये ही दिया है। उसमें झूम जाने व डूब जाने के लिये दिया है। अगर हम मस्त होकर जियें तो उसकी हर एक बात, जिंदगी के हर पल व रिश्ते का सही अर्थ आसानी से समझ सकते हैं। उसकी दी हुई हर सॉस में उसका अनुभव कर सकते हैं। फिर हमारा पूरा जीवन आनंद की मौजों से भरा-पूरा लगने लगता है। चाहे वह हमारा परिवार हो, रिश्ते हों या लोक व्यवहार सभी में हमें आनंद दिखेगा व असीम रस की फुहार भी दिखाई देंगी।

Thursday, September 10, 2009

देश-दुनिया में हर जगह पहचान हैं बेटियां


बेटे की जगह जन्म लेती है बेटियां।
कोमल, सहज व सहृदय होती हैं बेटियां॥
अब बेटे से कहीं कम नहीं है बेटियां।
हर घर का सम्मान है बेटियां॥
देश दुनिया में हर जगह पहचान है बेटियां।
स्वर्णिम दिशा में उडऩे का अरमान है बेटियां॥
न रोके इन्हें कोई, न लगाएं इनपे बेडिय़ां।
क्योंकि अब देश का स्वाभिमान हैं बेटियां॥

ज हर जगह नारी सशक्तिकरण की बात हो रही है। महिलाओं को आगे लाने व उनको बढ़ावा देने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है। हो भी क्यों न, क्योंकि देश की आजादी के समय से ही कितने ही आंदोलनों व स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर संघर्ष किया। आज के इस कॉरपोरेट युग में भी महिलाओं की हिस्सेदारी व भागीदारी कम नहीं आंकी जा सकती। देश के विकास में इनके सराहनीय योगदान की अपेक्षा करना बेमानी होगी। देश की तरक्की के लिए हर एक महिला का जागरूक होना बहुत आवश्यक हो गया है। हमें भी देश के भविष्य के लिए महिलाओं की तस्वीर को और मजबूती से पेश करना होगा।
अब महिलाएं केवल घर के कामकाज तक सीमित नहीं रहीं। ये महिलाएं अब अपने घरों से निकल कर बड़े-बड़े ऑफिस संभाल रही हंै। प्रशासनिक स्तर से लेकर खेल, व्यापार, नौकरी, अंतरिक्ष, मीडिया तथा देश-विदेश हर जगह महिला, नारी व बेटियां अपने दम पर अपनी व देश की अमिट छाप छोडऩे में सफल रहीं। साधारण व घरेलू महिलाओं के लिए ऐसी समर्पित महिलाएं सदैव प्रेरणास्रोत व मार्ग प्रशस्ति का भी कार्य करती हैं। साधारण महिलाएं या छात्रा इनसे सबक लेकर अपनी जिंदगी में कुछ बनकर देश के लिए कुछ कर दिखाने का हौसला भी रखती हैं। महिलाएं आज भारतीय राजनीति का एक अहम व सशक्त हिस्सा बनती जा रही हैं। इसका एक उदाहरण हमारे सामने श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं जो आज भारत की राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में हैं। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने तथा उन्हें आगे लाने के लिए अभी केंद्र सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया, जिसमेंं महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पंचायती चुनाव में ५० फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। इससे महिलाओं को राजनीति में आने के ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकेंगे तथा महिलाओं की दावेदारी तथा समग्र विकास और सशक्त तरीके से हो सकेगा।
इतना सब होने के बावजूद कहीं न कहीं कन्या भ्रूण हत्या देश के गौरव व स्वाभिमान को कलंकित सा करता जा रहा है। एक तरफ हम महिलाओं के योगदान से अभिभूत होकर गौरांवित महसूस करते हैैं, वहीं दूसरी ओर गर्भ कन्या को उसके जन्म लेने से पहले ही एक नारी की कोख में मारे दे रहे हैं। यह कितनी विडम्बना है कि एक नारी ही अपनी ही कुल के साथ कैसी दुश्मनी निकाल रही है? इतना ही नहीं एक पुरुष, जिसको एक नारी ने ही जन्म दिया है, केवल एक पुत्र की चाहत में उसी नारी के कन्या भ्रूण की हत्या उसके जन्म लेने से पहले कर दे रहे हंै। केवल एक बेटे की ललक आज समाज को देश के विकास में अपनी भागीदारी निभाने वाली बेटी का हत्यारा बना रही है। सच यह भी है कि आज की बेटी किसी बेटे से कम नहीं है। इसका मुख्य कारण वैचारिक संकीर्णता कहा जाए या फिर इसके पीछे और कोई खास वजह? इन सबके पीछे क्या कारण हैं? ये हमें देखने होंगे। यह हमारी सबकी सामाजिक जिम्मेदारी बन जाती है कि हम इस समस्या की मूल वजह को तलाशें व इसका हल खोजें। आज यह कन्या भ्रूण हत्या समाज में इतना संवेदनशील व वीभत्स रूप ले चुका है कि इसे संगीन अपराध की धाराओं में गिना जा रहा है। आज मनुष्य किसी कन्या को जन्म देने से इतना क्यों घबरा रहा है? क्यों इतना सहमा हुआ है? उसका डर समाज में बढ़ती हुई लड़कियों व महिलाओं के प्रति सामाजिक असुरक्षा की भावना से भी हो सकता है। क्योंकि आये दिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़, शारीरिक शोषण, मार-पीट व बलात्कार जैसे क्रूर व जघन्य अपराध आम होते जा रहे हैं। कन्या भ्रूण हत्या का दूसरा बड़ा कारण लड़कियों के विवाह में दिए जाने वाले दान-दहेज की सामाजिक कुप्रथा भी कुछ कम जिम्मेदार नहीं है। समाज में उपजे इस वर्ग विशेष के बीच के अंतर की खाई, आपसी प्रतिद्वंद्विता तथा हीन भावना के डर से बचने के लिए भी मनुष्य ऐसे कठोर फैसले लेने पर कभी-कभी मजबूर हो जाता है।
ऐसा लगता है कि शायद अभी तक हमारी सरकारें ऐसे माता व पिता को अपने विश्वास में नहीं ले पाई हैं। उनको सामाजिक सुरक्षा व अधिकार का भरोसा नहीं दिला पाई हैं जिसके ही परिणामस्वरूप लोग सांसत में रहकर अभी तक अपनी धारणाओं में परिवर्तन लाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। जब तक हमारे समाज में व्याप्त इन बुराइयों का खात्मा नहीं होगा, लोग आश्वस्त नहीं होंगे। महिला सशक्तिकरण के बुनियादी पहलू पर हमारा प्रयास और मजबूत तब हो सकता है, जब हम महिलाओं को उन पर होने वाले किसी भी तरह के सामाजिक व घरेलू अत्याचार से मुक्त करवा दें। किसी भी नारी का जीवन एक बेटी से ही आरंभ होता है, इसलिए हर एक बेटी को जन्म लेने दें, उसे पलने दें तथा उसे आगे बढऩे से न रोकें। कहा गया है कि नारी दुर्गा का ही रूप है। नारी के कई रूप हैं। नारी के रूप में ही मॉ है, बहन है, पत्नी है व बेटी है। इनके रहने से ही हमारे घर का सम्मान है तथा इनकी उन्नति, प्रगति व सशक्त उपस्थिति हमारे देश का स्वाभिमान है।
बेटे की जगह जन्म लेती हं बेटियां।
कोमल, सहज व सहृदय होती हैं बेटियां॥
अब बेटे से कहीं कम नहीं है बेटियां।
हर घर का सम्मान है बेटियां॥
देश दुनिया में हर जगह पहचान है बेटियां।
स्वर्णिम दिशा में उडऩे का अरमान है बेटियां॥
न रोके इन्हें कोई, न लगाएं इनपे बेडिय़ां।
क्योंकि अब देश का स्वाभिमान हैं बेटियां॥

Saturday, September 5, 2009

अनमोल जीवन का समझें मोल


वेद-पुराण भी कहते हैं कि 36 करोड़ योनियों के बाद हमें मनुष्य का जीवन मिलता है। दुनिया में कितने ही छोटे-छोटे जीव जंतु, पशु-पक्षी सभी सांस लेते हैं। हमारे चारों ओर अनेक प्रकार का जीवन देखने को मिलता है। ईश्वर की बसाई गई इस दुनिया में कई तरह के प्राणियों का वास है। अगर हम बारीकी से इन सबका विश्लेषण व आकलन करें तो हम पाएंगे क्यों मानव जीवन को ही अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। अगर हम प्रकृति को देखें तो हमें सुंदर-सुंदर हरियाली दिखाई पड़ती है।

ईश्वर की विश्वव्यापी संरचना में सबसे सशक्त जीवन केवल मनुष्य को ही मिला है। वैसे तो जीवन सभी के पास है जीव-जंतु, पशु-पक्षी सभी श्वास लेते हैं। मनुष्य भी श्वास लेता है। परन्तु मनुष्य के पास अपनी बात व्यक्त करने के लिए सबसे मजबूत माध्यम है, उसकी बोलचाल की भाषा। वह बातचीत कर अपने विचार व्यक्त कर सकता है। यह विशेष योग्यता व क्षमता किसी दूसरे जीव-जंतु या पेड़-पौधे के पास नहीं है। इन सबसे अलग मनुष्य को एक और चीज बड़ी अद्भुत मिली और वह है विचारशील मस्तिष्क। मनुष्य किसी भी चीज को महसूस व समझने के अतिरिक्त सोच व विचार भी कर सकता है। उसका चिंतन सबसे महत्वपूर्ण है, जो मनुष्य को अन्य किसी भी जीवन से बहुत भिन्न व अद्वितीय कर देता है।
वेद-पुराण भी कहते हैं कि 36 करोड़ योनियों के बाद हमें मनुष्य का जीवन मिलता है। दुनिया में कितने ही छोटे-छोटे जीव जंतु, पशु-पक्षी सभी सांस लेते हैं। हमारे चारों ओर अनेक प्रकार का जीवन देखने को मिलता है। ईश्वर की बसाई गई इस दुनिया में कई तरह के प्राणियों का वास है। अगर हम बारीकी से इन सबका विश्लेषण व आकलन करें तो हम पाएंगे क्यों मानव जीवन को ही अनमोल व सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। अगर हम प्रकृति को देखे तो हमें सुंदर-सुंदर हरियाली दिखाई पड़ती है, बड़े-बड़े पेड़ दिखाई देते हैं जो तेज हवा के झोंकों के साथ झूमते हुए हमसे अपनी भाषा में कुछ कहते नजर आते हैं। खुशबूदार बेल व फूलदार पौधे भी रंग-बिरंगे फूलों व अपनी महक से हम सबको अपनी ओर आकर्षित कर मन मोह लेते हैं। इसी से ही ये अपनी प्रकृति व स्वभाव को अभिव्यक्त करते हैं। उनमें अलग तरह का जीवन दिखाई पड़ता है। उनकी भाषा केवल उनकी खुशबू है। वे अपनी महक से ही हमसे बातचीत करते हैं। हम भी अपने घर-आंगन में फूलदार पौधों को लगाते हैं। खुशबूदार बेल रोपते हैं। फूल खिलने पर उनकी सुगंध चारों ओर फैलती है तो मन बहुत प्रसन्न हो उठता है तथा एक अलग तरह की शांति की अनुभूति होती है। ये सब फूल खूबसूरत दिखने के साथ अपनी मौन भाषा के साथ प्रेम व शांति का संदेश देते हैं क्योंकि फूल को प्रेम व शांति का प्रतीक भी कहा गया है।
पेड़-पौधे व फूलों में महसूस करने की अद्भुत क्षमता होती है। लगभग हमारी ही तरह, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति का तरीका बहुत अलग है। जो जल्दी हर एक की समझ में नहीं आ सकता है। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि किसी व्यक्ति को फूल व उसकी सुगंध का कोई असर नही पड़ता, जबकि दूसरा आदमी रंग-बिरंगे फूलों को देखकर व महक से अभिभूत होकर अपने को रोक नहीं पाता और पौधे के पास जाकर बैठ जाता है। पशु-पक्षी अपनी सांकेतिक भाषा से आपस में बातचीत कर लेते हैं, हमारे लिए यह केवल आवाज है लेकिन यह इनकी अपनी भाषा है। एक पक्षी या कोई चिडिय़ा अपनी आवाज से सैकड़ों चिडिय़ा अपने पास बुला लेती है, गाय या कोई जानवर अपने बच्चे को अपनी आवाज से अपने पास बुला लेती है। उनकी हर आवाज कुछ न कुछ कहती है। सभी पशु-पक्षियों की अपनी अलग आवाज है। ये आपस में बात करने के लिए इसी भाषा का प्रयोग करते हैं। यह बिल्कुल ऐसा ही है कि जैसे हम किसी ऐसी जगह जाते हैं, जहां की भाषा व बोली से हम अंजान है। वहां पर न हम बोल पाते हैं और न ही वहां की भाषा को समझ ही पाते हैं, लेकिन वहां के लोग अपनी भाषा में बातचीत करते हैं। हमें उनकी बातें समझ में नहीं आती केवल आवाज ही सुनाई पड़ती है। पशु-पक्षियों में महसूस करने की भी क्षमता होती है, वह हमारी तरह बीमार भी पड़ते हैं तथा इनको भी हमारी तरह दवा व मरहम की जरूरत पड़ती है। मनुष्य को मिली इस बड़ी सौगात की सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी सोच व विचारशील दिमाग दोनों एक दूसरे को बढ़ाने का भी काम करता है।
अगर किसी व्यक्ति की सोच अच्छी, बड़ी व सकारात्मक हुई तो उसका दिमाग भी इसी तरह से बढ़ता जाता है फिर उसकी बु़िद्ध उसका और विस्तार कर देती है, धीरे-धीरे यह एक प्रक्रिया की तरह काम करने लगती है। मनुष्य इस मिले दुर्लभ जीवन के अवसर का लाभ उठा सकता है क्योंकि उसके पास समझने की शक्ति व समझदारी भी है, जो अन्य किसी भी जीवन को नहीं मिली। इसको अपना कर वह अपना जीवन महत्वपूर्ण बना सकता है क्योंकि व्यक्ति अपनी अनुभूति व अभिव्यक्ति से बहुत बलवान है। वैसे तो जीवन में बहुत झंझट हैं, लेकिन यह भी शाश्वत सच है कि यह मानव जीवन भी करोड़ों साल व असंख्य जीवन के झंझटों के बाद मिला है। हमारा जीवन दूसरे किसी भी जीवन से बहुत अलग व महान है क्योंकि हमारे पास दृष्टि, जीभ, विवेक, सोच, समझ व सहनशीलता सब कुछ है। अब सब कुछ हम पर निर्भर है कि हम ईश्वर के इस उपहार स्वरूप जीवन को कितना संभाल पाते हैं तथा अपनी बुद्धि, समझ व सहनशीलता को अपने जीवन में कितना उतार पाते हैं, जिससे कि हमारा यह अमूल्य जीवन तथा इस जीवन की कोई भी घड़ी व्यर्थ व निरर्थक न होने पाये। मानव जीवन देखा जाए तो कठिन भी है क्योंकि अपने इस जीवन में अपने साथ पारिवारिक जिम्मेदारी भी निभानी होती है, साथ ही कहीं से आपसी सामंजस्य भी न टूटने पाये यह भी देखना होता है। पशु-पक्षी व जीव-जंतु दूसरों की भावनाओं को नहीं समझ सकते, हमारे अंदर वह शक्ति है कि हम समझ सकते हैं तथा दूसरों की भावनाएं भी न आहत हो, यह भी ध्यान रखना पड़ता है। जिंदगी की तमाम जिम्मेदारियां कभी-कभी मुिश्कलें व झंझावात भी पैदा कर देते हैं। यह हमारे लिए बोझ नहीं बल्कि हमारा परीक्षण करती हैं और यथार्थ यही है कि जो इन सबको हंसते-मुस्कराते पार कर जाता है, वह अपने जीवन में सफल हो जाता है और उसका जीवन सार्थक हो जाता है। आज जितने भी लोग महान हुए, उनका जीवन भी बिल्कुल आसान नहीं रहा या उनके पास कोई झंझट या समस्या नहीं रही। भारत ऋ षियों व मुनियों का देश कहा जाता है। इन सभी ने मानव जीवन की श्रेष्ठता को जाना तथा इसके मूल्य को अच्छी तरह समझ कर अपने जीवन को सफल किया। इस धरती पर जन्मे कितने ही लोगों ने इस सबक को सीखा, वे जिंदगी की मुश्किलों से तनिक भी नहीं डरे बल्कि उन्होंने इन सबका सामना किया तथा अपने इस महत्वपूर्ण जन्म को कभी विफल नहीं होने दिया और अपने महानतम कार्यों से इस जीवन को और मूल्यवान कर दिया।

Friday, August 28, 2009

सब कुछ बयां कर देती हैं आंखें


आंखें हमारे जीवन में एक बड़ी दौलत की तरह हैं। इन्हीं आंखों से हमें अपने जीवन में कोई प्यारा लगने लगता है तो कोई दुश्मन नजर आता है। कोई अच्छा लगता है तो कोई बुरा। प्रेम, पीड़ा, कष्ट, संयोग-वियोग, शृंगार, वीररस सभी तरह के उद्गार आंखों से ही कभी अश्रु बन कर तो कभी चमक बनकर सब कुछ बयां कर देते हैं।

अंधता या अंधापन, देख न सकने की दशा का नाम है। दृष्टिहीनता भी इसी का नाम है। प्रकाश का अनुभव ना कर सकने से लेकर जो कार्य देखे बिना नहीं किए जा सकते, उसे अंधता कहा जाता है। इसीलिए मरने से पहले अपनी आंख दान करने से आप किसी दूसरे की जिंदगी में रोशनी फैला सकते हैं।
आंखें हर किसी के जीवन की शोभा हैं। हम पैदा होते ही सबसे पहले अपनी आंखों से ही इस दुनिया को देखना शुरू करते हैं। हम अपने माता-पिता, भाई-बहनों व अन्य रिश्तों को भी अपनी नवजात अवस्था से ही इन्हीं आंखों से पहचानना शुरू कर देते हैं। रंगों की पहचान भी आंखों से ही करते हैं। हमारे जीवन में आंखों का बहुत ही महत्व है। हमारे शरीर की सुंदरता में भी आंखों का बहुत योगदान होता है। खासकर नारी की सुंदरता को कवि अपनी कलात्मक शैली के द्वारा वर्णन करते हैं जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की आंखें नारी की सुंदरता को अलग-अलग तरीके से वर्णित व सुशोभित करती हं।
हमारा पूरा का पूरा व्यक्तित्व हमारी आंखों से दिखाई दे जाता है। हम अगर कभी कुछ छिपाना भी चाहें तो हमारी आंखें सब कुछ बयां कर देती हैं। हमारा आत्मविश्वास भी इन्हीं आंखों से ही झलकता हुआ दिखाई दे जाता है। अगर हम किसी दूसरे व्यक्ति पर अपना विश्वास जमाना चाहते हैं या उस पर अपना असर छोडऩा चाहते हैं तो हम उसकी आंखों में आंखें डालकर बात करते हैं, कमजोर व झूठा आदमी ऐसा नहीं कर सकता हैं। इसी प्रकार किसी भी प्रकार की खुशी या कोई गम हो, सब कुछ आंखों से ही प्रकट हो पड़ता है। जहां क्रोध के समय आंखें आग की तरह लाल हो जाती हैं, वहीं खुशी के समय आंखों में एक चमक देखी जाती है। हिंदी भाषा में कितने ही मुहावरे इन्हीं आंखों पर लिखे गये हैं। आंखों में शर्म आ जाना, आंखों द्वारा अपने क्रोध व प्यार को दर्शाना, गुस्से में अपनी आंखें लाल-पीली कर लेना, आंखें निकालना, आंखों में डर लाना, आंखों से किसी को डराना, आंखों को बन्द कर लेना, आंखें फेर लेना, आंखों में बिठाना, आंखों का तारा, आंखों में खटकना, आंखें सेंकना, आंखें चार हो जाना, आंखों में तस्वीर बसाना, आंखें चुराना न जाने कितनी ही तरह से हम अपनी भावनाओं को आंखों से व्यक्त करते हैं। जिस प्रकार से किसी व्यक्ति की आंखें उसके बारे में हमें बताती हैं, उसी प्रकार हमारी आंखें भी उसको पढऩे का काम करती हैंं। जिससे ही हम उसके बारे में सही-सही पता लगा सकते हैं क्योंकि किसी का अवलोकन व सूक्ष्म निरीक्षण भी हम अपनी इन्हीं आंखों से ही करते हैं। अब हम अपनी आंखों से ही व्यक्तियों की पहचान करने लगते हैं। अच्छे और बुरे का पता भी इन्हीं आंखों से करते हैं। कभी-कभी किसी से बात करने के लिये आंखों की मौन भाषा का प्रयोग किया जाता है। नयनों की इसी मौन भाषा से कितने ही वार्तालाप हो जाते हैं। किसी प्रेमी और प्रेमिका के जीवन में इसका कितना प्रयोग है, यह वह ही जानते हैं। आंखों की भाषा से ही मौन प्रेषण, मौन स्वीकृति तथा मौन सहमति भी हो जाती है, यहां पर बातें सिर्फ आंखें ही करती हैं। बाकी सब कुछ मौन रहते हुये एक दर्शक की ही भांति चश्मदीद गवाह बन कर रह जाता है। जिंदगी में आगे बढऩे का सपना भी सबसे पहले हमारी आंखें ही देखती हैं। हमारे आस-पास विभिन्न आकृतियों की आंखों वाले व्यक्ति रहते हैं। किसी की छोटी आंखें, किसी की बड़ी आंखें, किसी की काली आंखें, और किसी की भूरी आंखें। इन्हीं आंखों से ही कोई व्यक्ति मासूम, कोई निर्दयी और कोई धूर्त भी नजर आता हैं। जहां बच्चों की आंखों से उनका भोलापन झलकता है, किसी नवयुवक की आंखों में ऊर्जा व आगे बढऩे का सपना दिखाई पड़ता है। किसी बुजुर्ग की आंखों से उनकी जिंदगी के अनुभव का अहसास होता है। सबकी आंखें कुछ न कुछ कहती हैं। बॉडी लैंग्वेज के जानकार दूसरों की आंखों की बनावट के आधार पर उनके पूरे व्यक्तित्व का वर्णन कर देते हैं। यही आंखें हमारे मुख के आभामंडल को बढ़ाने का भी काम करती हैं। इन्हीं आंखों की बनावट से ही कोई व्यक्ति सुंदर कहा जाता है तो कोई कुरूप हो जाता है। नयनों की अलग-अलग बनावटों को ही अलग नाम दिये गये। जिसमें हिरनों जैसी आंखों वाली, कमल जैसी आंखों वाली, सागर की तरह आंखों वाली, नीली आंखों वाली, नशीली आंखों वाली तथा नशे की प्याली जैसी आंखें नारी के अपरिमित सौंदर्य के आकर्षण की साक्षी बनती हैं।
फिल्मी दुनिया में भी इन्हीं आंखों पर कई गीत लिखे गये। फिल्मी सुंदरियों के सौंदर्य को उनकी आंखों की सुंदरता से आंका गया। कई फिल्मों के टाइटल भी 'आंखें रखा गया। सरहद पर तैनात फौजी भी २४ घंटे सीमा की चौकसी के लिये हर वक्त अपनी आंखें चौकस व चौकन्ना रखते हैं। अदालतें भी किसी भी घटना में चश्मदीद गवाह की गवाही को अति महत्वपूर्ण मानती हैं। हममें से बहुत लोग अपनी मृत्यु के बाद अपनी आंखों को दान कर जाते हैं ताकि जिनके पास आंखें नहीं हैं वे लोग भी अब उनकी आंखों से इस दुनिया को देख सकें। इस धरती की प्राकृतिक सुंदरता को देखने व महसूस करने के लिये हम आंखों से ही काम लेते हैं। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को हम जीवन की आंख मिचौली भी कहते है। हमारी आंखों के ठीक बीच में माथे पर का स्थान त्रिनेत्र का स्थान कहा गया है। भगवान शिव ने जब अपना तीसरा नेत्र खोला तो दुनिया में प्रलय ही आ गई। इसी स्थान पर आज्ञा चक्र भी होता है। कुंडलिनी ध्यान में हम इसी स्थान को जाग्रत करते हैं तथा मस्तक के इसी स्थान पर हम टीका व रोचना आदि लगाते है जो माथे को तो सुशोभित करता ही है तथा इससे ऊर्जा भी मिलती है। आज्ञा चक्र सक्रिय होने तथा ज्ञान चक्षु खुल जाने से ही हमें अपने पूरे जीवन का वास्तविक दर्शन भी समझ में आने लगता है। इस प्रकार हम आत्मा और परमात्मा के बीच सेतु बनाने में भी सफल होते हैं। महाभारत काल में भी जहां धृतराष्ट्र की आंखों में रोशनी नहीं थी, वहीं उनकी पत्नी गंधारी भी सारे जीवन अपनी आंखों में पट्टी बांधे रही। इस तरह उन्होंने भी अपना सारा जीवन अंधत्व में ही जिया। अपने अंधेपन के कारण ही धृतराष्ट्र महाभारत के युद्ध मैदान कुरुक्षेत्र न जा सके और फिर युद्ध का आंखों देखा हाल संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से सुनाया। आज जो कुछ भी हम महाभारत के बारे में जानते है वह सब संजय की अलौकिक दिव्य दृष्टि की ही बदौलत है। आंखें हमारे जीवन में एक बड़ी दौलत की तरह हैं। इन्हीं आंखों से हमें अपने जीवन में कोई प्यारा लगने लगता है तो कोई दुश्मन नजर आता है। कोई अच्छा लगता है तो कोई बुरा। प्रेम, पीड़ा, कष्ट, संयोग-वियोग, श्रंगार, वीररस सभी तरह के उद्गार आंखों से ही कभी अश्रु बन कर तो कभी चमक बनकर सब कुछ बयां कर देते हैं। खुली आंखों से तो हम सब कुछ देखते हैं, हर एक व्यक्ति के बारे में और हर एक स्थान के बारे में जान लेते हैं, वहीं आंखों को बंद कर ध्यान में बैठने से हमें अपने बारे में सब कुछ मालूम हो जाता है।

Friday, August 21, 2009

सच का कबूलनामा आखिर किसके हित में?



ऐसा लगता है कि इस गेम शो की पूरी पृष्ठभूमि केवल सेक्सुअल रिश्तों पर ही आधारित है। हो सकता है कि कभी जाने-अनजाने अगर किसी से गलती हुई हो, उसके परिवार वालों को इसकी जानकारी भी हो और उसे माफ भी कर दिया हो या स्वयं उसने पाश्चाताप कर लिया हो, फिर यह सच गुजरी जिंदगी का सच नहीं बल्कि गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा हुआ।

कहा गया है कि सत्य महान है, हमें सच बोलना चाहिए क्योंकि सत्य की ही जीत होती है, परन्तु आजकल टेलीविजन के एक चैनल पर अलग तरह का एक बिंदास गेम शो 'सच का सामना प्रसारित किया जा रहा है। यह गेम शो अमेरिका में प्रसारित 'मोमेन्ट ऑफ ट्रुथ पर आधारित है। इस गेम शो का एक सच यह भी है कि इसका कंटेन्ट काफी विवादास्पद है, जिससे कार्यक्रम के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दो याचिकाएं भी दाखिल की गईं,परंतु कोर्ट ने इसकी सामाजिक, नैतिक जिम्मेदारी व पहरेदारी करने से इंकार कर दिया।
इस गेम शो की खास बात यह है कि इसमें प्रतिभागियों को एक करोड़ रुपये जीतने के लालच में अपने जीवन से जुड़े २१ प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं। इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता राजीव खंडेलवाल के अनुसार प्रतिभागियों को एक पॉलिग्राफिक टेस्ट से गुजरना पड़ता है, जिसमें प्रतिभागियों द्वारा दिए गए उत्तर के सच और झूठ का फैसला पॉलिग्राफिक टेस्ट में प्रतिभागियों के रिकॉर्ड किये गये ब्लड प्रेशर, हार्ट बीट, पल्स रेट तथा शरीर में होने वाली उथल-पुथल के आधार पर किया जाता है। इस दौरान प्रतिभागियों से ५० प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें से २१ प्रश्नों का सामना मुख्य गेम शो में करना होता है। अब देखने वाली बात यह है कि प्रतियोगिता के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न काफी हद तक प्रतिभागी के बेहद निजी जीवन से जुड़े होते हैं। जिसमें प्रतिभागी को सच का सामना करने की क्षमता, साहस व निर्भीकता का परिचय देना होता है। इस दौरान ज्यादातर सवाल सेक्सुअल रिलेशनशिप व शारीरिक संबंधों पर आधारित होते हैं। प्रतिभागियों को बन्द कमरे के सच का खुलासा इस गेम शो के माध्यम से अपने परिवार, सगे- सम्बंधियों के सामने करना होता है। जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता है, प्रश्नों का स्तर भी सिमटकर काफी संवेदनशील होता जाता है।
ऐसा लगता है कि इस गेम शो की पूरी पृष्ठभूमि केवल सेक्सुअल रिश्तों पर ही आधारित है, जिंदगी का सच केवल एक ही पहलू पर समेट दिया गया है लेकिन सच यह भी है कि जिंदगी का केवल एक ही पहलू नहीं है। हो सकता है कि कभी जाने-अनजाने अगर किसी से गलती हुई हो, उसके परिवार वालों को इसकी जानकारी भी हो और उसे माफ भी कर दिया हो या स्वयं उसने पाश्चाताप कर लिया हो, फिर यह सच गुजरी जिंदगी का सच नहीं बल्कि गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा हुआ। कुल मिलाकर यह पूरा गेम शो जिंदगी के ऐसे सच का खुलासा करवाने तथा अपनी इज्जत की खुली नुमाइश का आमंत्रण है जो अत्यंत व्यक्तिगत होते हुये सार्वजनिक कर दिये जाते हंै, क्योंकि प्रतिभागी के साथ उसी के सगे-संबंधी, मित्र या रिश्तेदार ही होते हैं तथा टीवी पर व्यक्तिगत जिंदगी का पर्दाफाश करना पूरे परिवार की एकता व सामंजस्य के लिये बेहद खतरनाक है। शायद इसीलिए इस गेम शो को अन्य देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है। कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों के परिवार के सदस्यों के बीच अक्सर ऐेसे सच के सामने की बात पर नोक-झोंक हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। गंभीर सच खुलने से परिवार में कोई बड़ी घटना हो जाय तो भी कोई आश्चर्य नहीं। पिछले हफ्ते नोएडा में रहने वाले एक सिक्योरिटी गार्ड की जिंदगी पर इस रियलिटी गेम शो का इतना असर हुआ कि वह फांसी लगाकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया। हुआ यूं कि उक्त सिक्योरिटी गार्ड अपनी पत्नी के साथ सच का सामना कार्यक्रम टीवी पर देख रहा था। कार्यक्रम के बाद उसने पत्नी से शादी के पहले का सच जानना चाहा, पहले तो उसकी पत्नी ने इंकार कर दिया, परंतु जब पति ने कसम देकर उस पर दबाव बनाया और उसे कुछ भी न कहने का आश्वासन दिया। इस पर उसकी पत्नी ने ऐसा सच कबूला कि गार्ड ने आत्महत्या करना ही मुनासिब समझा।
सच का सामना ऐसा गेम शो है जो अमेरिकी सोच व संस्कृति पर आधारित है जो कहीं से हमारी संस्कृति के साथ मेल नहीं खाता, क्योंकि गेम शो में पूछे जाने वाले प्रश्न वहां के वातावरण व कल्चर के आधार पर बनाये गये हैं जो यहां के परिवेश से मेल नहीं खाते। हम सब यहां पर पारिवारिक परिवेश में रहते हैं, भारत में जिंदगी का ऐसा खुलापन संयुक्त परिवार की धज्जियां उड़ा सकता है। इस प्रतियोगिता में होने वाले सभी प्रतिभागी जिंदगी के सच का सामना करने के लिये अपने परिवार के बड़े-बुजुर्ग तथा बड़े हो चुके बेटे-बेटियों के साथ एक करोड़ रुपये जीतने के लालच मे जाते हैं लेकिन लौटते वक्त इनामी राशि को तो छोड़ दीजिए, उनके परिवार का भी बिखराव हो जाय, इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण निश्चित रूप से ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींचना, ढेरों विज्ञापन बटोरना महज चैनल की टीआरपी बढ़ाने से ज्यादा नहीं है। इस तरह के कार्यक्रम पेश करना दर्शकों के किस तरह से हित में है पता नहीं।

Sunday, August 16, 2009

...तब हर तरफ हिन्द की जय और जय भारत होगा


हम सभी देश के सच्चे सपूत व अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी अपने आप समझते हुये देश के अंदर रहकर ही अन्य कई तरीकों से देश की सेवा कर सकते हैं। हम सब मिलकर एक साथ रहें तथा एक-दूसरे के काम आ सकें, किसी भी असहज स्थिति में भी हममें से कोई भी अपना संयम व धैर्य न खोये बल्कि भारत की एकता व अखंडता को हरदम मजबूत करें तथा देश की तरक्की के लिये अपना बहुमूल्य योगदान दें। सही मायनों में तब हर तरफ हिन्द की जय होगी और जय भारत होगा।

देश की आजादी के लिए कितने ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुये देश की बलिवेदी पर कुर्बान हो गये। उनके दिमाग में केवल देश की आजादी का ही जुऩून था और देश के लिये कुछ कर गुरजने का जज्बा। स्वतंत्रता दिवस के दिन जब पूरे भारत वर्ष में तिरंगा लहरता है, तब पूरा देश उन देशभक्त सेनानियों व सैनिकों के जज्बे को सलाम करता है। मुकाबला चाहे मुगलों से रहा हो या अंग्रेजों से हुआ हो, चाहे सियाचिन का युद्ध हो या फिर कारगिल की कहानी। जब कभी भी देशभक्ति गीतों या फिल्मों में हम अपने सैनिकों को देश के दुश्मनों से लड़ते हुये देखते हैं तो हर हिन्दुस्तानी का खून खौलने सा लगता है, नसें तन जाती हैं, मुठ्ठियां भिंच जाती हैं। तब शहीदों के बलिदान को याद कर दिल यही कहता है कि काश! हमें भी सरहद पर कुछ करने का मौका मिला होता तो हम भी किसी से पीछे नहीं रहते।
देश की रक्षा के लिये तैनात सैनिकों की तरह अपनी माटी पर मर मिटने वालों की कोई कमी नहीं है। फौजियों व सैनिकों का दायित्व है कि देश के हर नागरिक की रक्षा व सुरक्षा मुहैया कराना। ऐसे में हर भारतीय नागरिक का कत्र्तव्य बन जाता है कि हम सब देश के अन्दर की जिम्मेदारी संभालें। अगर हम सैनिक नहीं बन पाये, सरहद पर नहीं पहुंच पाये तो भी जरूरी यह नहीं कि देश की सेवा सरहद पर केवल सैनिक बनकर ही की जा सकती है। अगर हमारे अन्दर देश सेवा की ललक है तो हम अपना काम करते हुये भी देश के सच्चे सेवक बन सकते है। हमारे देश का किसान खेती कर अन्न उगाकर अपनी एक अलग तरह से जिम्मेदारी का निर्वहन करता है। हम उसी का पैदा किया हुआ अन्न खाकर ही पलते व बढ़ते हैं। देश की रक्षा के लिए सरहद पर तैनात फौजियों के लिए भी अनाज किसान की बदौलत ही पहुंचता है। इस तरह किसान भी फसल उगाकर देश की सेवा करता है। अगर एक किसान के कन्धे पर बन्दूक न सही पर वह अपने कन्धे पर हल रखकर अपने देश सेवा के जज्बे को पूरा करता है। देश की प्रगति के दो मजबूत आधार है एक हैं-हमारे देश के जवान यानी कि सैनिक और दूसरा है किसान। इसीलिए हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा भी दिया। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी ने भी इसी नारे के आगे जय विज्ञान भी जोड़ दिया। क्योंकि विज्ञान की प्रगति के बिना आज किसी भी देश की उन्नति की कल्पना नहीं की जा सकती। इन्हीं वैज्ञानिकों व इंजीनियरों की सोच से ही आज हमारे पास एक से एक नये आधुनिक तकनीक के हथियार व मशीनें हैं। इनके ही द्वारा ईजाद किये हुए नये-नये स्वचलित हथियार सैनिकों के पास हैं, जिनसे वे देश की सरहद पर दुश्मनों से मोर्चा लेने तथा उन पर फतह कर सकने में सफल होते हैं। अगर ये इंजीनियर या वैज्ञानिक सैनिक नहीं बने तो क्या हुआ! ये सब अपने तरीके से देश की सेवा में हमेशा प्रयत्नशील हैं।
देश सेवा में हमारे देश का प्रेस व मीडिया तथा इससे जुड़े पत्रकार बन्धु भी अपनी संवेदनशील जिम्मेदारी के निर्वहन में कभी पीछे नहीं रहते। इन सबकी २४ घंटे की अबाधित सेवा से ही हमें दूर-दराज तथा देश-विदेश की ताजा खबरें टीवी, रेडियो व समाचार पत्रों के माध्यम से हमें मिलती हैं। लोक हित व देश हित के लिए किसी भी संदेश व घटना के बारे में लोगों को अवगत कराना इनके दायित्व में आता है। ये सब देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होते हुये अपना काम बखूबी करते जाते हैं। इनको भी सैनिक न बन पाने का दिल में कोई मलाल नहीं, क्योंकि सीमा पर फौजी का हथियार बंदूक है तो देश के अंदर इनका हथियार इनकी कलम, इनका अखबार या इनकी आवाज है। ये देश सेवा के अपने जज्बे को पूरा करते हैं। हमारे देश का लेखक भी सीमा पर डटकर मुकाबला करने वाले सैनिकों से पीछे नहीं रहना चाहता। इसीलिए वह अपनी कलम से देशभक्ति गीत, वीर रस की कविताएं, प्रेरणादायक लेख व रचनाएं लिखता है। जिनको पढ़कर हम अपना सर्वस्व बलिदान करने में पीछे नहीं देखते। इस तरह एक लेखक, पत्रकार, कवि व रचनाकार भी अपनी कलम से देश सेवा में लगा रहता है।
किसी भी संदेश या घटना को हमारे देश में फिल्मों या फिल्मी गीतों के माध्यम से भी अभिव्यक्त किया जाता है। कितने फिल्म निर्माताओं ने देश की एकता व अखंडता के लिये देशभक्ति फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से कुछ को तो देश के अच्छे व सच्चे सपूत का लेबल भी मिला। इसका उदाहरण है कि फिल्म अभिनेता मनोज कुमार को आज भारत कुमार के नाम से जाना जाता है। इस तरह से देश प्रेम के अपने जज्बे को अभिनय से भी दिखाया जा सकता है। हमारे देश के अन्दर काम करनें वाले कई समाजसेवी संगठन ऐसे हैं, जो लोग देश सेवा की सच्ची भावना से ही गरीबों, बेसहारा बच्चों के पोषण, शिक्षा, चिकित्सा व सामूहिक विवाह जैसे कामों में अपना उल्लेखनीय योगदान करके अपने राष्ट्रसेवा के जज्बे को पूरा करते हैं।
हमारे देश के खिलाड़ी भी पूरे विश्व पटल पर अपने खेल से भारतीय परचम को फहराने में पीछे नही हैं। हम सब भारत के नागरिक हैं, हम सबके अन्दर अगर देश सेवा की ललक है तो यह जरूरी नहीं कि इसके लिए केवल सैनिक ही बना जाय, फौजी वाली वर्दी ही पहनी जाय, सरहद पर ही जाया जाय और दुश्मन से ही दो-दो हाथ किये जाए।
हम सभी देश के सच्चे सपूत व अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी अपने आप समझते हुये देश के अंदर रहकर ही अन्य कई तरीकों से देश की सेवा कर सकते हैं। हम सब मिलकर एक साथ रहें तथा एक-दूसरे के काम आ सकें, किसी भी असहज स्थिति में भी हममें से कोई भी अपना संयम व धैर्य न खोये बल्कि भारत की एकता व अखंडता को हरदम मजबूत करें तथा देश की तरक्की के लिये अपना बहुमूल्य योगदान दें। सही मायनों में तब हर तरफ हिन्द की जय होगी और जय भारत होगा।