Friday, November 27, 2009

शान-शौकत ही नहीं संस्कारों को भी दें तवज्जो



वर वधू का भविष्य किसी योग्य पुरोहित द्वारा सही उच्चारित वेद मंत्रों, शुद्ध श्लोकों व विधिवत पाठ-पूजन से शादी कराये जाने पर ही आधारित होता है। समारोह को आलीशान व बनाने के लिए लोग कोई कोर-कसर नहीं छोडऩा चाहते और इसी बात ने समाज में दिखावे की प्रतियोगिता को भी जन्म दे दिया है।

सहालगें आ चुकी हैं। आजकल शादी-ब्याह का मौसम जोरों पर चल रहा है। भरे-भरे बाजार, घरों में चलती जोर-शोर से तैयारियां, गली-सड़कों में बैण्ड-बाजे की धूम, सजी बारातें व होटल-गेस्ट हाउस में आलीशान व्यवस्था का माहौल है। कुल मिलाकर हर तरफ मौज और मस्ती का माहौल छाया हुआ है। शादी-ब्याह तो हमारे यहां की सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत लड़का-लड़की को एक सूत्र में पिरोया जाता है। इस शुभ अवसर पर हम सब एक बड़ा समारोह भी आयोजित करते हैं, जो अब एक परम्परा की तरह है। जिसमें अनाप-शनाप पैसा भी खर्च किया जाता है। उद्देश्य यह होता है कि हमारे स्टेटस में किसी भी प्रकार की कमी न रह जाय। लेकिन इसके साथ देखने वाली मुख्य बात यह है कि विवाह जैसे संस्कार जिसमें दो अंजान व्यक्ति अपनी जिंदगी की बागडोर एक दूसरे को सौंपते हैं। यहां पर इस बात पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी हो जाता है क्योंकि इन दोनों का भविष्य एवं मांगलिक वैवाहिक जीवन किसी योग्य पुरोहित द्वारा सही उच्चारित वेद मंत्रों, शुद्ध श्लोकों व विधिवत पाठ-पूजन से शादी कराये जाने पर ही आधारित होता है तथा ये दोनों अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत यहीं से करते हैं।
शुभ विवाह की रस्में किसी लड़का-लड़की के वैवाहिक जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण हैं। विवाह की इस पावन घड़ी में हम पूरे आयोजन को एक भव्य रूप देना चाहते हैं। बड़े-बड़े पंडाल, महंगे-आलीशान होटल, गेस्ट हाउस में चकाचौंध रंगबिरंगी रोशनियों के बीच शादी-पार्टी का आयोजन किया जाता है। खाने-पीने के एक से एक लजीज व्यंजनों के अनेक स्टाल सजाए जाते हैं। लोगों के खाने-पीने व मौज-मस्ती का पूरा ख्याल रखा जाता है। सजे-धजे आने वाले सभी मेहमान भी खूब मौज-मस्ती करते हैं। बच्चों के साथ बड़ों के लिए भी मनोरंजन के साधन जुटाए जाते हैं। जिसमें आजकल आर्केस्टा, डांस ग्रुप व डीजे मुख्य रूप से होते हैं। पहले होता था कि जयमाल के समय घर की महिलाएं मंगलगीत गाया करती थीं, अब प्राय: देखा यह जाता है कि इस समय दोनों पक्षों द्वारा जयमाल स्टेज पर ऊल-जलूल हरकतें, अशोभनीय कृत्य या वार्तालाप पूरे गरिमामयी माहौल को बिगाड़ देते हैं। आज की मॉर्डन शादियों में अब मधुर गीतों की जगह शोर-शराबे वाले डीजे के हुड़दंग ने ले ली है। आधुनिकता के इस दौर में शादी ब्याह के दौरान पुराने रीति-रिवाज अब बहुत ही कम दिखाई पड़ते हैं। इनकी जगह बहुत कुछ बदलाव देखा जाता है। इस नई सदी में विवाह के समय पर आध्यात्मिक माहौल की जगह ज्यादातर आधुनिकता का ग्लैमर ही पसंद किया जाता है। पाणिग्रहण संस्कार एवं फेरों के समय का माहौल पूरी तरह से आध्यात्मिक व आत्मीय बेला होती है। जिसमें वर व वधू दोनों पक्षों की ओर से इस विवाह को मांगलिक रूप देने के लिए शुभ गीतों व भजनों आदि के गाने की रस्म हुआ करती थी, परंतु इस दौर के लोगों में इस बात की दिलचस्पी खत्म मालूम पड़ती है। यहां तक पंडित- पुरोहित के मंत्रों, श्लोकों व विवाह के नियम कानून की जरूरी शिक्षा को एक उबाऊ कार्यक्रम की तरह देखा जाता है, तथा यह महत्वपूर्ण समय बेकार व निरर्थक हंसी ठिठोली में निकाल दिया जाता है। इस कार्यक्रम की महत्ता को अच्छी तरह न समझने और लोगों की ज्यादा रुचि न होने के कारण ही कभी-कभी पंडित-पुरोहित पर इस कार्यक्रम को जल्दी निपटाने के लिए भी दबाव बनाया जाता है।
हिंदू संस्कृति व रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह दो व्यक्तियों का मिलन होता है। जिसको हम वैवाहिक गठबंधन भी कहते हैं। इस गठबंधन में लड़का-लड़की को वेद मंत्रों व श्लोकों के माध्यम से वैवाहिक जीवन के नियम कानून बताए और सिखाए जाते हैं। इस संस्कार में योग्य पुरोहित द्वारा वर एवं वधू को परस्पर हर स्थिति में साथ निभाने व सुख-दुख के साथी जैसे सात वचन एक दूसरे को दिलाते हैं। अपनी जीवन की नई यात्रा का शुुभारंभ करने वाले नए युगल को विवाह की मर्यादा भली-भांति समझाई जाती हैं। जिस तरह हम अपने घर-व्यापार के लिए अन्य पूजन-पाठ या जाप किसी योग्य व प्रशिक्षित पुरोहित द्वारा ही कराते हैं ताकि हमारा अनुष्ठान सफल व सार्थक हो सके। उसी प्रकार इस विवाह की मांगलिक बेला पर भी पूरे विधि-विधान के साथ किसी शुभ मुहूर्त में वैवाहिक संस्कार का क्रियान्वयन ही नव दंपत्ति के जीवन को हर तरीके से सुखमय, सफल व सार्थक कर देता है। आज समाज में विवाह के अवसर पर आयोजित समारोह को आलीशान व यादगार बनाने के लिए लोग कोई कोर-कसर नहीं छोडऩा चाहते और इसी बात ने समाज में दिखावे की प्रतियोगिता को भी जन्म दे दिया है। शादी के इंतजाम में लाखों रुपया खर्च कर दिया जाता है ताकि आने वाले किसी भी मेहमान की किसी भी तरह का कष्टï न हो बल्कि सभी पूरी तरह से एन्ज्वाय कर सकें। आज शादी समारोह लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा और शान-शौकत का भी प्र्रतीक बन गए हैं। ऐसे में वैवाहिक संस्कारों, रस्मों व रीति- रिवाज की उपेक्षा व नजरंदाजी क्या नव युगल के वैवाहिक जीवन के लिए मंगलकारी व हितकारी होगी ? आज यह हम सबके लिए चिंतन का विषय है कि शादी के अवसर पर वैवाहिक संस्कार व रीति-रिवाज मात्र रस्म अदायगी या औपचारिकता बन कर न रह जाएं।

Wednesday, November 25, 2009

मन पसंद हो ध्यान का साधन



ध्यान की अवस्था को पाने के लिए हम तरह-तरह की वीधियों में से ही कोई एक विधि चुन लेते हैं। कोई मौन होकर ध्यान को पाता है, तो कोई भक्ति रस में डूबकर, गीत गा कर, संगीत या अन्य किसी भी विधि से वह अपनी अन्तरात्मा को जागृत करने की विधि आजमाता है।

अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए हम अपनी पसंद का साधन व मार्ग ही चुनते हैं, जिससे रास्ता किसी भी तरह कष्टïदायी न हो बल्कि, आराम व आनंद से मंजिल तक पहुंचा जा सके और पूरे रास्ते यात्रा का भरपूर लुत्फ उठाया जाए। ध्यान को उपलब्ध होने के लिए भी अपने मन को अच्छा लगने वाले विषय को ही मुख्य माध्यम बनाया जाय। जिससे ध्यान के निर्मित होने में किसी प्रकार की रुकावट न हो, बल्कि इसमें एक अलग तरह का निमंत्रण व आकर्षण हो जिसे करने के लिए हमारा मन हमेशा लालायित हो और इस तरह से पूरी क्रिया आनंद से सराबोर हो जाए। हमारी उस काम में दिलचस्पी ज्यादा होती है जो हमें अधिक आनंददायक व रुचिकर लगता है। यह बात ध्यान को साधने में भी बहुत मायने रखती है। ध्यान की अवस्था को पाने के लिए हम तरह-तरह की विधियों में से ही कोई एक विधि चुन लेते हैं। कोई मौन होकर ध्यान को पाता है, तो कोई भक्ति रस में डूबकर, गीत गा कर, संगीत या अन्य किसी भी विधि से वह अपनी अन्तरात्मा को जागृत करने की विधि आजमाता है।
यहां पर मुख्य बात हमारी रुचि की है। वस्तुत: हम उस चीज को ज्यादा पसंद करते हैं। पहले से ही हमें जिस काम को करने में ज्यादा आनंद मिलता है और हमें जो हमेशा आकर्षित करता है। नि:संदेह हमें उसे अपनाने में ज्यादा समस्या नहीं होगी। पतंजलि कहते हैं कि जो तुम्हें ज्यादा आकर्षित करता हो उसे ध्यान का विषय बनाओ। सही भी है क्योंकि उस मार्ग से ध्यान को पाने की संभावना जल्दी बन जाती है। उदाहरण के तौर पर किसी बच्चे का भविष्य संवारने के लिए भी उसे उसकी पसंद का विषय पढऩे पर ही ज्यादा जोर दिया जाता है और इस तरह से उसके सफल होने की संभावना ज्यादा प्रबल हो जाती है। मन को जबरदस्ती किसी एक विषय पर टिकाया नहीं जा सकता है। मन को एकाग्रचित्त किया जा सकता है। ध्यान अपने आप अकस्मात ही अवघटित हो जाता है। एकाग्रचित्त व ध्यान की अवस्था को उपलब्ध होने के लिए किसी भी तरह का संघर्ष या विरोध नहीं किया जा सकता। मन की एक स्वाभाविक दौड़ है। वह एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक बिना सेकेंड गंवाए जाता है। मन को अपने प्रयत्न से रोक कर नहीं रखा जा सकता है। परंतु अपने पसंदीदा मार्ग पर उसके साथ चलते हुए, सब कुछ ध्यान उन्मुक्त होते हुए अनुभव किया जा सकता है और सब कुछ बदल जाता है। सब दौड़ खत्म हो जाती है। हमारा प्रवेश एक नई दिशा में होने लगता है। यह बिल्कुल वैसे ही होगा जैसे कोई व्यक्ति लेटे हुए सोने की कोशिश में लगा हुआ हो और अपनी ओर से सोने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसका हर प्रयास बेकार हो जाएगा, क्योंकि वह जितनी कोशिश करेगा, नींद उससे उतनी ही दूर होती जाएगी। वह अपनी आंख जोर से बंद करेगा, नींद लाने का हर प्रयास करेगा, फिर भी सफल नहीं हो सकेगा। यह तभी हो सकता है जब हम अपने आप बिना किसी प्रयास के केवल लेट जाते हैं, फिर जो भी विचार आते-जाते हैं वह सब नींद लाने की ही प्रक्रिया है। एक समय सब सोचना बंद हो जाएगा और अकस्मात ही हम नींद में चले जाते हंै। वह भी बिना किसी प्रयत्न के।
इसी तरह हमारे कुछ करने से भी ध्यान उत्पन्न नहीं होगा। ध्यान के समय हमें किसी भी तरह के द्वंद्व या झंझट में भी नहीं पडऩा है, बल्कि इन सबसे पार होकर निकल जाना है। ध्यान करते समय विचारों की एक बड़ी भीड़ दिखाई देती है। इन पर जबरदस्ती दबाव बनाने का प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए। ध्यान में विचार तो पानी की लहरों के तेज झोंके की तरह आते हैं। इस समय अपने किसी भी प्रयास से विचारों के प्रवाह या लहरों से संघर्ष और प्रतिरोध ठीक नहीं होगा। बल्कि अपने मन को बिना किसी दबाव के इस बहाव में बह जाने दें। इन सबसे सीख व अनुभव लेते चलें। एक समय पर हमारे सब विचार बिना किसी प्रयत्न के आने बंद हो जाएंगे। मन शांत होता चला जाता है और धीरे-धीरे ध्यान की गति बढ़ती चली जाती है। हालांकि ऐसी स्थिति में कभी-कभी किसी बाहरी गतिविधि के कारण हमारे ध्यान की बढ़ती हुई दिशा में कोई अवरोध या रुकावट भी आ सकती है, जिससे हमारे मन में अमुक माध्यम से ध्यान टूटने का अंदेशा भी हो जाता है। मान लिया जाय कि हम ध्यान में हैं, बाहर कोई आपस में तेज बातें कर रहा है, कहीं पर गाना बज रहा है, लाउड स्पीकर की आवाज सुनाई पड़ रही है या किसी के फोन अथवा मोबाइल पर बात करने की अचानक आवाज आने लगती है। ऐसे में हम किसी की आवाज को नहीं बंद कर सकते हैं और इन्हें हम अपने ध्यान में अवरोध मान लेते हैं। इस समय एक काम किया जाय फिर हमारे ध्यान में इससे कोई समस्या न होगी । अगर हम अपना ध्यान बिंदु ही तुरंत उसी आवाज पर कर दें। जैसे ही हम उन पर ध्यान देना शुरू करेंगे वैसे ही धीरे-धीरे हम उन आवाजों से दूर होते जाएंगे। फिर हमें कोई आवाज परेशान नहीं करेगी और हम इन आवाजों को चीरते हुए ध्यान की ओर प्रशस्त होते जाएंगे। ध्यान करने का माध्यम कुछ भी हो सकता है। जिस तरह से मंजिल मिल जाने के बाद रास्ते का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी तरह ध्यान का विषय भी है। आकर्षण और विरोध सबकुछ ध्यान की उपलब्धि होने पर अंत में अपने आप छूट जाता है और मिलता है- स्व अनुभव व अनंत आनंद की रसबेला।

Sunday, November 15, 2009

व्यवहारिक भाषा से ही है आपकी पहचान


किसी भी भाषा को बोलने या लिखने में हम जानकार हो सकते हैं, उसमें सिद्धहस्त भी हो सकते हैं। हम किसी भी भाषा में अपनी बात को समझा सकते हैं व समझ भी सकते हैं। परंतु जो हमारे आचरण की भाषा है, हम जिस तरह से अपना व्यवहार करते हैं वही हमारी मूल भाषा होती है। सामान्य तौर पर क्रोध या उत्तेेजना के समय पर भाषा में बड़ा अंतर देखा जाता है।

एक बार अकबर के दरबार में कई भाषाओं में पारंगत एक व्यक्ति आया और चुनौती दी कि कोई भी उसकी असली व मूल भाषा नहीं बता सकता है। उसका दावा था, क्योंकि, उसकी हर एक भाषा में इतनी तेज पकड़ थी कि उसके द्वारा बोले जाने वाली हर भाषा उसकी मूल भाषा लगती थी।
यूं तो अकबर के दरबार में विद्वानों की कोई कमी नहीं थी, फिर भी यह चुनौती आसान नहीं थी। क्योंकि उस व्यक्ति में एक अलग तरह की योग्यता व विश्वास साफ दिखाई दे रहा था। लेकिन, फिर भी दरबार की गरिमा के लिए महाराज अकबर ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। उस व्यक्ति के साथ दरबार के अनगिनत भाषाओं के जानकार व दक्ष विद्वानों ने अलग-अलग भाषाओं में खूब वार्तालाप व साक्षात्कार किया। परंतुु, सभी असफल हुए। उनमें से कोई भी उसकी मूल भाषा को नहीं पकड़ सका। अंत में अकबर ने बीरबल को बुलाकर पूरी बात बताई। बीरबल ने कहा-समस्या तो मुश्किल है लेकिन इसका हल बहुत आसान है। यह कहते हुए बीरबल ने उस व्यक्ति को पीछे से जोर का धक्का दिया। फलस्वरूप वह गिरकर सीढिय़ों से नीचे लुढ़कने लगा। वह व्यक्ति बीरबल को क्रोध में आकर तेज-तेज गालियां देने लगा। बीरबल ने अकबर से कहा- महाराज यही है इसकी असली भाषा। बीरबल ने उस व्यक्ति से क्षमा मांगते हुए कहा कि- श्री मान्! आपकी मूल भाषा का पता लगाने के लिए इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं था। इस तरह से उसकी मूल भाषा पकड़ी गई।
किसी भी भाषा को बोलने या लिखने में हम जानकार हो सकते हैं, उसमें सिद्धहस्त भी हो सकते हैं। हम किसी भी भाषा में अपनी बात को समझा सकते हैं व समझ भी सकते हैं। परंतु जो हमारे आचरण की भाषा है, हम जिस तरह से अपना व्यवहार करते हैं वही हमारी मूल भाषा होती है। सामान्य तौर पर क्रोध या उत्तेेजना के समय पर भाषा में बड़ा अंतर देखा जाता है।
जब दरबार में उस व्यक्ति ने खुली चुनौती दी तो वह पूरी तरह निश्चिंत था, क्योंकि उसे लगभग सभी भाषाओं में महारत हासिल थी। उसे किसी भी भाषा में कोई व्यक्ति पराजित नहीं कर सकता था। यह सब देखकर ही बुद्धिमान बीरबल नें ऐसा तरीका ढूंढ़ा जिससे उसकी सच्ची भाषा का पता चल सके। वस्तुत: यह सच है कि क्रोध में प्रयुक्त भाषा ही मूल भाषा होती है। क्रोध के समय किया गया आचरण व व्यवहार ही वास्तविक एवं सच्चा होता है। लोक व्यवहार के तौर-तरीकों के अनुसार हम कई तरह से अपने आपको प्रदर्शित करते हैं। हम खासकर हमेशा अपना अच्छा व सर्वश्रेष्ठ आचरण ही दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। हमारा यह प्रयास रहता है कि हम अपनी भाषा व व्यवहार कुशलता से दूसरों का मन मोह लें तथा सभी के आर्कषण का केंद्र बनें। साथ ही साथ हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि हमारी वास्तविक भाषा, आचरण एवं लोक व्यवहार में कोई अंतर न दिखाई पड़े।
अक्सर हम देखते हैं कि जीवन की कुछ असामान्य स्थिति में अचानक ही हमारे आचरण व व्यवहारिकता में परिवर्तन दिखाई देन लगता है। एकाएक हमारी भाषा हमारे काबू में नहीं रह पाती है। अगर ऐसी स्थिति में हम गौर करें तो हम पाएंगे कि इस दौरान हमें किसी और चीज का ख्याल नहीं रहता है। क्योंकि सामान्य स्थिति में हम अपना सर्वश्रेष्ठï व्यवहार ही प्रदर्शित करना चाहते हैं।
इस समय हम केवल अपने अंदर की अच्छी बातें ही बताना व दिखाना चाहते हैं। परंतु क्रोध या तनाव की स्थिति में हम सब कुछ भूल जाते हैं। ऐसे में मुंह से जो शब्द निकलते हैं वही हमारी असली व वास्तविक भाषाका परिचायक होती है। मीठी बोली हमारे व्यक्तित्व व लोक व्यवहार में बहुत मायने रखती है। यह हमारी व्यवहार कुशलता का भी मुख्य पैमाना होती है। हमारे बोल-चाल की भाषा में मीठी बोली को मिश्री जैसे बोल की भी संज्ञा दी जाती है। हर एक व्यक्ति दूसरों से सदैव अच्छे व्यवहार की ही अपेक्षा रखता है। समझने वाली बात यह है कि हम अपनी मूल भाषा और आचरण को व्यवहारिक दृष्टि से इतना स्वीकार्य बनाएं कि हमारी वास्तविक व मेलजोल की भाषा में किसी भी प्रकार का विरोधाभास न दिखाई दे। किसी असामान्य स्थिति या उत्तेजना आदि की दशा में हम सदैव अपनी भाषाशैली व व्यवहार के तरीके पर अपना संयम बना कर रखें।
आज के इस कॉपोरेट युग में जहां हर चीज की मार्केटिंग हो रही है, वहीं अपनी अच्छी बोली व भाषाशैैली से हम किसी को भी प्रसन्न कर सकते हैं। किसी को भी हम अपनी वाक्ïपटुता व भाषा की पकड़ के रुआब में ले सकते हैं। ऐसे में इस बात का ध्यान में रखना बहुत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की किंहीं दो परिस्थितियों में हम हमेशा एक सा ही आचरण अपनाने का प्रयास करें तथा हमारे व्यवहार में किसी प्रकार का दिखावा भी न पाया जा सके। फिर हमारी व्यवहारिक भाषा मूल भाषाकी तरह पहचानी जाए। जिनमें कोई भी किसी भी तरह का अंतर न ढूंढ़ सके।

Friday, November 6, 2009

तोल-मोल फिर बोल, यही है वाणी का उचित रोल


हमारे कुछ भी बोलने से पहले उससे पडऩे वाले प्रभाव व परिणाम का पूर्व आकलन करना बेहद आवश्यक हो जाता है क्योंकि हमारे कुछ भी कह देने से सब कुछ वैसा ही नहीं रहता बल्कि लोगों के हावभाव व व्यवहार हर एक में तुरंत से ही अचानक परिवर्तन देखा जाने लगता है। बोलने के बाद सोचने से हम कुछ नहीं संभाल सकते हैं, तब तक बहुत कुछ बिगड़ चुका होता है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले थोड़ा समय अपने आप में लें।


तोलना मतलब किसी भी चीज का वजन देखना, मोल का अर्थ उसकी कीमत। इसके बाद बोल का तात्पर्य ही है कि किसी भी चीज के बारे में हर तरीके से सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद ही अपनी कोई टिप्पणी या राय देना। क्योंकि हमारी किसी बात का वजन होने से ही उसके ग्राही को उस बात की अच्छी कीमत या वैल्यू दी जाती है, अन्यथा हमारी बात कमजोर व तत्वहीन होने से उसका असर बेकार तथा निरर्थक भी हो सकता है। हमारी कोई भी सलाह इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि इसके आने वाले परिणाम भी हमारी बात पर ही निर्भर करते हैं। कई जगह इस तरह का एक गेम शो भी देखा जाता है जो तोल-मोल के बोल पर ही आधारित होता है। इस शो में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों को पैक किए हुए कई तरह के उत्पाद दिखाए जाते हैं, और लोगों से इन पैक्ड डिब्बों में बंद चीजों की सही कीमत लगाने को बोला जाता है। जिस भी प्रतिभागी की सबसे नजदीकी कीमत उस वस्तु की कीमत से मेल खा जाती है, वह व्यक्ति उस वस्तु का इनाम हो जाती है। यहां पर भी हमारा आइडिया ही काम करता है। परिणाम सामने आने पर ही हमें अपनी लगाई हुई कीमत व वस्तु के असली दाम में अंतर समझ में आता है। इसी तरह से जब हम अपनी रुटीन लाइफ मे किसी वस्तु के बारे में, किसी व्यक्ति के विषय में या किसी भी स्थिति के संदर्भ में अपना वक्तव्य रखते हैं तो वह हमारे पूरे विश्लेषण और आकलन का परिणाम होता है। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह भी होनी चाहिए कि जब कभी भी हम अपना मत या राय किसी के लिए भी रखें तो हमारा पूरा मन किसी व्यक्तिविशेष के प्रति पूर्वाग्रहित भी नहीं होना चाहिए। हर एक बात का निरीक्षण व त्वरित समीक्षा पूर्व के आधार पर नहीं बल्कि नये बिंदू से ही शुरू करनी चाहिए, तब ही हमारी बात निष्पक्ष और निर्विवाद होगी। थिंक बिफोर स्पीक, हमारे किसी भी संवाद में बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे कुछ भी बोलने से पहले उससे पडऩे वाले प्रभाव व परिणाम का पूर्व आकलन करना बेहद आवश्यक हो जाता है क्योंकि हमारे कुछ भी कह देने से सब कुछ वैसा ही नहीं रहता बल्कि लोगों के हावभाव व व्यवहार हर एक में तुरंत से ही अचानक परिवर्तन देखा जाने लगता है। बोलने के बाद में सोचने से हम कुछ नहीं संभाल सकते हैं, तब तक बहुत कुछ बिगड़ चुका होता है। इसलिए जरूरी यह है कि हम किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले थोड़ा समय अपने आप में लें। साथ ही हमारी कही जाने वाली बात का असर व बाद में हाने वाली स्थिति को पहले ही अच्छी तरह से भांप कर किसी के बारे में अपना स्पष्टïीकरण देना उचित है। इस तरह से करने पर हमारा विचार व बात सार्थक हो पाएगी और इसका किसी के अपने जीवन में अमल करने पर लाभकारी हो सकता है। अक्सर हमारे जीवन में यह भी होता है कि अंतर्मन में किसी की एक इमेज कैद होकर रह जाती है, इस तरह से भविष्य के सारे निर्णय हम उसी के आधार पर किया करते हैं, जो कि न्याय संगत व उचित नहीं होता है। हम उसे हमेशा एक ही नजर से देखा करते हैं और उसके बारे में एक राय पहले से ही बना लेते हैं। हमें एक व्यक्ति को हर एक बार पूरी तरह से जज करना पड़ेगा, प्री-जज से काम नहीं चलेगा। यह एक तरह से बायस्ड फीलिंग की तरह से हो जाएगा। हमें इसे पूरी समझदारी से अच्छी तरह समझ कर किसी भी प्रकार की जल्दबाजी से बचते हुए न्यायपूर्ण तरीके से अपना पक्ष रखना है ताकि किसी के भी साथ न तो पक्षपात हो और न ही कोई हताहत ही हो। जीवन में कभी ऐसी भी स्थिति आती है कि हमको बोलने से पहले सोचने का तनिक भी समय नहीं मिल पाता है, परंतु हमारे बोलने के अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम तुरंत देखे जाते है। जिस तरह से किसी परीक्षार्थी का किसी साक्षात्कार के दौरान पूछे गये प्रश्नों के उत्तर का एक-एक शब्द बहुत अर्थ व महत्व रखता है और उसका चयन भी उसके उत्तरों में ही होता है। जल्दबाजी या बिना सोचे समझे बोले गए उत्तरों का जवाब उसको उसी समय साक्षात्कार से बाहर भी कर सकता है। किसी के साथ वार्तालाप में भी अक्सर हम देखते हैं कि हम जो कुछ भी बोलते हैं, बोलने के बाद हम यह महसूस करते हैं कि अपनी वाकशैली को कैसे और प्रभावशाली बनाया जा सके। कभी-कभी हम जीवन की ऐसी उलझन में फंस जाते हैं कि हम अपने इष्टï मित्रों या सगे संबंधियों से राय-मशविरे की आवश्यकता आ पड़ती है या फिर कभी हमें दूसरों के लिए भी यही काम करना पड़ता है। दोनों ही स्थितियों में हर चीज का पूर्वानुमान लगाना व भली-भांति सोचना बहुत आवश्यक हो जाता है। बोलने के बाद की समस्या का समाधान है बोलने के पहले सोचा जाए। शुरुआत में तो कुछ अतिरिक्त समय अवश्य लगेगा, परंतु जैसे-जैसे इस पूरी प्रक्रिया में हमारा मस्तिष्क अभ्यस्त होता जाता है, फिर क्षण भर में ही हमारा दिमाग तेज और सही निष्कर्ष पर भी पहुंच जाता है। इससे हमारे बोलने से न ही किसी को ऐतराज ही होगा और न ही कोई प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए जरूरी यह है कि आवश्यक जांच-पड़ताल या बात की माप-तौल पहले ही कर ली जाये।

Friday, October 30, 2009

अपने अंदर ही है ध्यान प्रशिक्षण केंद्र

जिस प्रकार हम अपने दैनिक जीवन के काम-काज निपटाने के लिए समय निकाल लेते हैं उसी प्रकार लगातार इसको करते रहने से हमारे अंदर इसकी प्रवृति भी बन जायेगी। अच्छी शिक्षा किसी भी व्यक्ति को आभूषण से कहीं अधिक सुशोभित करती है। वहीं ध्यान की शिक्षा को पाकर कोई व्यक्ति अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी व प्रेरणादायक स्रोत का भी जनक हो जाता है।

अच्छी शिक्षा का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इसी से जीवन सुधरता है। शिक्षा से जहां हमारा मस्तिष्क तेज होता है वहीं अच्छे और बुरे का पाठ भी पढऩे को मिलता है। पढ़-लिख कर हम बड़े भी हो जाते हैं और अपने-अपने काम-धंधे व नौकरी-रोजगार में लग जाते हैं। लेकिन हमने एक बात का ध्यान बिल्कुल नहीं दिया कि दिमाग के साथ अंतरआत्मा की शिक्षा पाना भी बहुत आवश्यक है, इसके लिए किसी स्कूल, कॉलेज या विश्व विद्यालय में दाखिला लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अपने ही अंदर छिपा है पूरा ध्यान प्रशिक्षण केंद्र। अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने का मतलब ही यही होता है कि बच्चा पढ़-लिखकर एक अच्छा इंसान बन सके और जिसके अंदर अच्छे और बुरे की समझ भी पैदा हो सके। अच्छी शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य ही यही है। यही सब हमारे साथ हुआ और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अच्छे स्कूलों में कराते हैं। जैसा हमारे साथ हुआ, वैसे ही हमारे बच्चों के साथ भी हो रहा है। बस अंतर जरा आधुनिकता का हो गया। आज शिक्षा कंप्यूटरीकृत हो गई। स्कूल, कॉलेज सब हाईटेक हो गए। बच्चे पढऩा-लिखना अच्छी तरह से सीख कर प्रोफेशनल बन गये। देखने वाली बात है कि दिमाग से तो सभी शार्प माइंड हैं, परंतु आभास यह होता है कि मन और अंतरआत्मा के प्रति भावशून्य हैं। इसकी निश्चित ही यह वजह हो सकती है कि इस विषय की अब तक इनको जानकारी ही नहीं हो पाई है। इसको जानने का उनके पास कोई विषय ही नहीं रहा। इसकी किसी ने पढ़ाई ही नहीं की और न ही हमने इनको सिखाया ही। सबसे बड़ी बात यह भी है कि ध्यान हमारा भी कभी विषय नहीं रहा और न ही हमने कभी इसे अलग से पढऩे व सीखने की कोशिश की। जबकि स्वयं को जानने व अपनी अंतरआत्मा को पहचानने का ही विषय है ध्यान। अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है। जब जागो, तब सबेरा। आज हमारे जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि सबसे पहले हम इस ध्यान के विषय को अपने जीवन में एक बार आजमाने के लिए ही अपनाना शुरू करें। इसके लिए हमें कहीं और जाने की कोई जरूरत नहीं, और न ही किसी स्कूल, कॉलेज में अलग से कोई कोर्स करने की आवश्यकता है। जरूरत है केवल इसे नियमित रूप से अपने जीवन में उतारने व ढालने की। सर्वप्रथम हम यह प्रयास करें। फिर धीरे-धीरे हम अपने बच्चों को भी ध्यान की ओर बढ़ाने व इसे पढ़ाने की दिशा दें। जिस तरह से मां-बाप ही अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व सद्गुण सिखाने का काम करते हैं, उसी तरह ध्यान का नियमित अध्ययन व इसे सीखने का संस्कार भी शुरुआत से ही उनमे डालना प्रारंभ कर दें। ध्यान का नियमित पाठ पढऩे व सीखने से धीरे-धीरे पूरे मन में तथा अन्त:स्थल में एक प्रशिक्षण केन्द्र बनना आरंभ हो जाता है। इस समय हमारी आत्मा एक ध्यानस्थली की तरह बन जाती है, जिससे हर क्षण सुंदर व अच्छे विचार जन्म लेना शुरू कर देत हैं। आत्मीय शांति के साथ ही असीमित ऊर्जा और क्षमता का स्रोत भी यहीं से फूटता है जो हमें पूरे दिन स्फूर्तिवान बनाये रखने में सहायक होता है। इस समय हमारा पूरा शरीर साक्षी मात्र होकर सब कुछ महसूस करता रहता है। जिस प्रकार किसी कॉलेज के एक कमरे में क्लास चलती है और पूरी बिल्डिंग में स्कूली माहौल नजर आता है, उसी तरह हमारा पूरा शरीर ऊर्जावान होकर तरोताजा हो जाता है। ध्यान के नियमित अभ्यास से हमारे ारीर की सभी नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता रहता है और ध्यान से ही यही ऊर्जा बदल कर सकारात्मक में रूपांतरित हो जाती है। जीवन की नई से नई चुनौतियों का भी तुरंत हल ध्यान से ही मिलता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों व नये लक्ष्यों को हासिल करने तथा इनमे सफलता प्राप्त करने का अदम्य साहस भी ध्यान के स्वयं के प्रशिक्षण केंद्र से ही प्राप्त होता है। आज जीवन की आपाधापी में जूझते फिरते किसी के पास ज्यादा अतिरिक्त समय नहीं रहा। फिर भी ध्यान को अपने जीवन में शामिल करने तरीका हमें किसी भी समय निकालना होगा और इसी नियमित अभ्यास की आदत हमें अपने बच्चों में अभी से डालनी होगी, जिससे हमारे अंदर ध्यान को सीखने की नींव जल्द से जन्द पड़ सके। जिस प्रकार हम अपने दैनिक जीवन के काम-काज निपटाने के लिए समय निकाल लेते हैं उसी प्रकार लगातार इसको करते रहने से हमारे अंदर इसकी प्रवृति भी बन जायेगी। अच्छी शिक्षा किसी भी व्यक्ति को आभूषण से कहीं अधिक सुशोभित करती है। वहीं ध्यान की शिक्षा को पाकर कोई व्यक्ति अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी व प्रेरणादायक स्रोत का भी जनक हो जाता है। इसलिए आज समय की यही आवश्कता है कि हम अपने साथ बढ़ते हुए किशोर वर्ग व युवा पीढ़ी को भी ध्यान की धरोहर का स्वामी बना दें ताकि देश के बढऩे वाले हर एक बच्चे की हर मायनों में शिक्षा पूरी हो सके। इस प्रकार हर कोई बच्चा सुसंस्कारवान, सुशिक्षित व सच्चे अर्थों में सम्माननीय हो सकेगा।

Thursday, October 22, 2009

हीन भावना न रखें,तभी बदलेगी जिंदगी



हमारा पूरा व्यक्तित्व हमारी सोच से दिखाई पड़ता है। सोच और भावना में ज्यादा अंतर नहीं है क्योंकि किसी भी तरह की भावना का आधार हमारी सोच ही है। यहां जरूरी यह है कि हम अपने ऊपर कितना विश्वास रखते हैं अगर हमारे मन में विश्वास है और खुद पर पूरा भरोसा भी है तो निश्चित ही हमें किसी से भी डर नहीं लगेगा और विषम स्थिति का डट कर मुकाबला करेंगे।

जैसी सोच होगी, वैसी ही हमारी भावना भी होगी। हम जिस तरह से सोचते जाते हैं ठीक उसी तरह से हमारी भावना भी होती जाती है। अक्सर हम दूसरों के बारे में अपने ख्याल रखते हैं, उनका अनुमान लगाते हैं। ऐसे ही अपने बारे में भी sochatee हैं और इसी तरह अपने लिए भी एक भावना का निर्माण करते जाते हैं। इनमें से ही एक है- उच्च भावना तथा दूसरी हो जाती है- हीन भावना। इसी जगह अगर हम स्वयं में विश्वास भी जागृत करने में सफल हुए तो निश्चित ही अच्छी भावना के साथ आत्म विश्वास का भी विकास शुरू हो जाता है। हमारी सोच के ही दो पहलू हैं- उच्च व हीन भावना। अगर हम अपने जीवन में सकारात्मक हैं तथा आत्मविश्वास से भरे हुए हैं तो निश्चित ही हमारी भावना भी अपने बारे में उच्च की ही होगी। यदि हमारी सोच या भावना कमजोर हुई या फिर आत्मविश्वास की कमी हो,तो हम हीन भावना शिकार हो जाते हैं। आज जीवन के हर क्षेत्र में प्रतियोगिता चलती है और सभी प्रतिभागियों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है। ऐसे में एक दूसरे की तुलना लाजिमी हो जाती है। मुकाबला तब और गंभीर हो जाता है जब एक व्यक्ति खुद अपनी बराबरी सामने वाले से करने लगता है। उदाहरण के तौर पर एक जगह दौड़ प्रतियोगिता शुरू होने वाली है। सभी प्रतिभागी स्टार्ट लाइन पर खड़े हुए हैं और सब अच्छे धावक भी हैं। सभी को विश्वास भी है कि वे प्रतियोगिता जीतेंगे। इसी बीच, एक अन्य प्रतियोगी आता है। वह आते ही अपनी लाइन पर खड़ा होकर तमाम तरीकों से एक्सरसाइज तथा अपनी बॉडी- लैंग्वेज व एक्साइटमेंट से अपना अति आत्मविश्वास दिखाने लगता है। यह सब देखकर अन्य प्रतिभागियों का आत्मविश्वास डगमगा जाता है तथा परिणामस्वरूप अन्य सभी प्रतियोगी उसके विश्वास के आगे स्वयं में हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। यहां पर स्थिति यह होती है कि अपने आपको अन्य दूसरे के मुकाबले में छोटा व हीन समझने लगते हैं। ऐसे में खास बात यह होती है कि जहां आत्मविश्वास कमजोर पडऩे लगता है वहीं स्वयं का मन भी आत्मकुंठित होने लग जाता है, तत्पश्चात हीन भावना का असर हमारे पूरे व्यक्तित्व में दिखना शुरू हो जाता है। हमारा पूरा व्यक्तित्व हमारी सोच से दिखाई पड़ता है। सोच और भावना मे ज्यादा अंतर नहीं है क्योंकि किसी भी तरह की भावना का आधार हमारी सोच ही है। अगर हमारे मन में विश्वास है और खुद पर पूरा भरोसा भी है तो निश्चित ही हमें किसी से भी डर नहीं लगेगा तथा हम किसी भी विषम परिस्थिति से भी डट कर मुकाबला करने व उससे जीत जाने का हौसला हमेशा बनाये रखते हैं। फिर हमारी बराबरी चाहे किसी भी व्यक्ति से हो या चुनौती किसी भी स्थिति से, सबसे आगे निकल जाने व सफल होनें की पूरी गारंटी बन जाती है। सामने कोई भी हो अब किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि अपने आप में हमारी सोच मजबूत हो जाती है और आगे बढऩे का सामथ्र्य व साहस भी बन जाता है। यह सच है कि जब किसी व्यक्ति के मन में उच्च भावना व स्वयं में विश्वास जन्मने लग जाता है तब अंदर ही अंदर वह मजबूत इरादों वाला व्यक्ति दिखाई पडऩे लगता है। क्योंकि एक स्थिति तब आती है जब उसके करीबी मित्र, रिश्तेदार, सहकर्मी व जीवन की सभी स्थितियां उस पर भरोसा करने लगती हैं। धीरे-धीरे सभी लोग मेहरबान होना शुरू हो जाते हैं। और यहां तक कि इस व्यक्ति पर ईश्वर की असीम अनुकंपा भी होने लगती है, क्योंकि ईश्वर भी केवल उसी व्यक्ति पर भरोसा करता है जिस व्यक्ति का स्वयं पर भरोसा हो। किसी व्यक्ति की प्रगति व उन्नति का मार्ग भी उसकी सोच ही प्रशस्त करती है। आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में निरंतर सफलता प्राप्त करते हुए आगे बढ़ता रहता है। किसी भी कार्य में सफल होने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम अपने आपको मजबूत स्थिति में रखें। हम अपनी सोच व भावना को ऊपर उठायें व उसको इतनी ऊंचाई दें कि उससे अच्छे व सुंदर विचार जन्म लेना शुरू हो जाए। ऐसा होने पर हमारी सोच व भावना का हीन भावना से हर तरह का संपर्क टूट जायेगा। फिर ऐसी कोई भी स्थिति न होगी, जिससे हम हीन भावना का शिकार व इससे ग्रस्त हो सकें। एक बात और है कि किसी भी व्यक्ति की अन्य व्यक्ति से तुलना उसके बाहरी आकर्षण, महंगे कपड़े व बंगला-गाड़ी आदि से करने का कोई अर्थ नहीं है। यह तुलना तब सार्थक हो सकती है जब हम अपने विचारों, सोच व भावना के आधार पर करें। यह महत्वपूर्ण बात है कि हम अपने आपको कहीं से भी न तो हीन समझें और न ही हीन भावना रखें। यह बात हमें प्रारंभ से ही अपने अंतर्मन में ढालनी शुरू करनी है। हमें अपने मन को इतना मजबूत बिंदु बनाना है कि हर स्थिति में बड़ी सोच का जन्म हो। जिससे ही अच्छी व सुदृढ़ भावना का अवतरण तथा विकास संभव होगा। अच्छी सोच होने पर ही कुंठा भी नहीं होगी और न ही मन आत्मकुंठा का शिकार हो पायेगा। हमारी जिंदगी में सर्वप्रधान भावना ही है। इसके प्रबल होने से हम अपने जीवन के हर क्षेत्र में आसानी से सफल हो सकते हैं।

Wednesday, October 21, 2009

एक साथ मिलकर दिल से मनाएं दिवाली



आज के इस प्रयोगधर्मी दौर में पारिवारिक एकता को बनाये रखना हम सबके लिए बड़ी मांग है। हम सबकी जिम्मेदारी भी है कि आपसी सामंजस्य को हर हाल में बनाये रखें तथा हर दिल में प्रेम का दिया जलाने का प्रयास करें। तब निश्चित ही सभी लोग एक साथ मिलकर प्रेम भरे दिल से दिवाली मनाएंगे।

१४ साल वनवास काटने तथा रावण को मार विजय श्री प्राप्त करने के बाद भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन पर नगरवासियों ने अपने राजा रामचन्द्र जी का पूरे दिल से स्वागत किया। श्री राम की अयोध्या वापसी पर पूरा नगर दीपमालाओं व चमचमाते प्रकाश से जगमगा उठा था। हर ओर खुशहाली व चहल-पहल थी। हर एक के दिल में अपार खुशियां थीं। लोगों ने इस दिन को एक त्योहार के रूप में मनाया। आज पूरे भारत वर्ष में यह दिन दीपावली के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस प्रकार यह दिन अपार खुशियां, समृद्धि व पारिवारिक एकता का प्रतीक भी है।
रामायण व रामचरित मानस के अनुसार इस दिन के ठीक १४ साल पूर्व अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कैकेर्ई के मांगे एक वरदान के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को राज महल छोड़कर वनवास जाना पड़ा था। जिस दिन श्री राम ने अयोध्या छोड़ी, उस दिन पूरी अयोध्या में मातम छाया हुआ था। हर तरफ शोकाकुल माहौल, रोते-बिलखते लोग, आंखों मेंं आंसुओं का सैलाब तथा असहनीय पीड़ा लिए हुए लोगों ने श्री राम को न चाहते हुए भी अयोध्या से विदा किया। यह बहुत ही मर्मस्पर्शी घटना थी। पूरे अयोध्यावासी उस समय असहनीय पीड़ा से गुजरे थे। वहां के लोग श्री राम के बिछुडऩे से इतने दुखी व स्तब्ध थे कि बीमार पडऩे लगे। इसी तरह के असहनीय शोक के कारण राजा दशरथ का कुछ ही दिनों में ही निधन हो गया। अपना वनवास पूरा करने के बाद श्री राम जब १४ साल बाद अयोध्या लौटे तब पूरी अयोध्या में खुशियों की लहर दौड़ पड़ी। लोगों में अति उत्साह था। एक तरफ जहां श्री राम ने चौदह साल इधर-उधर जंगलों में काटे, वहीं पूरे चौदह साल अयोध्यावासियों के दिल में भी गम के बादल छाये रहे। अब मौका था- खुशियां मनाने का, आनंद व मस्ती का। सभी लोगों ने अपने-अपने घरों को खूब सजाया संवारा, सफाई, रंगाई-पुताई व नये-नये कपड़े पहन घरों में दीपमाला जलाकर पूरी अयोध्या को श्रीराम के स्वागत में जगमग कर दिया।
इसीलिए दीपावली का यह पर्व हम सब अपने पूरे परिवार के साथ मनाते हैं। यह त्योहार पारिवारिक एकता का भी सूचक है। एक परिवार के कई लोग अलग-अलग जगह व शहरों में रहते हैं, और इस दिन दूर-दराज स्थानों में रहने वाले सभी लोग एक जगह पूरे कुटुंब के साथ मिलकर बड़े हर्षोल्लास के साथ इस त्योहार का आनंद उठाते हैं। दीपावली का त्योहार पूरे परिवार के एक साथ मिल जुल कर खुशियां मनाने का है। हिंदू संस्कृति में इससे बड़ा दूसरा पर्व और कोई नहीं हैं जो एक साथ इतने उत्साह से मनाया जाता है। देखने वाली बात यह भी है कि अपने देश में बड़े-बड़े कुटुंबों में एक साथ किसी पर्व या अवसर को मनाने की परंपरा मात्र औपचारिकता बनती जा रही है। इसका प्रमुख कारण शायद परिवार का विघटन या टूटते-बिखरते परिवारों की स्थिति है। आज बड़े परिवार कई छोटे-छोटे परिवार में विभाजित हो रहे हैं। देखा यह भी जा रहा है कि ऐसे कुछ खास अवसरों पर भी लोग दिल से मिलकर एक साथ नहीं हो पाते। पहले संयुक्त परिवार की परंपरा को सभी लोग मिलकर एकसाथ निभाते थे, फिर संयुक्त परिवार से एकल परिवार का चलन प्रारंभ हुआ, तत्पश्चात इसके भी हिस्से होना शुरू हो गये। किसी संयुक्त परिवार की संरचना में सबसे बड़ी रुकावट आती है रहन-सहन को अच्छी तरह समझ पाने की कमी। यह हमारी ही कमी है कि हम इसके मतलब को अच्छी तरह नहीं समझ पाये हैं। इस पर गांधी जी ने भी कहा है कि परिवार के सदस्यों की एकजुटता से परिवार मजबूत होता है, परिवार के मजबूत होने से समाज मजबूत होता है और समाज के मजबूत होने से ही देश मजबूत होगा। इसीलिए हर एक परिवार का मजबूत होना अति आवश्यक है। दीपावली का यह पावन पर्व पारिवारिक एकता की इस तरह मिसाल भी है कि जब श्री राम की दूसरी मां कैकेई के पुत्र भरत को राजगद्दी व श्री राम को वनवास मिला था। जब श्री राम ने अयोध्या छोड़ी, उस समय भरत नगर में नहीं थे। वापस आने पर जब उन्हें श्री राम के वनवास जाने का समाचार मिला तो वह बहुत दुखी हुए तथा उन्होंने राज-पाठ नहीं स्वीकारा और वे उसी समय श्री राम को वापस लाने महल से निकल पड़े। वह श्री राम को वापस महल लाने में तो सफल नहीं हुए परंतु उनकी अनुपस्थिति में राज सिंहासन पर उनकी खड़ाऊ को रखकर राज्य का कार्यभार देखा। यह दोनों भाइयों के बीच आपसी प्रेम व एकता की अनूठी मिसाल थी। वहीं श्रीराम की अयोध्या वापसी पर पूरा नगर आज फिर एकजुट था। आज के इस प्रयोगधर्मी दौर में पारिवारिक एकता को बनाये रखना हम सबके लिए बड़ी मांग है। हम सबकी जिम्मेदारी भी है कि आपसी सामंजस्य को हर हाल में बनाये रखें तथा हर दिल में प्रेम का दिया जलाने का प्रयास करें। तब निश्चित ही सभी लोग एक साथ मिलकर प्रेम भरे दिल से दिवाली मनाएंगे।